देश की आजादी में महत्त्वपूर्ण योगदान है ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का

कोलकाता : महात्मा गांधी के आह्वान पर 9 अगस्त 1942 को समूचे देश में एक साथ शुरू हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में निर्णायक भूमिका निभाने वाले भारत छोड़ो आंदोलन ने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिलाने का काम किया था। यह वह आंदोलन था जिसमें पूरे देश की व्यापक भागीदारी रही थी। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की मशहूर घटना काकोरी कांड के ठीक सत्रह साल बाद हुए इस आंदोलन ने देखते ही देखते ऐसा स्वरूप हासिल कर लिया कि अंग्रेजी सत्ता के दमन के सभी उपाय नाकाफी साबित होने लगे थे। क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद गांधीजी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपना तीसरा बड़ा आंदोलन छेड़ने का फैसला लिया था। अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे के साथ शुरू हुए आंदोलन के थोड़े ही समय बाद गांधीजी को गिरफ्तार कर लिया गया था लेकिन देश भर के युवा कार्यकर्ताओं ने हड़तालों और तोडफोड़ की कार्रवाइयों के जरिए आंदोलन को जिंदा रखा।
‘करो या मरो’
1942 का आंदोलन 1920, 1921, 1930, 1940-41 के आंदोलनों से काफी भिन्न था। इसी कारण सुभाष बाबू ने कहा कि 1942 में पेसिव रजिस्टेन्स के युग का अंत होकर एक्टिव रजिस्टेन्स का सूत्रपात हुआ। राजनारायण मिश्र, महेंद्र चौधरी, लेना प्रसाद, मांतिगिनी, हाजरा, चाफेकर बंधुओं, खुदीराम, कन्हाईलाल, करतार सिंह, रामप्रसाद बिस्मित, अशफकाउल्ला, राजेंद्र लाहिड़ी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे वीरों के अविस्मरणीय योगदान ने आजादी की राह काफी सरल बना दी। दोनों प्रकार के मार्ग से पूरा देश आंदोलित हो उठा। गांधीजी का ‘करो या मरो’ अत्यन्त ही शक्तिशाली मंत्र था। शब्द शास्त्र के कुशल शिल्पकार बापू के मंत्र का भी देशव्यापी असर पड़ा और यह नारा बाद में ध्येय मंत्र बन गया।
काकोरी काण्ड स्मृति-दिवस
6 अगस्त 1925 को ब्रिटिश सरकार का तख्ता पलटने के उद्देश्य से बिस्मिल के नेतृत्व में हिन्दुस्तान प्रजातंत्र संघ के दस जुझारू कार्यकर्ताओं ने काकोरी कांड किया था जिसकी यादगार ताजा रखने के लिए पूरे देश में हर साल 9 अगस्त को काकोरी काण्ड स्मृति-दिवस मनाने की परम्परा भगत सिंह ने प्रारंभ कर दी थी और इस दिन बहुत बड़ी संख्या में नौजवान एकत्र होते थे। गांधी जी ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत 9 अगस्त 1942 का दिन चुना था। यह आंदोलन गांधी जी की सोची-समझी रणनीति का ही हिस्सा था। दरअसल, दूसरे विश्व युद्ध में इंग्लैंड को बुरी तरह उलझता देख जैसे ही नेताजी से सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज को दिल्ली चलो का नारा दिया। गांधी जी ने मौके की नजाकत को भांप लिया और 8 अगस्त 1942 की रात में ही बम्बई से अग्रेजों को भारत छोड़ो व भारतीयों को करो या मरो का आदेश जारी किया।
‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’
9 अगस्त 1942 के दिन इस आंदोलन को लालबहादुर शास्त्री सरीखे एक छोटे से व्यक्ति ने एक बड़ा रूप दे दिया। लालबहादुर शास्त्री ने 1942 में ‘मरो नहीं, मारो’ का नारा दिया जिसने क्रान्ति के दावानल को पूरे देश में प्रचण्ड किया। 19 अगस्त, 1942 को शास्त्री जी गिरफ्तार हो गए। 900 से ज्यादा लोग मारे गए, हजारों लोग गिरफ्तार हुए। इस आंदोलन की व्यूह रचना बेहद तरीके से बुनी गई थी। चूंकि अंग्रेजी हुकूमत दूसरे विश्व युद्ध में पहले ही पस्त हो चुकी थी और जनता की चेतना भी आंदोलन की ओर झुक रही थी, लिहाजा 8 अगस्त 1942 की शाम को बम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बम्बई सत्र में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नाम दिया गया था। हालांकि गांधी जी को फौरन गिरफ्तार कर लिया गया था लेकिन देश भर के युवा कार्यकर्ता हड़तालों और तोड़ फोड़ की कार्रवाइयों के जरिए आंदोलन चलाते रहे।
9 अगस्त 1942 को दिन निकलने से पहले ही कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सभी सदस्य गिरफ्तार हो चुके थे और कांग्रेस को गैरकानूनी संस्था घोषित कर दिया गया। गांधी जी के साथ भारत कोकिला सरोजिनी नायडू को यरवदा पुणे के आगा खान पैलेस में, डा. राजेंद्र प्रसाद को पटना जेल व अन्य सभी सदस्यों को अहमदनगर के किले में नजरबंद किया गया था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस जनान्दोलन में 942 लोग मारे गये, 1630 घायल हुए, 18000 डीआईआर में नजरबंद हुए तथा 60229 गिरफ्तार हुए।
व्यापक जन जागृति
जयप्रकाश नारायण इस क्रांति के नेता थे। अरुणा आसफ अली व मदनलाल बागड़ी आदि का इस क्रांति में अविस्मरणीय योगदान है। अगस्त क्रांति में महिलाओं के योगदान को कमतर नहीं आका जा सकता। अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी आदि ने आंदोलन में खूब साथ दिया। अच्युत पटवर्धन, रासबिहारी, मोहन सिंह सरीखे क्रांतिकारियों ने अमूल्य योगदान दिया। सारा देश मानो हिल गया। 8 अगस्त, 1942 को जिस क्रांति का सूत्रपात हुआ, उसने यह जाहिर कर दिया कि अँग्रेजी हुकूमत टिक नहीं सकती। दरअसल सन् 1942 की क्रांति पिछले सत्तावन वर्ष से राष्ट्रीय काँग्रेस जो आंदोलन चला रही थी, उसका उफान था। इस उफान ने अँग्रेजों की आँखें खोल दी। इस उफान की पृष्ठभूमि में लोकमान्य तिलक और उनके बाद महात्मा गाँधी ने जो व्यापक जन-जागृति उत्पन्न की थी, जो राष्ट्रीय चेतना जगाई थी, वह थी।
यह आंदोलन एक ऐसा आंदोलन था जिसने ब्रिटिश हुकूमत को हिलाकर रख दिया था। सन 1942 में गांधी जी के नेतृत्व में शुरू हुआ यह आंदोलन बहुत ही सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। इसमें पूरा देश शामिल हुआ। इस आंदोलन का तत्कालीन ब्रिटिश सरकार पर बहुत ज्यादा असर हुआ, इतना कि इसे खत्म करने के लिए पूरी ब्रिटिश सरकार को एक साल से ज्यादा का समय लग गया।
आज भारत के हर नागरिक के लिए देश के इस बड़े आंदोलन को समझने, जानने की आवश्यकता है। देखा जाए तो यह सही मायने में एक जन आंदोलन था, जिसमें लाखों आम हिन्दुस्तानी चाहे वह गरीब हो, अमीर हो, ग्रामीण हो सभी लोग शामिल थे। इस आंदोलन की सबसे बड़ी खास बात यह थी कि इसने युवाओं को बड़ी संख्या में अपनी ओर आकर्षित किया। युवा कॉलेज छोड़कर जेल की कैद स्वीकार कर रहे थे। सबसे बड़ी बात यह थी कि इस आंदोलन का प्रभाव ही इतना ज्यादा था कि अंग्रेज हुकूमत पूरी तरह हिल गई और उसे इस आंदोलन को दबाने के लिए ही साल भर से ज्यादा का समय लगा। जून 1944 में जब विश्व युद्ध समाप्ति की ओर था, तो गांधी जी को रिहा कर दिया गया। इस तरह आंदोलन ने ब्रिटिश हुकूमत पर व्यापक प्रभाव डाला और इसके कुछ साल बाद ही भारत आजाद हुआ। (युवराज) रमेश सर्राफ धमोरा

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