हिन्दू होने के लिए अपनी कोई भी विशेषता नहीं छोड़नी पड़ती : मोहन भागवत

नयी दिल्ली : विजयदशमी के अवसर पर रविवार को नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक (आरएसएस) के मुख्यालय पर शस्त्र पूजन किया गया। इस दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने स्वयंसेवकों को संबोधित किया। अपने संबोधन में मोहन भागवत ने राम मंदिर, नागरिकता संशोधन काूनन (सीएए), कोरोना संकट, चीन के साथ विवाद, नई शिक्षा नीति, नए कृषि कानून, पारिवारिक चर्चा के महत्व और स्वदेशी नीति के तहत ‘वोकल फॉर लोकल’ के मुद्दे पर खुल कर अपनी बात रखी।
हिन्दू होने के लिए अपनी कोई भी विशेषता नहीं छोड़नी पड़ती
संघ प्रमुख ने कहा ‌कि, ‘हिन्दू’ शब्द की भावना की परिधि में आने व रहने के लिए किसी को अपनी पूजा, प्रान्त, भाषा आदि कोई भी विशेषता छोड़नी नहीं पड़ती, केवल अपना ही वर्चस्व स्थापित करने की इच्छा छोड़नी पड़ती है। साथ ही उन्होंने कहा कि बस स्वयं के मन से अलगाववादी भावना को समाप्त करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि भारत की भावनिक एकता और भारत में सभी विविधताओं का स्वीकार व सम्मान की भावना के मूल में हिन्दू संस्कृति, हिन्दू परम्परा व हिन्दू समाज की स्वीकार प्रवृत्ति व सहिष्णुता है।’
समझााया हिन्दू का वास्तविक मतलब
आरएसएस प्रमुख ने हिन्दू शब्द का वास्तविक मतलब बताते हुए कहा कि समस्त राष्ट्र जीवन के सामाजिक, सांस्कृतिक, इसलिए उसके समस्त क्रियाकलापों को दिग्दर्शित करने वाले मूल्यों का व उनकी व्यक्तिगत, पारिवारिक, व्यवसायिक और सामाजिक जीवन में अभिव्यक्ति का नाम ‘हिन्दू’ शब्द से निर्दिष्ट होता है।
चीन ने अपने सामरिक बल के अभिमान में हमारी सीमाओं का अतिक्रमण किया
मोहन भागवत ने चीन पर निशाना साधते हुए कहा कि हम शांत रहते हैं इसका मतलब यह नहीं कि हम दुर्बल हैं। उन्होंने कहा, चीन ने अपने सामरिक बल के अभिमान में हमारी सीमाओं का अतिक्रमण किया, वो पूरी दुनिया के साथ ऐसा कर रहा है। भारत ने इस बार जो प्रतिक्रया दी उससे चीन सहम गया। भारत तन कर खड़ा हो गया. सामरिक और आर्थिक दृष्टि से इतना असर तो पड़ा कि चीन ठिठक गया। इस बात को एहसास तो अब चीन को भी हो गया होगा। लेकिन ऐसा नहीं है कि इसके बाद हम लापरवाह हो जाएं।सेना के पराक्रम पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि हमारी सेना की अटूट देशभक्ति व अदम्य वीरता, हमारे शासनकर्ताओं का स्वाभिमानी रवैया तथा हम सब भारत के लोगों के दुर्दम्य नीति-धैर्य का परिचय चीन को पहली बार मिला है। हम सभी से मित्रता चाहते हैं। वह हमारा स्वभाव है। परन्तु हमारी सद्भावना को दुर्बलता मानकर अपने बल के प्रदर्शन से कोई भारत को चाहे जैसा नचा ले, झुका ले, यह हो नहीं सकता, इतना तो अब तक ऐसा दुःसाहस करने वालों को समझ में आ जाना चाहिए। इस दौरान उन्होंने विरोधियों पर हिंदुत्व को लेकर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया।

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