करपात्री जी : पूरा जीवन धर्म और गोरक्षा के नाम समर्पित

– रोहित कुमार सिंह, राष्ट्रीय संयोजक, युवा चेतना

करपात्री जी की जयंती पर विशेष

भारतीय संस्कृति व सनातनी परम्परा के दिव्य भास्कर हरिहरानंद सरस्वतीजी महाराज का जन्म सावन शुक्ल द्वितीया रविवार सन् 1907 में हुआ था। महाराजजी जन्मजात स्वभाव से ही साधु थे। उन्होंने गृहस्थी से लेकर विरक्ति तक जितना कार्य सम्पन्न किया अन्य कोई शायद ही कर सके। जन्म से ही उनकी साधुता व महानता के बीज अंकुरित हो चुके थे। कम अवस्था में उनका पाणिग्रह संस्कार हो गया, परन्तु उनके स्वभाव में परिवर्तन नहीं आया। पिता की इच्छा के अनुरूप एक संतान के जन्म के पश्चात भी महाराजश्री की साधुता अपरिवर्तित रही।

सन् 1926 ई. विक्रमाब्द 1983 में गृहत्याग। गंगातट पर विचरण करते प्रयाग, वीरसिंहपुर (म.प्र.) पूज्य श्री स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी के चरणों में उपस्थित होकर संन्यास दीक्षा हेतु प्रार्थना, उनके द्वारा नरवर जाकर विद्याध्ययन का निर्देश। नैष्ठिक ब्रह्मचर्यव्रर्त लेकर पदाति हरनारायण से हरिहरचैतन्य बने नरवर पहुंचकर तेरह मास में ही सम्पूर्ण विद्याएं षड्दर्शनाचार्य श्री स्वामी विश्वेश्वराम जी से प्राप्त की। गंगातट एकान्त निवास पूर्वक कठोर तपस्या की। सन् 1931-32 में विद्यागुरु श्रीस्वामी विश्वेश्वरानंद जी के विशेष आग्रह तथा श्रीब्रह्मानन्द सरस्वतीजी के निर्देश पर उन्हीं से 24 वर्ष की आयु में काशी में दण्ड ग्रहण कर हरिहरानंद सरस्वती कहलाए और करपात्री स्वामी के नाम से प्रसिद्ध हुए।

महाराज श्री की नियमित शिक्षा न होने के कारण भी वे परम सरस्वती के गुण से सम्पन्न थे। उनकी तार्किक क्षमता अद्भुत थी। महाराज जी का प्रादुर्भाव गृहस्थ परिवार में होने के बाद भी गृहस्थी की परिधि में प्रारम्भिक जीवन बिताने के बाद भी उनका सनतत्व व साधुता अप्रभावित रही। सनातन धर्म की दिव्य पताका को सर्वोच्च शिखर पर चिरस्थायी रूप से स्थापित करने के लिए उन्होंने सदैव कार्य किया। आपकी विद्वता, तार्किक क्षमता ने उन सभी को परास्त किया जिसने भी सनातन धर्म के प्रति अन्यथा दृष्टिकोण, त्रुटिपूर्ण रूप से प्रतिस्थापित करने की चेष्टा की।

सन् 1939 में काशी में मासिक पत्र सन्मार्ग का प्रकाशन प्रारम्भ करवाया, तत्पश्चात ‘सिद्धान्त’’ पाक्षिक सिद्धान्त, साप्ताहिक सन्मार्ग एवं दैनिक सन्मार्ग का प्रकाशन समय पर प्रारम्भ कराया। सन् 1946 ई. में बंगाल में हिन्दुओं का सामूहिक वध किया गया, भयंकर

विनाशलीला एवं धर्म परिवर्तन देखकर स्वामी जी सीधे बंगाल पहुंचे और नोआखाली आदि स्थानों पर जाकर त्रस्त हिन्दुओं को सान्त्वना दी और घोषणा की कि जो भी संकीर्तन कर श्रीराम का उच्चारण कर ले, विशुद्ध हिन्दू ही है-इस प्रकार बलात् धर्म परिवर्तन नहीं होगा। स्वामी जी ने मारवाड़ी रिलीफ सोसाइटी के द्वारा सहायता करायी और दो हजार उजड़े हिन्दू परिवारों को पुनः बसाया।

19 जनवरी 1947 ई. को धर्मयुद्ध सत्याग्रह की घोषणा। भारतअखण्ड रहे, गोहत्या बन्द हो, इत्यादि पांच मांगों के साथ बम्बई में धर्मयुद्ध का श्री गणेश। जेल यात्राएं। 28 अप्रैल 1947 को गिरफ्तार, अगस्त सन् 1947 में पुनः गिरफ्तार, छह मास का कारावास। तत्पश्चात् मथुरा, बम्बई में सत्याग्रह। दिल्ली में गिरफ्तारी दी, तिहाड़ जेल में भजनोपदेश करते हुए स्वामी जी पर लोहे के सरियों से नम्बरी कैदियों द्वारा भयंकर प्रहार, मूर्छा, नेत्र ज्योति प्रभावित। शरीर सिर, नेत्र, हाथों पर भयंकर चोटे आयीं।

जनवरी, 1948 ई. में गांधी जी का निधन। 30 जनवरी 1948 को स्वामी जी को काशी में भजन करते हुए पकड़कर जन सुरक्षा कानून के अन्तर्गत जेल में डाल दिया। जहां देववाणी में मार्क्सवाद और रामराज्य नामक ग्रन्थ का प्रणयन किया। पुनः सम्पूर्ण भारतवर्ष की धर्मयात्राएं गोवध बन्दी एवं हिन्दू कोडबिल के विरोध में सम्पन्न की। उस समय इन यात्राओं में एवं कोड विरोध में स्वामी जी के इस धर्म कार्य में लगभग दो करोड़ रुपये हिन्दूओं के व्यय हुए।

23 अगस्त 1949 ई. को सरसंघचालक पू.पू. श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर जी ने दिल्ली धर्मसंघ विद्यालय जाकर स्वामी श्री करपात्री जी से उनकी फूंस की झोपड़ी में भेंट की, विचार-विमर्श किया। प्रसाद ग्रहण कर नमन किया। इसी वर्ष स्वामी जी की अगली पुस्तक ‘संघर्ष और शान्ति’ का प्रकाशन हुआ।

महाराज श्री की तत्समय राजनीतिक व्यवस्था से समन्वय न होने के कारण महाराज श्री ने देशहित में देश की धर्म धारा और संस्कृति के अनुरूप में 1951 ई. के चुनावों में रामराज्य परिषद् के टिकट पर लगभग 300 प्रत्याशी खड़े किये, राजनीति को धर्मसापेक्ष, पक्षपात विहीन बनाने पर बल, मध्य भारत, राजस्थान की विधान सभा में पचास-साठ प्रत्याशी रामराज्य परिषद् के टिकट पर विजयी तथा लोकसभा में चार-पांच प्रत्याशी रा.रा.प. के टिकट पर या समर्थन पर विजयी।

सन् 1954-55 ई. ‘अहिंसात्मक धर्मयुद्ध समिति’ का गठन। कलकत्ता, बम्बई, अहमदाबाद, दिल्ली में धर्मवीरों द्वारा विराट प्रदर्शन। स्वामी जी के आवाहन पर देशभर में साठ हजार धर्मवीरों द्वारा जेलयात्राएं।

18 अक्टूबर 1962 को अकोला मध्यप्रदेश से चलकर बम्बई वधशाला बन्द कराने हेतु पूर्णरूप से शान्त-अहिंसात्मक-माखन मिश्री लेकर यात्रा कर धर्मवीरों के साथ 23 अक्टूबर 1962 को बम्बई पहुंचे। सभाएं कर शासन से बूचड़खानों को बन्द कराने की मांग कर, प्रतिनिधि मण्डल ने सरकार से मांग करते हुए भारतभर से प्रस्ताव, तार एवं जन-हस्ताक्षर भिजवाये। व्यापक प्रचार यात्राएं।

1964 में मेरठ में अ.भा. धर्मसंघ रामराज्य परिषद् का महासम्मेलन, महायज्ञानुष्ठान। तत्कालीन गृहमंत्री श्री गुलजारी लाल नन्दा ने स्वयं आकर श्री स्वामी करपात्री जी से भेंट कर गोहत्या बन्दी पर विचार विमर्श किया। इस अवसर पर ज्योतिषपीठ, द्वारका पीठ एवं गोवर्धन पीठ के तीनों जगद्गुरु शंकराचार्य भी उपस्थित थे, प्रधानमन्त्री ने शीघ्र गोवध बन्दी का आश्वासन दिया।

उ.प्र. शासन द्वारा ‘भक्ति रसार्णव’ ग्रन्थ पर श्री करपात्री जी को पांच सहस्त्र की राशि प्रदान कर सम्मानित किया जिसे उन्होंने एक पण्डित को दिलवा दिया।

07 नवंबर 1966 को दिल्ली में अ.भा. गोरक्षा महाभियान समिति द्वारा आयोजित विराट प्रदर्शन का नेतृत्व। पन्द्रह लाख गो भक्तों का गो-कुम्भ। मंचस्थ जगद्गुरु जी, करपात्री जी आदि पर सरकार द्वारा गोले बरसाये गये, माइक के तार काटे, लाठी चार्ज। गिरफ्तारी, जेल में सभा में कीर्तन करते हुए निहत्थे लोगों पर लाठी आदि से हमला, यातनाएं, निर्ममता पूर्वक पिटायी। 07 नवंबर 1966 गोपाष्टमी को दिल्ली में संसद-भवन के सामने एक बहुत बड़ी रैली आयोजित की गयी। देश के कोने-कोने से जनता का हुजूम (भीड़) दिल्ली पहुंच गया। लाल किला से शोभायात्रा प्रारम्भ हुई, जो संसद-भवन के सामने मैदान में एक बृहत् सभा के रूप में परिणत हो गयी। यह

शोभायात्रा इतनी विशाल थी कि नरमुण्डों के अतिरिक्त इसका कोई ओर-छोर नहीं दिखायी देता था। इस शोभा-यात्रा में नागा साधुओं के अतिरिक्त अयोध्या के वैरागी, काशी के साधु-संन्यासी, महाराष्ट्र के संत-महात्मा तथा देश के कोने-कोने से आकर नागरिकों ने भाग लिया। एक विशाल मंच बनाया गया था। इसमें सर्वोच्च समिति के सदस्यों के अतिरिक्त देश के प्रमुख नेतागण उपस्थित थे। सर्वप्रथम महाराजश्री ने इस सभा को संबोधित किया। इसके बाद अन्य नेताओं ने भी व्याख्यान दिये। इसी बीच संसद भवन के सामने पुलिस ने अश्रुगैस छोड़ी और गोलियां चलायीं। भगदड़ मच गयी और सभा विसर्जित हो गयी।

अपनी घोषणा के अनुसार पुरीपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य श्रीनिरंजन-देवजी तीर्थ ने दिल्ली में निगम बोध घाट-स्थित धर्मसंघ महाविद्यालय में अनशन करना प्रारम्भ कर दिया। दूसरे ही दिन सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर पांडिचेरी जेल में भेज दिया। सरकार के इस कार्य से सारे देश में वातावरण अशान्त हो गया। संसद में भी ‘श्रीमाधव हरि अणे’ नामक एक प्रतिष्ठित सांसद ने शंकराचार्य की सहानुभूति में अनशन करने की घोषणा कर दी। तत्काल शंकराचार्यजी को मुक्तकर पांडिचेरी से पुरी-स्थित उनके गोवर्धन-मठ पर पहुंचाया गया। वहां उनका यह अनशन 72 दिनों तक चलता रहा। इधर, दिल्ली में गो-रक्षा महाभियान के तत्तवाधान में महाराजश्री ने सत्याग्रह के संचलनार्थ सर्वोच्च समिति गठित की, जिसमें देश के प्रमुख सात नेताओं को सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया। धर्मसम्राट, अनन्तश्री स्वामी श्रीकरपात्रीजी, पुरीपीठाधीश्वर जगद्गुरु श्रीनिरंजनदेवजी तीर्थ, ‘कल्याण’ के आदिसम्पादक भाईजी श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक श्रीगोलवलकरजी, भारत-साधु समाज के अध्यक्ष श्री गुरुचरणदासजी, संत प्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी आदि विशिष्ट व्यक्ति इसमें सम्मिलित थे। देश के कोने-कोने से संत-महात्मा, साधु-वैरागी एवं गृहस्थ लोग दिल्ली आने लगे। आन्दोलन उग्ररूप धारण कर लिया। सत्याग्रहियों का ऐसा तांता लगा कि कारागार में भी स्थानाभाव हो गया। धर्मसम्राट स्वामी श्रीकरपात्रीजी महाराज भी गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिये गये। जेल में सत्संग होने लगा। संत-महात्माओं से जेल भर गई। सरकार भी विचलित होने लगी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने समझौते के लिए भरपूर प्रयास करना प्रारम्भ कर लिया। महाराजश्री एवं अन्य नेतागण भी पूर्ण गोवंश-हत्या बंद होने तक आन्दोलन के लिये कटिबद्ध थे। अनशन के लगभग 72 दिन पूरे होने जा रहे थे। अन्त में सरकार ने यह आश्वासन दिया कि वह एक समिति गठित करती है जो ‘गो-हत्या-बंदी-कानून’ का प्रारूप समिति के सदस्यों के परामर्श से

छह महीने के भीतर तैयार करेगी और गो-वंश की हत्या पर कानून द्वारा प्रतिबंध लगाया जायेगा। सरकार के इस स्पष्ट आश्वासन पर महाराजश्री ने पुरी के जगद्गुरु शंकराचार्य से अनशन तोड़ने का अनुरोध किया। वे यह समझते थे कि गोरक्षा एवं धर्मरक्षा के लिए

इस धर्मप्रहरी का जीवित रहना आवश्यक है। अन्ततोगत्वा सरकार के आश्वासन पर शंकराचार्यजी का उपवास पूरा हुआ और आन्दोलन भी समाप्त हुआ। यद्यपि अपने आश्वासन के अनुसार सरकार ने यह कार्य पूरा नहीं किया।

1978 ई. में श्री सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट. की उपाधि से सम्मानित। 1978 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय स्थित मालवीय भवन में श्री मद्भगवद्गीता एवं श्रीमद्भागवत पर आठ व्याख्यानों की माला प्रस्तुत। 1979 ई. में ही भारतीय-शिक्षा-परिषद् द्वारा विद्या विश्वविद्यामंदिर का श्री करपात्री जी के नाम पर शिलान्यास सम्पन्न।

07 फरवरी 1982 ई. को रविवार चतुर्दशी को पुष्यनक्षत्र में गंगास्नानोपरान्त करपात्रीधाम स्थित वेदानुसन्धान केन्द्र के कक्ष में शिव-शिव-शिव नामोच्चारण पूर्वक ब्रह्मलीन तथा 09 फरवरी 1982 को केदारघाट पर श्री गंगामहारानी की गोद में पार्थिव देह पुरी पीठाधीश्वर श्री स्वामी निरंजनदेव तीर्थ द्वारा पत्थर की पेटिका में जलसमाधि दी गयी।

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