भारत में पहली बार रोपा गया हींग का पौधा, हो सकती है 740 करोड़ की बचत

औषधीय गुणों से भरपूर हींग की अब देश में ही पैदावार होगी। पालमपुर स्थित सीएसआईआर की प्रयोगशाला, इंस्टीच्यूट ऑफ़ हिमालयन बायोरिसोर्स टेक्नोलॉजी के प्रयासों का ही नतीजा है कि हिमाचल प्रदेश के सुदूर लाहौल घाटी के किसानों के खेती के तरीकों में एक ऐतिहासिक बदलाव आया है।

क्यों है हींग की खेती जरूरी

भारत दुनिया में तैयार होने वाले हींग का करीब 50 फीसदी इस्तेमाल करता है। मगर आज तक भारत में हींग की खेती नहीं हुई है। बता दें कि हर वर्ष भारत करीब 740 करोड़ के हींग का आयात करता है। भारत अफगानिस्तान से 90, उज्वेकिस्तान से 8 और ईरान से 2 फीसदी हींग, अर्थात लगभग 1200 टन कच्ची हींग आयात करता है।

कैसे मिली यह उपलब्धि

समुद्रतल से करीब 11 हजार फीट की ऊंचाई पर लाहौल के क्वारिंग गांव में बीते 17 अक्तूबर को देश का पहला हींग का पौधा रोपित किया गया। अफगानिस्तान से लाए गए हींग के बीज का पालमपुर स्थित हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान की लैब में वैज्ञानिक तरीके से पौधा तैयार किया गया है। संस्थान ने ट्रायल के तौर पर हींग की पैदावार के लिए देश में सबसे पहले लाहौल-स्पीति जिले को चुना है।

कैसे हो सकता है इस फसल से लाभ

आईएचबीटी की यह पहल कामयाब हुई तो हींग से जनजातीय किसानों की आर्थिकी में क्रांतिकारी परिवर्तन आएगा। ट्रायल के तौर पर घाटी में फिलहाल केवल 7 किसानों को हींग के पौधे दिए गए हैं। क्वारिंग में पूर्व जिप उपाध्यक्ष रिगजिन ह्यरपा के खेत में हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान के निदेशक डॉ. संजय कुमार ने हींग का पौधा रोपित किया। उन्होंने कहा कि देश में अभी तक हींग की खेती नहीं होती है। संस्थान ने पालमपुर स्थित रिसर्च सेंटर में हींग के पौधों की 6 वैरायटी तैयार की है।

हींग की खेती के लिए लाहौल की आबोहवा माकूल

सालों के शोध के बाद आईएचबीटी ने लाहौल घाटी को हींग उत्पादन के लिए माकूल पाया है। इसके अलावा उत्तराखंड के पहाड़ी इलाके, लद्दाख, किन्नौर, जनझेली का पहाड़ी क्षेत्र भी हींग के लिए उपयुक्त माना गया है। हींग की खेती के लिए 20 से 30 डिग्री तापमान होना जरूरी है। लाहौल घाटी में फिलहाल ट्रायल के तौर पर मड़ग्रा, बिलिंग, केलांग और क्वारिंग के 7 किसानों को हींग का बीज वितरित किया है। ट्रायल के दौरान करीब 5 बीघा भूमि में हींग की खेती होगी।

पांच साल में तैयार होता है हींग

हींग की फसल पांच साल में तैयार होती है। इसकी जड़ पूरी तरह तैयार होने के बाद पौधे में बीज तैयार होंगे। संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार ने कहा कि हिमालय के ऊपरी क्षेत्र को हींग की खेती के लिए उपयुक्त पाया गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हींग की कीमत 35 हजार रुपये प्रति किलो है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत हींग का दुनिया में सबसे अधिक खपत करने वाला देश है। हिमालय क्षेत्रों में हींग उत्पादन होने के बाद किसानों को इसकी अच्छी कीमत मिलेगी।

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