वैक्सीन को लेकर भारतीय रेगुलेटरों पर संदेह

राजनीतिक गपशप
हैदराबाद की दवा कंपनी भारत बायोटेक जब से कोविड-19 वैक्सीन बनाने के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईएमसीआर) के साथ जुड़ी है, पूरी परियोजना पर संदेह जताया जाने लगा। पहली बात, आईएमसीआर औषधि और वैक्सीन को मंजूरी देने वाली संस्था है और अगर यह किसी निजी कंपनी से जुड़ती है तो अन्य के मुकाबले उसका पक्ष लेगी। चूंकि भारत को वैक्सीन की अत्यधिक जरूरत है, इसलिए किसी ने आपत्ति नहीं उठाई। लेकिन हितों का टकराव तो था ही। इसके बाद हुआ सनसनीखेज ऐलान जब आईसीएमआर ने कहा कि 15 अगस्त तक वैक्सीन आ जाएगी। जाहिर है कि यह लाल किले से प्रधानमंत्री के 15 अगस्त के भाषण से जुड़ा है। इस बात पर जब हाय तौबा मची कि कंपनी कैसे इस अवधि में फेज 1 से 4 तक का ट्रायल पूरे कर लेगी, यहां तक कि अगर इन सबको एक साथ जोड़ लिया जाए, तब भी। तब आईसीएमआर ने कहा कि यह कोई समय सीमा नहीं है, यह बयान गढ़ा हुआ है। हम अभी दिसंबर में आ पहुंचे हैं और कोई वैक्सीन नहीं आ पाई है। इसके बाद ड्रग कंट्रोलर आफ इंडिया द्वारा घोषणा की गई कि यदि वैक्सीन का प्रभाव 50-60% भी हो तो इसे अनुमति दे देनी चाहिए। आमतौर पर वैश्विक मानकों के अनुसार वैक्सीन का प्रभाव 75% से ज्यादा होना चाहिए, लेकिन ड्रग कंट्रोलर आफ इंडिया ने इसे कम करके 50- 60% कर दिया। मेडिकल बिरादरी इससे आश्वस्त नहीं है, लेकिन देश कोविड-19 वैक्सीन का बेसब्री से इंतजार कर रहा है और प्रधानमंत्री खुद हर महीने वैक्सीन पर कम से कम एक बैठक जरूरत कर रहे हैं। चिंतित और बेचैन आईसीएमआर ने वैक्सीन को जल्दी लाने के लिए कंपनियों को सभी तरह की प्रशासनिक और अन्य इजाजत दे दी, जैसे नियमों में छूट, परीक्षणों को मिलाना आदि। लेकिन औषधि उद्योग और पूरी दुनिया को सबसे ज्यादा तब आघात लगा जब सरकार ने भारत बायोटेक द्वारा बनाई गई वैक्सीन के दुष्प्रभाव को छिपाया। भारत बायोटेक द्वारा निर्मित कोविड-19 के वैक्सीन के जुलाई में फेज 1 के क्लिनिकल ट्रायल्स के बाद इसमें हिस्सा लेने वाले एक आदमी को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। लेकिन इसके बाद ना परीक्षण रोका गया और ना ही इस पर कोई सार्वजनिक खुलासा किया गया। यह काफी आघात पहुंचाने वाला था और वैक्सीन की वैश्विक स्वीकृति पर संदेह होने लगा। सरकार चुप है और औषधि के रेगुलेटर और कंपनी भी चुप है। आईसीएमआर ने भी कुछ नहीं कहा।
बिहार राज्य सभा की सीट का खेल: सबकी निगाहें बिहार से राज्यसभा की इकलौती सीट पर लगी हैं। इसके लिए उपचुनाव 14 दिसंबर को होने वाला है। नामजदगी के परचे दाखिल करने की अंतिम तिथि 3 दिसंबर है। यह सीट राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की मृत्यु से खाली हुई थी। इस उपचुनाव का बहुत ज्यादा राजनीतिक महत्व है क्योंकि लोक जनशक्ति पार्टी का नेतृत्व पासवान के पुत्र चिराग पासवान कर रहे हैं और इस सीट पर दावा कर रहे हैं। हालांकि बिहार के 243 सदस्यों वाली विधानसभा में लोक जनशक्ति पार्टी का एक ही विधायक है और यह पार्टी बिहार में एनडीए के साथ नहीं है। लेकिन यह दिल्ली में इस गठबंधन की महत्वपूर्ण सहयोगी है क्योंकि लोकसभा में इसके 6 सांसद हैं। चिराग पासवान भाजपा पर दबाव बना रहे हैं कि उनकी पार्टी ने बिहार में 74 सीटें लाकर एनडीए की सबसे बड़ी पार्टी बनने में भाजपा को मदद पहुंचाई। चिराग पासवान ने यह भी दावा किया है कि लोक जनशक्ति पार्टी ने भाजपा को गठबंधन में वरिष्ठ सदस्य बनने के लिए मदद पहुंचाई। इसलिए राज्यसभा सीट उनकी मां रीना पासवान को दी जानी चाहिए। दूसरी बात है कि लोक जनशक्ति पार्टी ने भले केवल 1 सीट जीती हो, लेकिन उसे 6% वोट मिले हैं और वह बिहार में अपना स्थान रखती है। भाजपा उसे नजरअंदाज नहीं कर सकती और भाजपा के प्रमुख जेपी नड्डा ने भी इस तथ्य को माना है।
सूत्रों का कहना है कि भाजपा अपनी ही समस्या से परेशान है। यदि यह लोक जनशक्ति पार्टी को सीट दे देती तो इससे जनता दल (यूनाइटेड) नाराज हो जाती। दूसरी ओर, भाजपा सुशील मोदी के दावे को नजरअंदाज नहीं कर सकती थी। सुशील मोदी को उपमुख्यमंत्री का पद देने से इनकार किया गया और तब ये माना गया था कि दिल्ली में इनकी सेवाएं ली जाएंगी। अब यदि भाजपा नेतृत्व उन्हें दूर रखता तो सीट लोक जनशक्ति पार्टी को मिल जाती, इसलिए यह उपचुनाव बहुत ही बड़ा राजनीतिक महत्व रखता है।
मीरा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की प्रमुख !: कांग्रेस पार्टी में इस समय भारी कंफ्यूजन है क्योंकि गांधी परिवार के वफादारों को इस बात का भरोसा नहीं है कि राहुल गांधी फरवरी-मार्च में पार्टी के अध्यक्ष बनने के लिए खुद को कैसे पेश करेंगे। पार्टी में ऐसे वफादार भी हैं, जो उनके अंतरिम अध्यक्ष रूप में जल्द वापसी की कोशिश में हैं। उनका सोचना है कि यह ऐसा समय है कि उन्हें पार्टी संभालने में विलंब नहीं करना चाहिए और पद ग्रहण कर लेना चाहिए। नवगठित केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण जी जान से लगा हुआ है कि 1500 से ज्यादा सदस्यों वाली कांग्रेस कार्यकारिणी समिति का चुनाव कराया जाए। राहुल गांधी को पूर्णकालिक अध्यक्ष बाद में भी बनाया जा सकता है। दूसरी तरफ जो विरोधी हैं वे भी राहुल के पार्टी प्रमुख बनाए जाने को रोकने के लिए कटिबद्ध हैं। वे कुछ ऐसे नामों के जुगाड़ में जुटे हैं जिन्हें पार्टी प्रमुख के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है, जैसे पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार जो बिहार की दलित नेता हैं। वह 75 वर्ष की हो गई हैं और देश में पार्टी को मजबूत बनाने के लिए उनके साथ तीन-चार उपाध्यक्ष भी होंगे। इधर, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इस मोड़ पर इस पद को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में पार्टी में विरोधियों को इनके सिवा और कोई नाम अब तक नहीं मिला है। यह माना जा रहा है कि भूपेंद्र सिंह हुड्डा एक उपाध्यक्ष होंगे। पार्टी के विरोधियों का साफ मानना है कि राहुल की कमान में पार्टी मजबूत नहीं हो सकती क्योंकि वह किसी की बात सुनने को तैयार नहीं होते और अपनी ही दुनिया में खोये रहते हैं। ओबामा की किताब ने राहुल को और भी बुरी तरह क्षति पहुंचा दी है। राहुल चाहते हैं कि सांगठनिक चुनाव में थोड़ी देरी हो जाए और यह अगर पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु , केरल, असम और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव तक टाल दिए जाएं तो अच्छा है। वे उम्मीद लगाए बैठे हैं कि कांग्रेस इन चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करेगी और वह विजयी होकर पार्टी प्रमुख पद पर लौटेंगे। राहुल के वफादार चुप हैं क्योंकि कोई नहीं जानता कि आक्रामक भाजपा इन राज्यों के चुनाव में क्या करेगी।
सातवें आसमान पर क्यों हैं नड्डा? : जब बिहार में भाजपा की शानदार विजय के बाद वहां के मतदाताओं को धन्यवाद ज्ञापन समारोह में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा मुख्यालय पहुंचे तो कुछ अप्रत्याशित हुआ। बिहार में विजय भाजपा के लिए अच्छा बड़ा मोड़ साबित हुई और भाजपा तथा एनडीए के लिए महत्वपूर्ण रही। कारण कि यदि भाजपा हार जाती तो ने न केवल कांग्रेस और राहुल गांधी का नेतृत्व उत्प्रेरित हो जाता बल्कि विपक्ष की एकता को भी मजबूती मिल जाती। ऐसा होता तो यह अगले साल पांच राज्यों में होने वाले चुनाव में भाजपा को बहुत बुरी तरह नुकसान पहुंचाता। जिन पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं वे हैं – पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी। इसलिए प्रधानमंत्री बहुत खुश थे और एक संदेश देना चाहते थे। भाषण के दौरान प्रधानमंत्री ने अचानक कहा कि “नड्डा जी, आप आगे चलो हम तुम्हारे साथ हैं।” नड्डा के पूर्ववर्ती लोगों में किसी को भी मोदी ने ऐसी बात नहीं कही थी, हालांकि राज्यों के चुनावों में इससे बड़ी जीत भी हुई थी। जब मोदी जी ने यह बात कही तो नड्डा मोदी जी को धन्यवाद देने के लिए अपनी जगह से खड़े हो गए। लेकिन अमित शाह, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और बीएल संतोष बैठे रहे। मोदी जी ने इस नारे को तीन बार दोहराया और सबको मजबूर कर दिया कि वे अपनी सीटों से खड़े होकर नड्डा के लिए तालियां बजाएं। संभवत मोदी जी एक गुप्त संदेश भेज रहे थे। कुछ बड़े नेता बिहार में चुनाव अभियान के लिए नहीं गए थे। सूत्रों का कहना है कि अमित शाह कुछ विशेष लोगों के साथ जुड़े रहे और वे लगातार बताते रहे कि बिहार में भाजपा और जदयू हारेंगे, लेकिन भाजपा को जदयू से ज्यादा सीटें मिलेंगी। बिहार जाने के बदले 5 नवंबर को शाह पश्चिम बंगाल चले गए। इसलिए प्रधानमंत्री की दुर्लभ शाबासी ने नड्डा को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया, क्योंकि उन्होंने ना केवल बिहार में चुनाव अभियान की कमान संभाली थी बल्कि वहीं जमे रहे और बाजी मार ली। निःसंदेह, मोदी जी ने भी धुआंधार प्रचार किया था।
आखिर, बंद हो रही है एसटीसी : मोदी सरकार जब सत्ता में आई तो इनके पास एक बहुत बड़ी योजना थी कि सार्वजनिक क्षेत्र के उन उद्यमों, जो घाटे में चल रहे हैं, को बंद कर दिया जाए या बेच दिया जाए। लेकिन सत्ता में आए 6 वर्ष हो गए और अब सरकार ने समझा है कि ऐसा बोलना आसान है, लेकिन करना मुश्किल। अतएव, सरकार ने बीएसएनल तथा एमटीएनएल को बड़ी संख्या में कर्मचारियों से मुक्त होने को कहा और उन्हें वीआरएस देने में अरबों रुपए खर्च कर दिए। लेकिन बीएसएनल का सुधरना बड़ा कठिन है और इसकी कोई पुख्ता योजना ही नहीं बन पा रही। यहां तक कि एक लाख करोड़ रुपये का वीआरएस पैकेज भी शायद पानी में चला गया। लेकिन सुधार अब भी दूर की कौड़ी है। अलबत्ता सरकार को एयर इंडिया और बीपीसीएल को बेचने में इसी वित्त वर्ष में कामयाबी मिलती है तो यह मुकुट में एक और पंख जैसा होगा। इसने विनिवेश के लिए सभी कठिन शर्तों को खत्म कर दिया और सरकार एयर इंडिया को लगभग मुफ्त में देकर भी खुश होगी, साथ ही बीपीसीएल को उसके मूल्य से बहुत कम में देने को तैयार है। यह 6 साल पहले एसटीसी को बंद करना चाहती थी और आखिरकार अब वह सपना साकार हो रहा है। इसने कंपनी को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज से डीलिस्ट करने का फैसला किया है और कोई भी नया कारोबार लेना बंद कर दिया है। एसटीसी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने मुंबई, कोलकाता और अहमदाबाद की शाखाओं को इस वर्ष 30 नवंबर तक तथा शेष सभी शाखाओं को दिसंबर में बंद करने की अधिसूचना जारी कर दी है। वर्ष 2021 में एसटीसी शायद केवल कागज पर रह जाएगी और वह भी इसलिए कि कानूनी लड़ाई तथा अन्य मुद्दों को समझाया जा सके। कर्मचारियों को बहुत ही सुनहरा ऑफर दिया गया है अथवा तबादले का विकल्प दिया गया है। कतार में दूसरी कंपनी है एमएमटीसी। इनके पास बहुत बड़ी जमीन है और इसे बेचा जा सकता है तथा प्राप्त आय से घाटे को पाटा जा सकता है।

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