राज्यसभा के लिए भाजपा में कौन 10 खुशकिस्मत होंगे?

राजनीतिक गपशप
सबकी आंखें भाजपा हाईकमान की ओर लगी हैं कि राज्यसभा सीट के लिए किन 10 लोगों का चयन होगा। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में 11 सीटें खाली हुई हैं। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा की जो ताकत है, उसके आधार पर वह इन 11 में से 10 सीटें कब्जा करने के लिए कमर कसे हुए है। उत्तराखंड में पार्टी की केवल एक सीट खाली हुई है। जो सीटें खाली हुई हैं उनमें से तीन अवकाश प्राप्त करने वाले सांसदों की हैं। वे हैं नागरिक उड्डयन तथा शहरी मामले के मंत्री हरदीप सिंह पुरी, महासचिव अरुण सिंह और नीरज शेखर। नीरज शेखर ने भाजपा में आने के लिए समाजवादी पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। उम्मीद है कि उन्हें राज्य सभा में भेज दिया जाएगा। अगर इन सब को दोबारा टिकट दिया जाता है तो भाजपा 6 अतिरिक्त सीटें भी जीत लेगी। बहुत उम्मीद है राम माधव और कुछ अन्य लोग भी लाए जाएंगे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी अपने कुछ लोगों को राज्यसभा में भेजना चाहते हैं। समाजवादी पार्टी भी राज्यसभा में एक सीट जीत लेगी और यह सीट है रामगोपाल यादव की। रामगोपाल मुलायम सिंह यादव के भाई हैं। लेकिन समाजवादी पार्टी को बहुत घाटा भी होगा क्योंकि इसकी साटें 8 से घटकर 5 पर पहुंच जायेंगी।
बसपा को राज्यसभा में केवल 2 सीटें मिलेंगी और उसके टिकट पर खड़े और लोग नहीं जीत पायेंगे क्योंकि उसके विधायकों की संख्या सिर्फ 19 है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में सीटों की स्थिति यह है कि अगर पूरा विपक्ष भी एक साथ हाथ मिला ले तो एक से ज्यादा सीट नहीं जीत पायेगा। कांग्रेस के पुनिया हाथ मलते रह जाएंगे। वह नवंबर में रिटायर हो रहे हैं। उत्तराखंड से निर्वाचित कांग्रेस के सांसद राज बब्बर भी इस बार नहीं चुने जाएंगे। यहां की सीट भाजपा के कब्जे में जाएगी। अगर भाजपा के 86 सांसद राज्यसभा में आ जाते हैं तो इसकी क्षमता बढ़कर 94 हो जाएगी और कांग्रेस पार्टी की क्षमता घटकर 38 जाएगी।
सीबीआई ने योगी के आगे झुकने से इनकार कर दिया : सीबीआई का रंग-ढंग भी अजीब है। इसने बिहार सरकार की अनुशंसा के तुरंत बाद सुशांत सिंह राजपूत का मुकदमा दर्ज कर लिया, लेकिन एजेंसी इस पर 1 हफ्ते से ज्यादा काम नहीं कर पाई। इतना ही काफी नहीं था, सीबीआई ने हाथरस मामले को षड्यंत्र के नजरिये से जांच की योगी आदित्यनाथ की अनुशंसा को नामंजूर कर दिया। योगी आदित्यनाथ की सरकार ने इस मामले में 19 एफआईआर दर्ज कर आरोप लगाए गए थे कि उत्तर प्रदेश में अक्टूबर में जातीय दंगे फैलाने के लिए राजनीतिक दलों और अन्य संगठनों ने मिलकर अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र रची थी। इसने कहा था कि एक कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया ने इसके लिये एक वेबसाइट भी तैयार की थी। लेकिन सीबीआई ने योगी सरकार को अस्थिर करने की अंतरराष्ट्रीय साजिश वाले नजरिये से मामले को हाथ में लेने से इनकार कर दिया और कहा कि वह केवल हाथरस में 19 वर्षीया एक दलित युवती के सामूहिक बलात्कार और उसके पश्चात उसकी हत्या के मामले की जांच करेगी। वह उन मामलों की जांच नहीं करेगी, जिनकी अलग-अलग प्राथमिकियां राज्य प्रशासन ने दर्ज की हैं। सीबीआई को युवती से सामूहिक बलात्कार और हत्या का केस दर्ज किये हुए लगभग दस दिन हो गये हैं। इस बीच उसने कहा है कि राज्य सरकार राष्ट्रविरोधी गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय साजिश से जुड़े मामलों की जांच स्वयं करे। सीबीआई के प्रवक्ता आरके गौड़ ने भी पुष्टि की है कि एजेंसी केवल दलित लड़की से बलात्कार और हत्या की जांच कर रही है। उत्तर प्रदेश सरकार ने दलित युवती के बलात्कार व हत्या तथा 5 अक्टूबर की घटना के पीछे की साजिश की सीबीआई की जांच पर निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया। चूंकि सीबीआई कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के अंतर्गत आता है और यह विभाग प्रधानमंत्री कार्यालय के हाथ में है। इसमें केन्द्रीय गृह मंत्रालय की बड़ी भूमिका होती है कि ऐसे मामलों में राज्य में क्या किया जाये और क्या न किया जाये। राज्य सरकार के मुताबिक विदेशी नागरिकों का स्थानीय लोगों तथा संगठनों से वेबसाइट के माध्यम से सांठगांठ है। यह उसी तरह से जातीय दंगा भड़काना चाहता है, जिस तरह से अमेरिका में नस्ली दंगे होते हैं।
मोदी की अफसरशाही में गुजरात का वर्चस्व : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 के मई को केंद्र में आने के बाद समूची अफसरशाही में गुजरात काडर की पैठ बढ़ती जा रही है। गत 6 वर्षों में गुजराती अफसरों की नियुक्ति प्रधानमंत्री कार्यालय ले लेकर ट्राई, बीएसएफ, एनसीबी, सीबीआई, एफएसएसएआई तथा अन्य शाखाओं में हुई है। चाहे वह गृह मंत्रालय के सचिव हों या रक्षा सचिव, वित्त और विदेश मंत्रालय के अफसर हों आप जिधर भी नजर डालेंगे गुजरात ही पाएंगे। अभी हाल में गुजरात काडर के अधिकारी पीडी वाघेला को ट्राई का चेयरमैन नियुक्त किया गया है। कहा जा रहा है कि वाघेला को इसलिए लाया गया क्योंकि इन्होंने गुजरात में जीएसटी को बहुत ही प्रभावशाली ढंग से लागू किया। इनके अलावा जीसी मुर्मू को सीएजी, पीके प्रिस्ट को केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण, रीता तिटोटिया को खाद्य सुरक्षा एवं सुरक्षा प्राधिकरण में लाया गया है। खास तौर पर मोदी जी ने हार्दिक शाह को राजीव टोपाने की जगह निजी सचिव के रूप में नियुक्त किया है। वह प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर अन्य सभी मंत्रालयों में अफसरों की नियुक्ति का मामला देखते हैं। हालांकि महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति के लिए गुजरात कैडर ही एकमात्र शर्त नहीं है, बल्कि मोदी उसकी क्षमता भी देखते हैं। गुरु प्रसाद मोहपात्रा को इंडस्ट्री प्रमोशन विभाग में सचिव तथा एमएसएमई में एके शर्मा को सचिव नियुक्त किया गया है। यह उल्लेखनीय है भरत लाल ने मोदी को एक मख्यमंत्री के रूप में उभरते देखा है। इस समय वे राष्ट्रपति भवन में सचिव हैं। सीबीआई का यह सबसे विवादास्पद वक्त था, जब राकेश अस्थाना चमके थे और अब उन्हें बीएसएफ का प्रमुख एवं एनसीबी का प्रभार दिया गया है। एनसीबी सुशांत सिंह आत्महत्या मामले में चमका। राष्ट्रीय जांच एजेंसी के प्रमुख वाईसी मोदी आईपीएस ऑफिसर हैं और सीबीडीटी पीसी मोदी हैं जो आईआरएस आफिसर हैं। सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर के रूप में प्रबीर सिन्हा को नियुक्त किया गया है। सिन्हा भी गुजरात काडर के अफसर हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार प्रधानमंत्री आमतौर पर अपने राज्य के अफसरों को नियुक्त करते हैं। मोरारजी देसाई से लेकर मनमोहन सिंह तक ऐसा होता आया है। मोदी कोई अलग नहीं है।
केंद्र ने एनसीबी को सावधान किया : केंद्र सरकार ने नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के अफसरों को सावधान किया है कि वह फिल्मी अभिनेताओं को छोड़ मुंबई के बदनाम ड्रग पेडलरों तथा ड्रग सिंडिकेट को पकड़ने की कोशिश करे। कई टीवी चैनलों ने एनसीबी अफसरों को यह कहते हुए दिखाया है कि फिल्मी दुनिया के कई बड़े नामों को पूछताछ के लिए बुलाया जाएगा। एनसीबी के अफसरों ने भी कहा है कि फिल्मी दुनिया के कई बड़े नामों को पूछताछ के लिए बुलाया जाएगा। एनसीबी ने इससे इनकार भी नहीं किया है और इसके कारण बवाल मच गया है। एनसीबी ने दर्जनों लोगों को गिरफ्तार भी किया है जिनमें रिया चक्रवर्ती और सुशांत सिंह राजपूत के कुछ मित्र भी शामिल हैं। इससे पता चलता है कि गृह मंत्रालय ने एनसीबी को सावधान किया है कि वह फूंक-फूंककर कदम रखे और ड्रग सिंडिकेट एवं पेडलरों के पीछे लगे। जो लोग ड्रग सिंडिकेट से नहीं जुड़े हैं, उन्हें तंग न किया जाए।
अगर गृह मंत्रालय के सूत्रों ओ माना जाए तो सुशांत सिंह राजपूत के मामले को जांच के लिए मुंबई पुलिस के बदले सीबीआई को सौंपा गया। यहां तक कि प्रवर्तन निदेशालय को जांच में शामिल किया गया है। लेकिन इसमें निरपराधी लोगों को परेशान करने की मंशा नहीं थी। सीबीआई के निदेशक आरके शुक्ला ने कभी भी अति उत्साही अफसर की तरह काम नहीं किया है। यहां तक कि डॉक्टर सुधीर गुप्ता के नेतृत्व वाली एम्स की फॉरेंसिक टीम ने गला घोंटने से हुई मौत से इनकार किया है। बाद में प्रवर्तन निदेशालय ने सरकार को बताया है यह मामला कभी भी धन शोधन का नहीं है। भाजपा में भी नेताओं ने कहा है कि फिल्मी दुनिया को ड्रग लेने वालों से जोड़ने पर पार्टी को कोई राजनीतिक फायदा नहीं होगा। पता चला है कि एनसीबी को कहा गया है कि वह ड्रग सिंडिकेट से जुड़े लोगों को पकड़े। वह इस जांच को रोके नहीं लेकिन जरा धीमे कदम उठाए।
बढ़ती हुई दाढ़ी का राज: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दाढ़ी इन दिनों क्यों बढ़ रही है? सब जगह इसी की चर्चा है लेकिन किसी के पास जवाब नहीं है। उन लोगों के पास भी नहीं है जो प्रधानमंत्री से बातें करते हैं और उनके करीबी हैं। एक स्पष्टीकरण है कि प्रधानमंत्री को नहीं चाहते कोई उनके बहुत करीब आए। वह थोड़ी दूरी बनाकर रखते हैं। ऐसा उन्होंने कोविड के कारण किया है। उनके व्यक्तिगत रसोइए को छोड़कर कोई भी 6 फीट की दूरी पार नहीं कर सकता। वह 20 सालों से उनके साथ है। अमित शाह और प्रिंसिपल सेक्रेटरी पीके मिश्रा और अन्य वरिष्ठ अफसर भी उनके करीब नहीं जाते हैं। यहां तक कि एसपीजी को भी निर्देश दिया गया है कि वह ऐसी व्यवस्था करें कि कोई 6 फुट की दूरी पार ना हो सके। ऐसे में अगर कोई हेयर ड्रेसर उनकी दाढ़ी बनाता है तो संक्रमण हो सकता है, शायद प्रधानमंत्री ऐसा ही सोचते हैं। इसीलिए वे लोगों से थोड़ी दूर रहते हैं। यहां तक कि उन्हें भी जो उनकी अन्य गतिविधियों में शामिल हैं और उनके सरकारी आवास में रहते हैं। कुछ यह भी सोचते हैं कोरोनावायरस से लड़ने की उनके पास दैवी शक्ति है। हो सकता है उन्होंने शपथ ली हो कि जब तक कोरोनावायरस हारेगा नहीं तब तक दाढ़ी नहीं बनाएंगे।
जगन बहुत परेशानी में क्यों हैं !: यदि योगी आदित्यनाथ लखनऊ में झंझट में पड़ गए हैं तो आंध्र प्रदेश में उनके साथी वाईएस जगन मोहन रेड्डी बहुत गंभीर परेशानी में हैं। देखने में लगता है कि वे देश के पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक पदेन जज एनवी रमन्ना और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के कई जजों के खिलाफ पत्र लिखा है तथा जांच की मांग की है। मजे की बात है कि यह सारे अभियोग सुप्रीम कोर्ट के जज द्वारा लगाए गए हैं, जो अप्रैल 2021 में सुप्रीम कोर्ट के अगले चीफ जस्टिस होने वाले हैं।
जगन ने ऐसा कदम क्यों उठाया? जगन के करीबी लोगों का कहना है कि वह देश के पहले मुख्यमंत्री हैं, जिन पर 31 आपराधिक मुकदमे हैं तथा इनमें से 11 की जांच सीबीआई तथा सात प्रवर्तन निदेशालय द्वारा किया जा रहा है। यह मामले आय के ज्ञात स्रोत से अधिक आय से जुड़े हैं। उनकी जांच और सुनवाई चल रही है लेकिन बहुत धीमी गति से। गत 16 सितंबर को जस्टिस रमन्ना ने निर्देश दिया था कि देश के सभी सांसदों, विधायकों तथा एमएलएसी के विरुद्ध दर्ज मुकदमों की सुनवाई साल भर में पूरी कर दी जाये। देश में किसी भी अदालत द्वारा दिए गए स्टे को हटाया जाए और इसकी निगरानी सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री करेगी। यदि मामलों की रोजाना सुनवाई होती है तो सबसे पहले कौन भुगतेगा? साफ है कि जगन, जिनकी नींद फैसले के एक माह बाद खुली और उन्होंने जज के खिलाफ स्वयं विवादास्पद पत्र लिख दिया। क्या जगन का यह पत्र उनके लिए आत्मघाती साबित होगा? ऐसा लगता तो नहीं!

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