अब बैगर यूपीएससी की परीक्षा पास किए बन सकते हैं वरिष्‍ठ नौकरशाह

नयी दिल्‍ली : यह सुनने में थोड़ा हैरानी वाली बात हो सकती है पर अब यह सच्‍चाई है कि अब भारत सरकार में संयुक्त सचिव स्‍तर के पद के लिए आपको यूपीएससी की परीक्षा पास होना जरूरी नहीं है। यही नहीं इसके लिए आईपीएस, आईआरएस या इंजीनियरिंग सर्विस से होना भी जरूरी नहीं है। बल्कि एक निजी संस्‍था का अधिकारी भी भारत सरकार में सीधे संयुक्‍त सचिव बन सकता है, उल्‍लेखनीय है कि आईएएस पास करने वाले युवाओं को भी इस पद पर पहुंचने में अमूमन 16 साल लग जाते हैं। आखिर सरकार ने ऐसा क्‍यों किया और इसके क्‍या फायदे हैं ? अगर ऐसा है तो आईएएस अधिकारी बनने की ख्‍वाहिश रखने वाले युवा क्‍यों सालों दिन-रात एक करते रहते हैं ? सरकार ने एक फैसले के तहत एक झटके में विभिन्‍न क्षेत्रों से आने वाले 9 विशेषज्ञों को लेटरल प्रवेश प्रक्रिया द्वारा संयुक्‍त सचिव बनाया है। इस प्रक्रिया के जरिए पहली बार इतनी बड़ी संख्या में अलग-अलग मामलों के विशेषज्ञ सरकार में शामिल होंगे। योग्यता के मुताबिक सामान्य ग्रेजुएट और किसी सरकारी, पब्लिक सेक्टर यूनिट, यूनिवर्सिटी के अलावा किसी प्राइवेट कंपनी में 15 साल काम का अनुभव रखने वाले भी संयुक्‍त सचिव पद के योग्‍य हो सकते हैं। गौरतलब है लंबे समय से सरकारी क्षेत्र के उच्‍च पदों पर प्राइवेट सेक्‍टर के लोगों की भर्ती की मांग उठती आ रही है। इसे देखते हुए नरेंद्र मोदी सरकार ने 2015 में लेटरल एंट्री प्रोसेस में बड़ा संशोधन किया। हालांकि यह प्रक्रिया पहले से अस्तित्‍व में था और पहले भी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह अहलूवालिया, पूर्व आईबीआई गवर्नर बिमल जालान, पूर्व पेट्रोलियम व वित्त सचिव विजय केलकर, पूर्व ऊर्जा सचिव आरवी शाही जैसे लोगों की नियुक्ति हुई। भारत सरकार में 34 साल तक वरिष्‍ठ पदों पर काम करने वाले सेवानिवृत आईएएस अधिकारी सूर्य प्रताप सिंह के अनुसार, केंद्र सरकार ने इसके लिए यूपीएससी सर्विस नियमों में संशोधन किया है। इसके तहत संयुक्‍त सचिव बनने के लिए आपको प्राइवेट सेक्‍टर में उच्‍चाधिकारी बनना भी जरूरी है। लेकिन विभिन्‍न सरकारें इस संशोधन का दुरुपयोग भी करती हैं। वे पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हुए अपने लोगों को इन पदों पर नियुक्‍त करते हैं, जिससे इसका मकसद ही खत्‍म हो जाता है। साल 2005 में जब प्रशासनिक सुधारों के लिए पहली रिपोर्ट पेश की गई उस समय ब्यूरोक्रेसी में लेटरल एंट्री का पहला प्रस्ताव रखा गया था। इसके बाद वर्ष 2010 में दूसरी प्रशासनिक सुधार रिपोर्ट में भी इसकी अनुशंसा की गई।

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