मौत से जिंदगी की जंग के वो नौ घंटे, लगा कि अब परिवार से कभी नहीं मिल पाएंगे

मुंबईः देश के तटीय क्षेत्रों में चक्रवात ताउते ने हाल ही में भीषण तांडव किया था, जिससे जानमाल को काफी नुकसान पहुंचाया था। चक्रवात ताउते के कहर के चलते मुंबई से 175 किलोमीटर दूर समुद्र में बार्ज पी305 भी इसकी चपेट में आकर डूब गया। इस बार्ज में सवार 261 में से 186 लोगों को नौसेना के बहादुर जवानों ने बचा लिया। इन्हीं में से एक महाराष्ट्र के रहने वाले मैकेनिकल इंजीनियर अनिल वायचाल ने अपनी रोंगेटे खड़े कर देने वाली आपबीती सुनाई।
अनिल वायचाल ने कहा कि तूफानी लहरों में जिंदगी और मौत के बीच जूझते हुए कभी सोचा नहीं था कि अपने परिवार से फिर कभी मिल पाऊंगा। बार्ज पी305 के पीड़ित अनिल वायचाल ने बताया कि वे भी बार्ज पी305 में सवार थे। जब बार्ज डूब रहा था तो उन्होंने जान बचाने के लिए अपने साथियों के साथ समुद्र में छलांग लगा दी थी। तेज हवा और तूफानी लहरों में नौ घंटे तक जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे थे। सिवाय पानी के दूर-दूर तक कोई मदद के लिए नजर नहीं आ रहा था। फिर आखिरकार उम्मीद की किरण बनकर भारतीय नौसेना के जवान वहां पहुंचे और उन्होंने पूरे नौ घंटे बाद हम लोगों को बचा ही लिया। 
…उम्मीद नहीं थी जिंदा बच पाऊंगा

40 वर्षीय अनिल वायचाल एफकॉन्स कंपनी में काम करते हैं। ये कंपनी ओएनजीसी के लिए कॉन्ट्रैक्ट पर समुद्र में काम करती है। बार्ज पी305 के पीड़ित अनिल कुमार ने बताया कि वो 9 घंटे उनके लिए पूरे जीवन के बराबर थे। उनको यह आशा नहीं थी कि वह जिंदा बचा पाएंगे और अपने परिवार से मिल पाएंगे।
फिर भी जीने की एक आश बनी रही..
पी305 पीड़ित ने बताया, ”मेरे अंदर यह भावना थी कि मैं जीवित रह सकता हूं। मैंने अपने साथियों को भी इसके लिए प्रेरित किया। मैंने उनसे कहा कि हमें जिंदा रहना होगा और अपने परिवार के पास वापस जाना होगा। मुझे भी नहीं पता कि मेरे अंदर उस समय यह शक्ति कहां से आई थी। मैं काफी संवेदनशील व्यक्ति हूं।” अनिल वायचाल ने बताया कि 17 मई की रात दो बजे के करीब बार्ज चक्रवात ताउते की चपेट में आया। बार्ज जब डूब रहा था तो वायचाल के पास अपने साथियों संग समुद्र में कूदने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। वह अपने साथियों के साथ शाम पांच बजे समुद्र में कूद गए थे।
वायचाल ने बताया कि उन्होंने अपने साथियों से समूह में समुद्र में कूदने को कहा था।  उनका मानना था कि जितना बड़ा समूह होगा, बचने की उम्मीद उतनी अधिक होगी। उन सभी ने जो लाइफ जैकेट पहन रखी थी, वो अंधेरे में चमकती थी। इसका मतलब था कि अगर समुद्र में समूह में वे लोग रहते तो बड़े स्तर पर आसमान से लाइफ जैकेट चमकती नजर आतीं। इससे बचावकर्मी उन तक पहुंच सकते थे, लेकिन खराब मौसम में समूह में रहना आसान नहीं था।
एक वक्त आया मैं अकेला हो गया..
अनिल ने बताया कि हमने दो से तीन लोगों का समूह बनाया और एक-दूसरे का हाथ पकड़कर समुद्र में साथ रहने लगे, लेकिन हम दूसरे समूहों को नहीं देख पा रहे थे। अगर वे दिखते भी थे तो अगले ही समय में वे गायब हो जाते थे। वहां का मौसम बहुत खराब था। उन्होंने बताया कि उस समय समुद्र में लहरें 8 मीटर तक ऊंची थीं। जैसे ही वे आती थीं हम अलग हो जाते थे। इसके बाद हम फिर समूह बनाते थे। इस 9 घंटे में मैं 3 से 4 समूहों के साथ था, लेकिन इसके बाद ऐसा समय आया, जब मैं बिलकुल अकेला हो गया और उस वक्त लगा कि अब नहीं बचूंगा। आखिरकार आईएनएस कोच्चि की टीम ने 17-18 मई की दरम्यानी रात 2 बजे बचा लिया और आज मैं परिवार के साथ हूं।
 

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