मोदी के रामबाण ने चीन को वेधा

राजनीतिक गपशप
शायद बहुत कम लोगों ने ध्यान दिया कि अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि के शिलान्यास के दौरान मोदी जी ने चीन पर टिप्पणियों के तीखे बाण छोड़े। उन्होंने भूमि पूजन के बाद साधु-संतों और नेताओं को संबोधित करते हुए श्रीराम जी की नीति का उल्लेख करते हुए दोहा कहा कि ‘बिनु भय होत न प्रीति’ अर्थात भय के बिना प्रेम नहीं हो सकता। हालांकि उन्होंने संबोधन में चीन का नाम नहीं लिया, लेकिन इस चौपाई में खास करके वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत चीन के बीच सैन्य तनाव दिखता है। मोदी जी चीन के प्रति उस समय से कड़ा रुख अपना रहे हैं जब से वास्तविक नियंत्रण रेखा पर धूर्त चीन से तनाव आरंभ हुआ है।
पिछले कुछ समय से चीन लगातार दावा कर रहा है कि सैनिक पीछे हटने की कार्रवाई पूरी हो चुकी है, लेकिन भारत ने साफ कह दिया है कि अभी ऐसा नहीं हुआ है। मोदी जी चीन से बहुत नाराज हैं। हालांकि उन्होंने अपने भाषण में चीन का उल्लेख किया है। यह उल्लेख उस वक्त किया गया जब चीन में ऐतिहासिक संदर्भ में श्रीराम को पाया गया था। वस्तुतः उनके भाषण में 5 दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों का जिक्र था- इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, लाओस और कंबोडिया तथा साथ ही पड़ोसी देश नेपाल और श्रीलंका का भी, जहां श्रीराम जी की एकाधिक तरीके से पूजा होती है। मोदी जी भगवान राम की पहुंच और उनके शिक्षा की बात करते हुए परोक्ष रूप से मुस्लिम देशों को पटा रहे थे खासकर इंडोनेशिया को। इसके बाद चीन का जिक्र आया, जब मोदी जी कहते हैं कि राम का संदर्भ चीन और यहां तक कि ईरान में भी मिलता है। उन्होंने कहा कि इन देशों की संस्कृति पर सनातन ग्रंथ रामायण का प्रभाव आज भी दिखता है। और इसके बाद उन्होंने कहा, ‘अगर कोई देश ताकतवर होता है तो शांति कायम करने के योग्य होता है।’ मोदी जी ने बड़े ही बलपूर्वक स्थापित किया कि दुनियाभर को भारतीय संस्कृति ने बहुत कुछ दिया है। भारत दुनिया के सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया से भी सांस्कृतिक और रणनीतिक गठबंधन बनाए हुए है। ‘भय बिनु होइ न प्रीति’ के उनके कथन ने कूटनीतिक क्षेत्र को हैरत में डाल दिया है। इससे यह भी संकेत मिलता है भारत-चीन के मसले का हल सहज नहीं है।
मोदी ने कैसे इतिहास में अपना नाम दर्ज कर लिया : 5 अगस्त का उल्लेख इतिहास में भी होगा और उसके साथ ही यह भी कहा जाएगा कि प्रधानमंत्री मोदी ने श्रीराम मंदिर के निर्माण के लिए भूमि पूजन कर करोड़ों हिंदुओं के सपने को अपने शासनकाल में पूरा किया। अगर वह 5 अगस्त को राम जन्म भूमि में मुख्य अतिथि थे तो 2023 की रामनवमी को ‘भव्य राम मंदिर’ का उद्घाटन भी वही करेंगे। उन्होंने मंदिर के ट्रस्टियों और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को स्पष्ट कहा है कि वे चाहते हैं मंदिर तय समय पर तैयार हो जाए। केंद्र सरकार न्यास को कोई धन नहीं देगी और विश्वव्यापी अभियान चलाकर ट्रस्ट इसके लिए धन संग्रह करेगी। मंदिर के निर्माण और अन्य सहायक गतिविधियों के लिए 5000 करोड़ का कोष बनाया जाएगा। हां, केंद्र और राज्य सरकार अयोध्या के आधुनिक आध्यात्मिक शहर के रूप में विकास के लिए धन जरूर देगी।
अयोध्या को वैटिकन शहर या मक्का के तर्ज पर विकसित किया जाएगा। मोदी जी की कई कारणों से इसके प्रति व्यक्तिगत रुचि है। वह 1990 की राम मंदिर रथ यात्रा का हिस्सा थे और आज उनका सपना पूरा हो रहा है। एक तरह से मोदी ने इतिहास कायम कर दिया। लालकृष्ण आडवाणी की राम मंदिर रथ यात्रा के मुख्य आयोजक मोदी जी ही थे। यह यात्रा 25 सितंबर, 1990 को सोमनाथ मंदिर से शुरू हुई थी। यदि आडवाणी उस दिन रथ पर आरूढ़ हुए थे तो मोदी जी सोमनाथ में उसके सारथी थे। मोदी जी ही आडवाणी को सोमनाथ से मुंबई ले गए और वहां उन्होंने इसकी कमान प्रमोद महाजन को सौंप दी। प्रमोद महाजन पूरे देश रथयात्रा के मुख्य आयोजक थे। परंतु गुजरात चरण में इसका नेतृत्व मोदी जी ने अपने हाथ में लिया हुआ था। मोदी जी के लिए दूसरा संतोष का विषय था कि उन्होंने 1528 में मुगल आक्रांता बाबर द्वारा हिंदुओं के प्रति किए गए अन्याय का बदला ले लिया। बाबर ने ही 1528 में अयोध्या में मंदिर को गिराकर वहां मस्जिद बनाई थी। 492 वर्ष बाद मोदी जी ने उसी स्थान पर उसी राम मंदिर की आधारशिला रखी। मोदी जी ने अपने भाषण में बहुत ही संक्षिप्त शब्दों से इसका जिक्र किया और कहा कि ‘सदियों की प्रतीक्षा आज खत्म हो गई।’ स्वाभाविक है कि मोदी जी का नाम इतिहास में लिखा जाएगा क्योंकि उन्हीं के शासनकाल में मंदिर का निर्माण आरंभ हुआ है।
नगदी से जूझ रही सरकार अब सोने के शरण में : सरकारी राजस्व में भारी कमी आई है, चाहे वह आयकर हो, जीएसटी हो या सीमा शुल्क या अन्य हो। इससे चिंतित मोदी सरकार अब आय का हर तरीका आजमाना चाहती है। सार्वजनिक उपक्रमों को बेचकर धन संग्रह करने की चाह पूरी नहीं हो पाई, क्योंकि बाजार में मंदी है और खरीदार नहीं हैं। इसलिए मोदी सरकार ने गोल्ड एमनेस्टी नामक पुरानी योजना को नया रंग देने का काम में देना शुरू किया है। इस योजना के तहत सरकार लोगों से कहेगी कि अपने पास रखे अघोषित सोने-चांदी की घोषणा कर दें और उस पर टैक्स भर दें। मोदी सरकार ने पहली बार इसकी परिकल्पना नोटबंदी के बहुत पहले की थी। दुनिया के सबसे बड़े निजी स्वर्ण भंडार का उपयोग करने के लिए मोदी सरकार ने 2015 में सरकार समर्थित तीन योजनाएं बनाई थीं ताकि घरों-संस्थानों में रखे लगभग 25,000 टन सोने के भौतिक मांग को कम किया जाए और आयात घटाया जाए। ऐसा लोगों को सोने में निवेश के वैकल्पिक रास्ते देकर किया जाना था। लेकिन यह योजना फेल हो गई, क्योंकि कुछ लोग अपने सोने, विशेषकर अपने गहनों में किसी का दखल नहीं चाहते जो विशेष अवसरों पर पहने जाते हैं। वहीं, कुछ लोगों को टैक्स अधिकारियों द्वारा दंडित होने का डर था।
मोदी जी ने पहली बार लोगों से काले धन की घोषणा करने को कहा था, लेकिन उसकी शर्तें इतनी सख्त थीं कि शायद ही कोई सामने आया। गुस्से में मोदी जी ने नोटबंदी कर दी। अब सरकार सोने का अवैध भंडारण किए बैठे लोगों के लिए गोल्ड स्कीम पर विचार कर रही है ताकि कर चोरी पकड़ में आ जाए और सोने का आयात भी घट जाए। सरकार चाहती है कि लोग अघोषित सोने की घोषणा कर दें और उस पर टैक्स तथा जुर्माना भर दें तो उन्हें माफी मिल जाएगी। लेकिन ऐसी किसी एमनेस्टी योजना का खतरा है, क्योंकि देश की सर्वोच्च अदालत आदेश दे चुकी है कि भारतीय पूर्ण माफी का दावा नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसे कार्यक्रमों का दंड ईमानदार करदाताओं को भुगतना पड़ता है। सोने की कीमतों में इस साल 30% की अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। महामारी के कारण डॉलर के भाव गिर रहे हैं और ब्याज भी घटता जा रहा है, इसलिए लोग अपने अघोषित धन को जमा करने के लिए ‘स्वर्ग’ खोज रहे हैं। सरकार सोने के मौद्रीकरण के लिए तरह-तरह के उपाय कर रही है। उस पर ब्याज देने से उसे बाजार दर से जोड़ने तक, ताकि जब चाहें अपना सोना वापस ले सकते हैं।
सचिव स्तर के 3 पद खाली, एक के एक्सटेंशन पर यू-टर्न : पेयजल और सैनिटेशन विभाग के सचिव परमेश्वरन अय्यर के इस्तीफे के बाद भारत सरकार के पास सचिव स्तर के 3 पद खाली हैं। सूचना और प्रसारण विभाग तथा खनन विभाग के पद पहले से ही खाली हैं। अचानक डीओपीटी ने सारे अफसरशाही को सकते में ला दिया जब 1993 बैच के आईएएस अधिकारी आलोक कुमार को 1 वर्ष का एक्सटेंशन देने के बाद तत्काल पद छोड़ने के लिए कहा। नीति अायाेग के अफसर इस पर विचलित हो गये। नियुक्ति के लिए गठित कैबिनेट कमेटी में उन्हें 28 मई को ही 1 साल का एक्सटेंशन दिया था, लेकिन अचानक कमेटी ने अपने उस आदेश की समीक्षा की और पद छोड़ देने के लिए कहा। यह पूरे विभाग में चर्चा का विषय है बड़े कामों की जिम्मेदारी संभाल रहे आलोक कुमार के साथ आखिर ऐसा क्यों हुआ? ऐसा सुनने में आया है कि स्वास्थ्य मंत्रालय और नीति आयोग में नीतियों लेकर मतभेद था। सरकार चाहती थी कि कुछ फैसलों की समीक्षा हो और आलोक कुमार ऐसा नहीं चाहते थे।
“संन्यासी” जगह-जगह जा रहे हैं : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जब से सत्ता में आए तब से पार्टी में उनका राजनीतिक ग्राफ तेजी से ऊपर उठ रहा है। दिल्ली के लुटियंस की चमक-दमक से अलग योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश में कठोर परिश्रम कर रहे हैं और देश में अपनी छवि चमकाने का काम कर रहे हैं। बेशक वे एक भगवाधारी योगी हैं, लेकिन उनकी विचारधारा और उनका हिंदुत्व प्रशासक के रूप में कहीं आड़े नहीं आता है। वह सख्त प्रशासक और फालतू बकवास न सुनने वाले के रूप में उभरे हैं। राजनीतिक वर्ग और अभिजात्य वर्ग उनके काम करने के ढंग से सहमत नहीं हो सकता और हो सकता है उन्हें मुस्लिम विरोधी भी कहे। कुछ यह भी कह सकते हैं कि वे जात पात को बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन उन्होंने पार्टी में अपनी जगह बना ली है। वे अपने तरीके से लड़े और अब वह मुख्यमंत्रियों में सबसे ऊपर हैं।
जाहिर है पार्टी में वह शिवराज सिंह चौहान से भी बहुत आगे हैं। भाजपा के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि वे अब ‘तीसरे स्तंभ’ बन चुके हैं, पहले दो हैं – नरेंद्र मोदी और अमित शाह। निश्चय ही राजनाथ सिंह भी हैं जो आधिकारिक तौर पर पार्टी और सरकार में दूसरे नंबर पर हैं। लेकिन योगी ने देश के हिंदुत्ववादी बलों के मन को खुश कर दिया है। चार बार लोकसभा सांसद रहने के बावजूद वे सक्रिय राजनीति में जगह नहीं बना पाए थे। लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति का सबसे जिम्मेदारी संभालने के बाद उनके काम से उनके दुश्मन भी सदमे में हैं। दिल्ली तक भारी विरोध के बावजूद वे मंच पर ‘पहुंच गए’। पता चला है कि प्रधानमंत्री मोदी भाजपा में अन्य की तुलना में उनसे बहुत प्रसन्न हैं। मंदिर समारोह में अतिथियों की सूची ने यह संकेत दिया है कि वे दिल्ली के कई शीर्षस्थ नेताओं से भी आगे हैं। खबरों को मानें तो वे सितंबर-अक्टूबर में अमेरिका जाने की संभावनाएं भी तलाश रहे हैं। वह उसी जन समुदाय को संबोधित करना चाहते हैं, जिसे मोदी जी ने संबोधित किया था। कुछ लोगों ने सलाह दी है कि राष्ट्रपति चुनाव के बाद जनवरी में अमेरिका जाएं। अभी अंतिम फैसला होना बाकी है।

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