मिलावट के बावजूद भारतीय बाजारों में बिकने वाले दूध स्वास्‍थ्य के लिए फायदेमंद

नई दिल्लीः भारतीय बाजारों में बिकने वाले दूध को मिलावटी कह देना एक आम बात हो गई है। लेकिन इसकी वास्तविकता कुछ और है। हाल ही में भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की ओर से ‘राष्ट्रीय दूध सुरक्षा और गुणवत्ता सर्वेक्षण’ कराया गया। इस सर्वेक्षण से दूध की मिलावट के बारे में ऐसी कई बातें सामने आईं हैं जो कि हैरान कर देने वाली हैं। दूध में स्वीकृत स्तर से अधिक मात्रा में हाईड्रोजन पेरॉक्‍साइड, डिटरजेंट, यूरिया, न्यूट्रलाइजर और एफ्लेटॉक्‍सिन एम1 तत्व पाए जाने के बावजूद विशेषज्ञों ने भारतीय बाजारों में बिकने वाले दूध को स्वास्‍थ्य के लिए सुरक्षित बताया है।

6 हजार से अधिक नमूनों की जांच
एफएसएसएआई के इस सर्वेक्षण के ‌लिए देशभर से दूध के कुल 6,432 नमूने इकट्ठे किए गए। इन नमूनों को इकट्ठा करने के लिए करीब एक हजार ऐसे कस्बों और शहरों को चुना गया था जिनकी आबादी 50 हजार से अधिक है। इन नमूनों में कच्चे दूध के साथ ही प्रोसेस्ड दूध ‌को भी शामिल किया गया था जिन्हें संगठित (विक्रेता व उत्पादक) और असंगठित (स्‍थानीय डेयरी फर्म, दूध विक्रेता और दूध मंडी) दोनों तरह के क्षेत्रों से लिया गया था। एकत्रित सभी नमूनों की जांच समान विधि द्वारा की गई जिसके लिए गुणवत्ता और सुरक्षा के कड़े मापदंडों को अपनाया गया था।

पुष्टि के लिए दूसरे स्तर पर हुई जांच
पहले स्तर पर जांच में जो नमूने विफल रहे उन्हें दूसरे स्तर की जांच के लिए भेज दिया गया ताकि इनमें प्राप्त दूषित अथवा मिलावटी तत्वों की पुष्टि की जा सके। इसके लिए जिन परीक्षण केंद्रों का चयन किया गया, वे उच्च-स्तरीय उपकरणों से युक्त होने के साथ ही एनएबीएल और एफएसएसएआई द्वारा मान्यता प्राप्त हैं। यहां अनुभवी विश्लेषकों ने दूध के नमूनों की बारीकी से जांच करते हुए इनमें प्राप्त मिलावटी तत्वों की पुष्टि की।

केवल 12 नमूने असुरक्षित पाए गए
जांच के बाद केवल 12 नमूने ऐसे पाए गए जो कि इंसानों के सेवन के लिए सुरक्षित नहीं थे। इनमें से 6 नमूनों में हाईड्रोजन पेरॉक्साइड, 3 में डिटरजेंट, 2 में यूरिया और एक में न्यूट्रलाइजर मिला हुआ पाया गया। जबकि, मिलावटी तत्वों में गिने जाने वाले बोरिक एसिड और नाइट्रेट को किसी भी नमूने में पाया नहीं गया। दूध के इन 12 नमूनों में से 9 नमूने तेलंगाना से, 2 मध्यप्रदेश से और 1 केरल से लिए गए थे।

पहली बार किया गया एफ्लेटॉक्‍सिन एम 1 का आंकलन
वहीं, 5.7 प्रतिशत यानि 368 नमूनों में स्वीकृत स्तर से अधिक मात्रा में एफ्लेटॉक्‍सिन एम 1 पाया गया है जो कि इस सर्वेक्षण से प्राप्त नतीजों के प्रमुख बिंदुओं में से एक रहा। कच्चे दूध के मुकाबले प्रोसेस्ड दूध में एफ्लेटॉक्‍सिन एम 1 की समस्‍या अ‌धिक पाई गई है। यह तत्व पशु आहार या चारे के जरिए दूध में शामिल होता है और वर्तमान में देश में इस पर नियंत्रण की कोई व्यवस्‍था नहीं है। जिन राज्यों से‌ लिए गए नमूनों में यह सबसे ज्यादा मात्रा में पाया गया उनमें तमिलनाडु (551 में से 88 नमूनों में), दिल्ली (262 में से 38 नमूनों में) और केरल (187 में से 37 नमूनों में) सबसे आगे हैं।

गुणवत्ता पर निर्भर करती है दूध की चिकनाई
सर्वेक्षण से प्राप्त नतीजों में सामने आया कि 41 प्रतिशत नमूने सेवन के लिए सुरक्षित होने के बावजूद किसी न किसी मापदंड पर सफल नहीं हो पाए। इनमें चिकनाई या कम एसएनएफ (चिकनाई नहीं ठोस) के आधार पर भी कई नमूनों को स्वीकार नहीं किया गया। ये दोनों ही कच्चे और प्रोसेस्ड दूध की गुणवत्ता के मुख्य मापदंड हैं।

दरअसल, चिकनाई या चिकनाई से अलग ठोस (एसएनएफ) पशुओं की प्रजात‌ि व नस्ल के साथ ही उनके आहार की गुणवत्ता पर भी निर्भर करता है और इसीकारण कच्चे दूध में यह अलग-अलग मात्राओं में मौजूद रहता है। सर्वेक्षण के तहत एकत्रित दूध के कुल नमूनों में से 156 में मलतोडेक्षत्रीन और 78 में चीनी की मात्रा पाई गई है जो कि हैरानी की बात है। हालांकि, केवल प्रोसेस्ड दूध में ये दोनों चीजें मिली हैं। इस तरह की मिलावट चिंताजनक है जिसे रोका जाना चाहिए। वहीं, अन्य मापदंडों जैसे सेल्यूलोज, ग्लूकोज, स्टार्च और वनस्पति तेल के आधार पर इन नमूनों में कोई कमी नहीं मिली है।

नवंबर 2018 में प्रकाशित हुई रिपोर्ट
हितधारकों के साथ विस्तृत चर्चा के बाद इस अंतरिम रिपोर्ट को अंतिम रूप देते हुए नवंबर 2018 में प्रकाशित किया गया था। 9 ‌सितंबर, 2019 में हुई हितधारकों की बैठक में चर्चा के बाद इस रिपोर्ट पर स्वीकृति दी गई। इन हितधारकों की यह धारणा थी कि मिलावट को रोका नहीं जा सकता। हालांकि, मिलावट की यह प्रक्रिया कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित है और विशेषकर दूध की मांग और उत्पादन की मात्रा में भारी अंतर के दौरान यह देखी जाती है।

खाद्य पदार्थों में मिलाया जाता है अमोनियत सल्फेट
इसके अलावा हितधारकों द्वारा दूध में अमोनियम सल्फेट की मौजूदगी पर भी विचार किया गया। वैज्ञानिक सुझाव का बारीकी से निरीक्षण करने के बाद, यह समूह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि अमोनियम दूध में प्राकृतिक तरीके से शामिल होता है और यह सेवन के लिए पूरी तरह सुरक्षित है, हालांकि, पहले इसे दूध में एक दूषित पदार्थ के तौर पर देखा जाता था।

93% से भी ज्यादा नमूने स्वास्‍थ्य के लिए सुरक्षित
अंततः यह कहा जा सकता है कि भारतीय बाजारों में बिकने वाला दूध मानव स्वास्‍थ्य के लिए अधिकांशतः सुरक्षित है। सर्वेक्षण के तहत कुल 6,432 नमूनों के 93 प्रतिशत से भी ज्यादा यानि 5976 नमूने इंसानों के सेवन के लिए पूरी तरह से सुरक्षित पाए गए। यह भारतीय उपभोक्ताओं के लिए बेशक एक खुशखबरी है। एफएसएसआई ने पहली बार ऐसा सर्वेक्षण किया है जिसमें इतने ‌विस्तृत तरीके से दूध की सुरक्षा और गुणवत्ता की जांच की गई है । इसके साथ ही दूध में मिलावटी तत्वों व दू‌षित पदार्थों का मात्रात्मक विश्लेषण भी पहली बार किया गया है। इन विश्लेषणों से यह सामने आया है कि दूध में इन मिलावटी तत्वों और दूषित पदार्थों की मौजूदगी खतरे के स्तर से काफी कम है और इसके सेवन से मानव स्वास्‍थ्य को कोई नुकसान नहीं है।

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