सन्मार्ग विशेष : भगवान जगन्नाथ तो हर साल ही ‘क्वारंटाइन’ होते हैं

भगवान जगन्नाथ के स्नान दिवस ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा के उपलक्ष्य में विशेष
सर्जना शर्मा, नयी दिल्ली : हिन्दू कैलेंडर के ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा को यानी आज 108 कलशों से स्नान करने के बाद भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा बीमार पड़ जायेंगे। तीनों पंद्रह दिन के लिए स्नान बेदी से सीधे अणासर यानी गृभगृह से दूर एकांतवास में चले जाएंगे। भक्तों को दर्शन नहीं देंगे और केवल तरल पेय लेंगे, अभ्यंगं (मालिश) करवायेंगे। यह आदि काल से चली आ रही परम्परा है। जिसे हम कोरोना काल में क्वारंटाइन कह रहे हैं वो तो हमारी हजारों वर्ष पुरानी नीति (ओड़िशा में भगवान की पूजा के विधि विधान को नीति कहा जाता है) है। जयेष्ठ पूर्णिमा भगवान जगन्नाथ की जन्मतिथि है। चार पवित्र धामों में से एक श्री जगन्नाथ धाम में भगवान विष्णु जगन्नाथ रूप में विराजते हैं। ये एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान के विग्रह काष्ठ के हैं और यहां भगवान अपने भाई और बहन के साथ हैं। यही एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां वैदिक ब्राह्मण और शबर जनजाति के सेवक दैतापति मिलकर भगवान की नीतियां करते हैं। अणासर में एकांतवास, रथ यात्रा, बहुड़ा यात्रा, सोना वेष, अधर पाना और नीलाद्री विजय लगभग एक महीना भगवान जगन्नाथ दैतापतियों की पूर्ण देखरेख में रहते हैं।
मालिश से काढ़े तक…
बीमार पड़ने के बाद भगवान वैसे ही रहते हैं जैसे कोई भी बीमार व्यक्ति रहता है। रत्न सिंहासन वाले वस्त्र उतार कर बिल्कुल सादे सूती श्वेत रंग के आरामदेह वस्त्र पहनते हैं। सब आभूषण उतार दिए जाते हैं। भोजन में केवल फल, जूस और तरल पेय। पांचवें दिन बड़ा उड़िया मठ से फुलेरी तेल आता है जिससे की मालिश की जाती है। मिट्टी के बर्तन में तिल का तेल, कुछ औषधियां और सफेद फूल भरकर स्नान पूर्णिमा के दिन जमीन में गाड़ दिया जाता है और एक साल बाद स्नान पूर्णिमा के दिन ही निकाला जाता है। आयुष मंत्रालय भी कोरोना से बचने के लिए तेल की मालिश और कुछ बूंदें नाक में डालने की सलाह दे रहा है। भगवान पर रक्त चंदन और कस्तूरी का लेप किया जाता है। दशमूलारिष्ट में नीम, हल्दी, हरड़, बेहड़ा, लौंग आदि अनेक जड़ी बूटियों के काढ़े से नर्म मोदक बनाकर भगवान को दसवें दिन खिलाए जाते हैं।
15 दिन एकांतवास और खिचड़ी
पूरे वर्ष श्री मंदिर में रहकर भगवान लाखों भक्तों को दर्शन देते हैं। श्री मंदिर के गृभगृह में रत्न सिंहासन के भीतर बिजली या बिजली का कोई उपकरण प्रयोग नहीं किया जाता। भारी पोशाक, गहने-फूलों का श्रृंगार, धूप-दीप, आरतियां यानी सुबह से रात तक व्यस्त दिनचर्या। अणासर में भगवान को इन क्रियाओं से मुक्ति मिल जाती है। भक्तों को भी पंद्रह दिन दर्शन नहीं देते। चौदह दिन के बाद भगवान के विग्रहों को फिर से सजाया जाता है। रथयात्रा वाले दिन उन्हें खिचड़ी बनाकर खिलायी जाती है। रथयात्रा से पहले फिर रत्न सिंहासन पर आते हैं, भक्तों को नवजौबन दर्शन देकर अपनी मौसी रानी गुंडीचा के घर चले जाते हैं।

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