नोटबंदी के बाद 50 लाख लोगों के हाथ से गई नौकरियां : रिपोर्ट

नई दिल्ली : याद ही होगी वो तारीख 8 नवंबर, 2016 जब रातों रात देशभर में नोटबंदी की घोषणा कर मोदी सरकार ने देशवासियों को चौंका दिया था। उसके बाद रातों रात 1000-500 के नोट बंद कर दिए थे। आपको बता दें कि इस नोटबंदी को चार साल हो गए। 2016 से लेकर अब तक इससे होने वाले प्रभावों को आधार बनाकर चेन्नई की अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर ससटेनेबल इम्पलॉयमेंट ने एक रिपोर्ट जारी की है। इसमें बताया गया है कि 8 नवंबर 2016 की आधी रात लागू हुई नोटबंदी के कारण देशभर के 50 लाख से भी ज्यादा लोगों ने नौकरियां गवांई है।
जारी की गई इस ताजा रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक के दौरान देशभर में बेरोजगारी की दर में लगातार इजाफा हो रहा है। 2016 के बाद यह अपने अधिकतम स्तर को छू गया है। साल 2016 की तीसरी तिमाही यानी सितंबर 2016 से दिसंबर 2016 के बीच शहरी और ग्रामीण लोगों की श्रम विभाजन बल (एलएफपीआर) में भागीदारी अचानक कम होने से नौकरियों में भी कमी आई। वहीं 2017 की दूसरी तिमाही में इसकी दर में थोड़ी कम आई लेकिन बाद में नौकरियों की संख्या लगातार कम होती गई जिसमें अब तक कोई सुधार नहीं हुआ है।
युवा वर्ग में सबसे ज्यादा बेरोजगारी

रोजगार और मजदूरी पर ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2019’ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में बेरोजगार ज्यादातर उच्च शिक्षित एवं युवा वर्ग हैं।  यह बेहद चिंता का विषय है। यह बात शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के पुरुषों और महिलाओं के वर्गों पर भी लागू होती है। शहरी महिलाओं के कामगार जनसंख्या में 10 फीसदी ही पढ़े लिखे हैं जबकि 34 फीसदी बेरोजगार हैं। वहीं, शहरी पुरुषों में 13.5 फीसदी शिक्षित हैं मगर 60 फीसदी बेरोजगार हैं। इतना ही नहीं बेरोजगारों में 20 से 24 साल की संख्या सबसे अधिक है।
पुरुषों की तुलना में महिलाओं पर पड़ा सबसे बुरा असर
इस रिपोर्ट में एक चौकाने वाला आकड़ा सामने आया है कि नोटबंदी की वजह से साधारण तौर पर पुरुषों की तुलना में महिलाओं पर इसका सबसे बुरा असर देखा गया है। महिलाओं में बेरोजगारी दर सबसे अधिक होती है साथ ही कामगार वर्ग में भी उनकी हिस्सेदारी कम होती है।
बता दें कि श्रम बल भागीदारी दर को एलएफपीआर कहा जाता है और अगर इसमें महिला कर्मचारियों के आंकड़े शामिल किए जाते हैं तो इस संख्या में और भी वृद्धि हो सकती है।
साल 2016 और 2018 के बीच भारत में काम करने वाले पुरुषों की आबादी में 16.1 मिलियन की वृद्धि हुई जबकि इसके उलट इस अवधि के दौरान डब्ल्यूपीआर की मात्रा में 5 मिलियन नौकरियों का नुकसान हुआ है। बता दें कि अभी तक इस रिपोर्ट में पुरुषों के आंकड़ों को ही शामिल किया गया है। महिलाओं को इसमें शामिल नहीं किया गया है।
बन सकता है चुनावी मुद्दा
लोकसभा चुनाव के दौरान इस रिपोर्ट के सामने आने से विपक्षी पार्टियों को बेरोजगारी को लेकर मोदी सरकार पर हमला बोलने का एक और मौका मिलेगा। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में रोजगार लगातार सबसे बड़े मुद्दे के तौर पर उभरकर सामने आता रहा है। लोगों के लिए रोजगार सबसे बड़ी चिंता है।

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