तेजी से पिघलता हिमलिंग बना विवाद का मुद्दा

श्रीनगर (जेके ब्यूरो): अमरनाथ यात्रा का प्रतीक हिमलिंग 20 दिनों के भीतर ही पिघल कर आधा रह गया। ऐसा उन 2 लाख भक्तों की सांसों की गर्मी के कारण हुआ जो इस दौरान कष्ट सहते हुए गुफा तक पहुंचे। श्राइन बोर्ड के अधिकारियों ने इसे प्राकृतिक प्रक्रिया कहा तो पर्यावरणविदों का कहना था कि क्षमता से अधिक श्रद्धालुओं को यात्रा की अनुमति देने से हिमलिंग पिघलता जा रहा है। हर साल यह जिस तेजी से पिघलता है कुछ दिनों बाद वह बमुश्किल ही दिख पाता है। गुफा में क्षमता से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने से हिमलिंग को नुकसान हो रहा है क्योंकि लाखों भक्तों की गर्म सांसों को वह सहन नहीं कर पाता।
हर बार श्राइन बोर्ड के अधिकारी कहते थे कि ग्लोबल वार्मिंग भी इसे प्रभावित करती रही है। वर्ष 1996 के अमरनाथ हादसे के बाद नीतिन सेन गुप्ता कमेटी ने 75000 से अधिक श्रद्धालुओं को यात्रा में शामिल नहीं होने की सिफारिश थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वर्ष 2013 में मात्र 2 दिनों में 75000, वर्ष 2014 में 29 दिनों में 3.5 लाख श्रद्धालु गुफा पहुंचे।
इस पर पर्यावरणविद कहते थे कि बेतहाशा यात्रियों की संख्या हिमलिंग को पिघलाने के साथ ही यात्रा मार्ग के पहाड़ों के पर्यावरण को भी जबरदस्त क्षति पहुंचाती है। भक्तों के अलावा गुफा के आस-पास सुरक्षाकर्मियों की भीड़ से आसपास का तापमान बहुत बढ़ जाता है। पर्यावरणविदों के समर्थन में कश्मीर के अलगाववादी सईद अली शाह गिलानी गुट ने यात्रा को 15 दिनों तक सीमित रखने और यात्रियों की संख्या कम करवाने को मुद्दा बनाया था। पिछले साल पहली बार दर्शन देने के समय बाबा बर्फानी के शिवलिंग का आकार 20 फीट था जो धीरे-धीरे 2-4 फुट का रह गया था।

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