डर की रफ्तार कोरोना से तेज होती हैं

-हमारे दिमाग का एक खास हिस्सा खतरों पर प्रतिक्रिया देने में अहम भूमिका निभाता है। इसका नाम है एमिगडला।

कोरोना वायरस के साथ-साथ उसका डर भी किसी महामारी की तरह फैल रहा है

कोरोना वायरस के साथ-साथ उसका डर भी किसी महामारी की तरह ही फैल रहा है। घबराए लोग घर पर जरूरी चीजों का स्टॉक इकट्ठा करते दिख रहे हैं। आज के दौर में मीडिया की पहुंच इतनी व्यापक और तेज हो गई है कि डर किसी खतरनाक वायरस से ज्यादा तेजी से फैलता है। किसी को डरा हुआ देखकर आप भी डर जाते हैं, भले ही आपको पता न हो कि उसके डर का कारण क्या है। मैं एक मनोचिकित्सक और शोधकर्ता हूं। सामाजिक व्यवहार से चलने वाले मनोभावों के मामले में हमारा दिमाग कैसे काम करता है, इसका अध्ययन करने के दौरान अक्सर मैंने देखा है कि डर का संक्रमण कितना ताकतवर हो सकता है।
डर के पीछे का विज्ञान
डर का संक्रमण जैविक विकास का हिस्सा रहा है। शोधकर्ता कई दूसरी प्रजातियों में इसका अध्ययन करते रहे हैं और वे बताते हैं कि डर होने पर हमारी प्रतिक्रिया एक प्रजाति के तौर पर हमारा बचे रहना सुनिश्चित कर सकती है। अफ्रीका के सवाना मैदानों में चरते हिरणों के किसी झुंड का ही उदाहरण ले लीजिए। अचानक झुंड में किसी सदस्य को शिकार के लिए बढ़ते किसी शेर की मौजूदगी का अहसास होता है। एक क्षण के लिए हिरण ठिठकता है और फिर तुरंत वह दूसरे साथियों को चेतावनी का संकेत देते हुए भागना शुरू करता है। उसकी देखा-देखी दूसरे हिरण भी भागने लगते हैं। खतरे पर किस तरह की प्रतिक्रिया देनी है, इसे लेकर हमारे दिमाग में एक पैटर्न तय है जो जैविक विकास की लंबी अवधि में बना है। किसी शिकारी की झलक, गंध या आवाज अपने आप ही झुंड के पहले हिरण की प्रतिक्रिया तय कर देती है । पहले वह एक पल के लिए ठिठकता है और फिर कुलांचें भरने लगता है। हमारे दिमाग का एक खास हिस्सा खतरों पर प्रतिक्रिया देने में अहम भूमिका निभाता है। इसका नाम है एमिगडला। यह इंद्रियों से आने वाली जानकारी ग्रहण करता है और खतरे का आभास होते ही हाइपोथैलेमस जैसे दिमाग के दूसरे हिस्सों को संकेत भेजता है जहां अलग-अलग हालात के हिसाब से शरीर द्वारा दी जाने वाली प्रतिक्रियाओं का समन्वय होता है। इसके नतीजे भय, अपनी जगह पर जम जाने, भागने या फिर लड़ने के रूप में दिखते हैं। यह सब स्वत:स्फूर्त होता है और इंसान सहित सभी जीवों में होता है। खतरा महसूस होने पर हिरण की प्रतिक्रिया को इससे समझा जा सकता है। लेकिन भय का संक्रमण इससे एक कदम आगे जाता है । झुंड के एक सदस्य के बाद सभी हिरणों का अपनी जान बचाने के लिए भागना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, लेकिन देखा जाए तो उनका ऐसा करना शेर के हमले के चलते नहीं होता, बल्कि वे ऐसा अपने झुंड के एक भयभीत सदस्य के व्यवहार को देखकर करते हैं। एक का डर पूरे झुंड में फैल जाता है और सारे सदस्य वैसा ही बर्ताव करने लगते हैं। दूसरे प्राणियों की तरह मनुष्य भी डर की उस भावना के प्रति संवेदनशील होता है जो उसके संबंधी जाहिर करते हैं। दूसरे लोग बचने के लिए क्या कर रहे हैं, यह वह बहुत तेजी से भांप सकता है। अध्ययन बताते हैं कि एंटीरियर सिंगुलेट कॉरटेक्स कहलाने वाला उसके दिमाग का एक खास हिस्सा उसकी इस क्षमता के लिए बहुत अहम होता है। यह हिस्सा उन तारों यानी फाइबर्स को घेरे होता है जो दिमाग के बाएं और दाएं हिस्से को जोड़ते हैं। अब आप किसी दूसरे शख्स को डर की हालत में दिखते हैं तो आपका एंटीरियर सिंगुलेट कॉरटेक्स सक्रिय हो जाता है। जानवरों में किए गए अध्ययन बताते हैं कि किसी दूसरे को डरा हुआ देखकर इसका संदेश एंटीरियर सिंगुलेट कॉरटेक्स से एमिगडला तक जाता है जहां से सुरक्षा प्रतिक्रिया शुरू होती है। यह समझना मुश्किल नहीं कि क्यों सामाजिक प्राणियों के अवचेतन में डर के संक्रमण की एक स्वचालित प्रक्रिया विकसित हुई होगी। इससे आपसी भावना में बंधे किसी समूह का एक साथ सफाया होने से रुकने में मदद मिलती है। इससे उस समूह के सारे सदस्यों के सभी साझे जीन संरक्षित होते हैं ताकि वे आगे की पीढ़ियों में जा सकें।अध्ययन बताते हैं कि डर का सामाजिक संक्रमण अजनबियों के बजाय मनुष्य सहित उन प्राणियों के बीच सबसे मजबूत होता है जो एक ही समूह से ताल्लुक रखते हैं। इसके अलावा कई मामलों में यह गुण एक ही समूह के ही नहीं, बल्कि दूसरी प्रजातियों के प्राणियों में सुरक्षा प्रतिक्रिया पैदा करने में भी सहायक साबित होता है। जैव विकास की प्रक्रिया में कई प्रजातियों ने दूसरी प्रजातियों के खतरे का अलार्म समझने की क्षमता विकसित कर ली है। उदाहरण के लिए चिड़ियों की कर्कश ध्वनि को सुनकर कई स्तनधारी प्राणी भी सचेत हो जाते हैं।
डर के संक्रमण से कैसे निपटें?
डर का संक्रमण अपने आप और हमारे अवचेतन के जरिये होता है। इसके चलते हमारे लिए इस पर काबू पाना मुश्किल हो जाता है। इससे समझा जा सकता है कि भीड़ वाली जगहों पर भगदड़ कैसे मचती है। भीड़ में जैसे ही डर बैठता है- उदाहरण के लिए किसी को लगता है कि गोली चली है- तो डर के स्रोत की पुष्टि के लिए न तो मौका होता है और न ही समय। हिरणों के झुंड वाली स्थिति हो जाती है। डर एक से दूसरे और फिर सबमें फैल जाता है। नतीजा यह होता है कि हर कोई जान बचाने के लिए भागने लगता है। अक्सर ही ऐसे हालात में बड़ी संख्या में मौतें होती हैं। डर का संक्रमण होने के लिए लोगों का एक दूसरे के साथ सीधा संपर्क होना अनिवार्य नहीं। मीडिया में आने वाली डरावनी तस्वीरें भी बहुत प्रभावी तरीके से डर फैला सकती हैं। घास के किसी मैदान में शिकारी से अपनी जान बचाने के लिए भागता हिरनों का झुंड एक सुरक्षित दूरी पर पहुंचकर रुक जाता है। लेकिन डरावनी खबरें आपको हमेशा डराए रखती हैं। जैविक विकास की प्रक्रिया के दौरान जब हमारे भीतर डर के खिलाफ प्रतिक्रिया विकसित हुई तो तब 24 घंटे के समाचार चैनल और फेसबुक-ट्विटर जैसे माध्यम नहीं थे।
डर के इस संक्रमण को रोकने का कोई तरीका नहीं क्योंकि यह स्वत:स्फूर्त और हमारे अवचेतन से संचालित होता है। लेकिन आप इसका असर कम करने के तरीके खोज सकते हैं, क्योंकि यह एक सामाजिक परिघटना है तो इस पर भी सामाजिक व्यवहार के कई नियम लागू होते हैं। डर की सूचना के अलावा सुरक्षा की सूचना भी सामाजिक रूप से फैलाई जा सकती है। अध्ययन बताते हैं कि किसी शांत और आत्मविश्वासी इंसान की मौजूदगी से आपको दूसरों को देखकर पैदा होने वाले डर को खत्म करने में मदद मिल सकती है। उदाहरण के लिए अगर कोई बच्चा किसी अजीब सी चीज को देखकर डर रहा हो तो कोई बड़ा खुद शांत रहकर उसे भी शांत कर सकता है।
दूसरी बात, आचरण की अहमियत शब्दों से ज्यादा होती है। शब्द और आचरण में एकरूपता होनी चाहिए। उदाहरण के लिए कोरोना वायरस के इस दौर में अगर आप लोगों को यह समझाएंगे कि स्वस्थ लोगों को फेस मास्क पहनने की कोई जरूरत नहीं है, और उसी समय उसे स्वस्थ दिखते किसी ऐसे शख्स की तस्वीर दिखाएंगे जिसने संदिग्ध मरीजों की स्क्रीनिंग करते हुए प्रोटेक्विव सूट पहन रखा हो तो इसका उल्टा असर होगा। लोग मास्क खरीदने दौड़ेंगे क्योंकि उन्होंने देख लिया है कि जिनके पास ‘अथॉरिटी’ है उन्होंने ये पहने हुए हैं।
लेकिन शब्दों का महत्व भी अपनी जगह होताहै। खतरे और सुरक्षा के बारे में कोई भी जानकारी स्पष्टता के साथ दी जानी चाहिए। लोगों को साफ पता होना चाहिए कि उन्हें क्या करना चाहिए। जब आप काफी तनाव में होते हैं तो बारीक बातों के अर्थ निकालना मुश्किल हो जाता है। तथ्य छिपाना या झूठ अनिश्चितता को बढ़ाता है और अनिश्चितता डर और बेचैनी बढ़ाती है। जैविक विकास की प्रक्रिया ने इंसानी दिमाग में डर को दूसरों तक फैलाने की एक तय प्रक्रिया बना दी है, लेकिन साथ ही, इसने हमें इस डर से सामूहिक रूप से निपटने की क्षमता भी दी है। (यात्सेक जबीसी, असिस्टेंट प्रोफेसर, डिपार्टमेंट ऑफ साइकिएट्री, यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन)

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