जब बसों ने फेरा मूंह तो साइकिल ने थामा हाथ : दीन मजदूर से लेकर दफ्तरों के बाबू तक का बना साथी

आज है साइकिल दिवस, दीन मजदूर से लेकर दफ्तरों के बाबू तक ने की साइकिल की सवारी
निधि गुप्ता, कोलकाता : लॉक डाउन में घर-घर सैनिटाइजर, मास्क के साथ ही जो और एक चीज देखी गयी वह है साइकिल। लोगों के आने-जाने के लिए यही दोपहिया इन मुश्किल दिनों में सबसे बड़ा सहारा बनी। यहां तक कि मजदूरों ने इसी के सहारे हजारों किलोमीटर तक रास्ता नापते हुए अपने घरों में वापसी की। सिर्फ मेहनतकस मजदूर ही नहीं बल्कि कार चलाने वाले दफ्तरों के बाबू भी अब साइकिल से दफ्तरों तक आना-जाना कर रहे हैं। इस दोपहिया को जहां पुराने जमाने का मानते हुए रफ्तार भरी जिंदगी में पीछे छोड़ दिया गया था वही आज लोगों के घरों ने निकलकर आगे बढ़ने का उत्तम जरिया बन गया है। ना किसी तरह का लाइसेंस और ना ही पेट्रोल व डीजल का खर्चा, ना ही अधिक यात्रियों के साथ शेयरिंग और संक्रमण का डर। सभी मायनों में लॉक डाउन और अनलॉक-1 में 10 से 15 किलोमीटर की यात्रा के लिए दोपहिया ही सर्वोत्तम है। देखने वाली बात यह भी है कि जिन मकानों के सामने महंगी कार खड़ी होती थी वहां अब साइकिल को भी अपनी जगह ​मिल गयी, वही साइकिल जो घर के किसी कोने में पड़ी रहती थी। कोई स्वास्थ्य लाभ तो कोई बचत की बात कहकर अब इस धीमी रफ्तारवाली साइ​किल को तेज गति से सड़कों पर दौड़ा रहा है। सड़कों पर निकलते ही यह कोई भी गौर सकता है कि पहले कितनी साइकिलें दिखती थीं और अब कितनी संख्या में लोग इसकी सवारी करते ​दिख रहे हैं।
आज है विश्व साइकिल दिवस
3 जून को विश्व साइकिल दिवस मनाया जाता है। इस दिन लोगों को साइकिल के इस्तेमाल को लेकर जागरुक किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने पिछले साल ही 3 जून को विश्व साइकिल दिवस घोषित किया है।
क्या कहना है लोगों का
रोज बाली हॉल्ट से कमरहट्टी के एक कारखाने में काम करने के लिए आने वाले प्रकाश वर्मा ने बताया कि पहले वे 2 ऑटो बदलकर आना-जाना करते थे मगर लॉक डाउन की वजह से आना जाना पूरी तरह ठप्प पड़ गया। उसने बताया कि इस दौरान अपनी परेशानी को दूर करने के लिए उन्होंने किसी तरह लॉक डाउन में नयी साइकिल खरीदी। साइकिल पर घर के आसपास बाजारों में आने-जाने में जहां उन्हें सहूलियत मिली वहीं कारखाना खुलने पर भी यही साइकिल उनका सहारा बनी, उन्होंने कहा कि 12 किलोमीटर का रास्ता अब वे साइकिल पर पार करते हैं। बीटी रोड के चिड़ियामोड़ पर वैराइटी शॉप चलाने वाले जगदीश पांडेय ने भी कहा कि उन्होंने लॉक डाउन में साइकिल खरीदी और चलायी है। उन्होंने कहा कि लेक टाउन बांगुर से वे रिक्शा और बस से यहां आया-जाया करते थे मगर इसके बंद रहने के दौरान उन्होंने साइकिल को अपनाया है। वहीं आद्यापीठ इलाके में रहने वाले एक होमियोपैथी डॉक्टर ने भी कहा कि उन्होंने लॉक डाउन में मरीजों तक पहुंचने के लिए साइकिल का इस्तेमाल किया है। उन्होंने कार की जगह साइकिल को चुना क्योंकि उनका ड्राइवर काम पर नहीं आ रहा था। मोटर उद्याेग जहां लॉक डाउन में बुरी तरह प्रभावित हुआ वहीं साइकिल डिस्ट्रब्यूटरों को लॉक डाउन का फायदा मिल रहा है। बैरकपुर व श्यामनगर के घोष एंड सन्स के नाम से 2 से अधिक साइकिल शोरूम चलाने वाले अलोक घोष ने बताया कि साइकिल के व्यवसाय में कभी इतना लाभ नहीं होता था मगर इन 2 महीनों में उनके व्यवसाय में भारी उछाल आया है। प्रति सप्ताह जहां 30 से 40 साइकिलें बिकती थीं वहीं अब 100 और 120 साइकिलें बिक जा रही हैं। सिर्फ साइकिल विक्रेता ही नहीं बल्कि साइकिल से पार्ट्स बेचने वालों को भी लॉक डाउन में काफी लाभ हुआ। खड़दह और बरानगर के बनहुगली में साइकिल की मरम्मत व पार्ट्स बेचने वाले टिंकू साव ने बताया कि पहले हमारे पास इतना काम नहीं होता था मगर इस लॉकडाउन में काफी लोगों ने साइकिलों की मरम्मत करवायी और हमारी इसमें ठीकठाक कमाई हुई है।
लॉक डाउन में साइकिल ने ज्योति को दी ‘साइकिल गर्ल’ की पहचान
बिहार की बेटी ‘साइकिल गर्ल’ ज्योति कुमारी को एक साइकिल से ही एक नयी पहचान दिलवायी है और अब वह पुरी दुनियों में इसी नाम में जानी जा रही है। बॉलीवुड फिल्मकार विनोद कापड़ी ज्योति के इस सफर पर फिल्म बनाने जा रहे हैं। लॉकडाउन में बीमार पिता को साइकिल पर बैठाकर हरियाणा के गुरुग्राम से 1200 किलोमीटर दूर अपने घर दरभंगा लाकर ज्योति ने सबको अचंभित कर दिया था। ज्योति ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वह अपनी इस साइकिल को अपनी सबसे अच्छी दोस्त मानती है जो कि किसी इंसान से भी बड़ा सहारा उसके
लिए बनी।

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