चुनाव सुधार के लिए मशहूर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन नहीं रहे

नयी दिल्ली : भारत में चुनाव नियमों को सख्ती से लागू करवाने के लिए विख्यात पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन नहीं रहे। रविवार की रात साढ़े नौ बजे 86 साल की आयु में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। पिछले दो सालों से उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था। उन्हें उनके कड़े रुख के लिए जाना जाता है। अपने कार्यकाल में उन्होंने प्रधानमंत्री नरसिंह राव से लेकर बिहार के मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद किसी को नहीं बख्शा। वे पहले चुनाव आयुक्त थे, जिन्होंने बिहार में पहली बार 4 चरणों में चुनाव करवाया था और इस दौरान चारों बार चुनाव की तारीखें बदली गयीं। इस दौरान लालू ने रैलियों में उन्हें जम कर निशाना बनाया लेकिन शेषन उनकी बातों से नहीं डरे। उन्होंने कई चुनाव रद्द करवाये और बिहार में बूथ पर कब्जा रोकने के लिए सेंट्रल पुलिस फोर्स का इस्तेमाल किया। ये बिहार के इतिहास का सबसे लम्बा चुनाव था।
शेषन देश के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त थे। चुनाव आयुक्त बनने से पहले वे कई मंत्रालयों में काम कर चुके थे और जहां भी गये उस मंत्री और मंत्रालय की छवि सुधर गयी। 1990 में वे मुख्य चुनाव आयुक्त बने। उन दिनों उनका डायलॉग ‘आई ईट पॉलिटिशियंस फॉर ब्रेकफास्ट’ चर्चित रहा। अपने 6 भाई-बहनों में शेषन सबसे छोटे थे। पिता पेशे से वकील थे। जन्म केरल के ब्राह्मण कुल में हुआ था। आईएएस की परीक्षा में टॉप किया व नौकरशाह के पद पर रहते हुए कैबिनेट सचिव के पद पर पहुंचे। शेषन तमिलनाडु कैडर से 1955 बैच के आईएएस अधिकारी थे। वे भारत के 10वें चुनाव आयुक्त बने थे। उन्होंने 2 दिसम्बर 1990 से 11 दिसम्बर 1996 तक भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यभार संभाला। देश की चुनाव प्रकिया को पारदर्शी बनाने में अहम योगदान के लिए शेषन को प्रसिद्ध रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। शेषन ने वर्ष 1997 में राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा था लेकिन उन्हें केआर नारायण के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने ट्वीट करके श्री शेषन के निधन की जानकारी दी। कुरैशी ने कहा कि अपने उत्तराधिकारियों के लिए सच्चे आदर्श थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि शेषन बहुत अच्छे नौकरशाह थे जिन्होंने परिश्रम और निष्ठा के साथ देश की सेवा की। कांग्रेस नेता शशि थरुर ने ट्वीट किया कि शेषन के निधन की सूचना से शोक संतप्त हूं। वे विक्टोरिया कॉलेज, पलक्कड़ में मेरे पिता के सहपाठी थे। वह साहसी बॉस थे जिसने चुनाव आयोग की स्वायत्ता को स्थापित किया।

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