कृषि विधेयकों के खिलाफ मंत्री का इस्तीफा, दोनों विधेयक पास


नयी दिल्ली : कृषि से सम्बंधित दो विधेयकों को लोकसभा में पेश करने से नाराज शिरोमणि अकाली दल के कोटे से केंद्रीय खाद्य एवं प्रसंस्करण उद्योग मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने इस्तीफा दे दिया। विपक्ष भी इन विधेयकों का विरोध कर रहा है। लेकिन इस्तीफा और विरोध दोनों बेअसर रहे और सरकार ने कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य विधेयक, 2020 और कृषक कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक, 2020 दोनों विधेयक पास करा लिए।  राज्यसभा से ये पहले ही पास हो चुके हैं।
​किसानों को आजादी दिलाने वाले विधेयक
इसके पूर्व कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि मोदी सरकार ने कृषि क्षेत्र के लिए सबसे बड़ा बजटीय आवंटन किया है। वर्ष 2009-10 में यूपीए सरकार के दौरान कृषि मंत्रालय का बजट 1200 करोड़ रुपये था और अब प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में इसे बढ़ा कर 1,34,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है। तोमर ने कहा कि ये विधेयक खेती को मुनाफे में लाने वाले, किसानों को आजादी दिलाने वाले हैं। इस विधेयकों से किसानों को अपनी उपज किसी भी स्थान से किसी भी व्यक्ति को बेचने का अधिकार होगा। इससे निजी निवेश गांव तक पहुंचेगा और रोजगार बढ़ेगा। किसान अच्छी फसलों की तरफ आकर्षित होंगे और कृषि निर्यात बढ़ेगा।
शिरोमणि अकाली दल सांसद सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि पंजाब हमारी पार्टी किसानों की पार्टी है। हमने कृषि मंत्री तोमर को शंकाएं दूर करने को कहा था, लेकिन हमारी बात सुनी गयी। वहीं, हरसिमरत ने कहा कि मैंने किसान विरोधी अध्यादेशों और कानून के विरोध में केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया है।
कांग्रेस का धरना : विधेयक के खिलाफ कांग्रेस ने संसद भवन में गांधी स्टैचू पर धरना दिया और कहा कि यह काला कानून है। इससे किसान को नुकसान होगा। लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि मोदी सरकार किसान विरोधी सरकार है। किसानों को उनकी फसलों के उचित दाम नहीं मिलेंगे। इन बिलों में कहीं भी एमएसपी की गारंटी नहीं दी गयी है। मंडी कुछ बड़े लोगों के कब्जे में होगी और अपनी मनमर्जी से वह फसलों के दाम तय करेंगे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी-किसानों को भ्रमित करने में बहुत सारी शक्तियां लगी हुई हैं। मैं किसान भाइयों -बहनों को आश्वस्त करता हूं कि एमएसपी और सरकारी खरीद की व्यवस्था बनी रहेगी। ये विधेयक किसानों को कई और विकल्प प्रदान कर उन्हें सही मायने में सशक्त करने वाले हैं। इस कृषि सुधार से किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए नए-नए अवसर मिलेंगे, जिससे उनका मुनाफा बढ़ेगा।
किसान हित के बिल हैं तो हंगामा क्यों?
अब व्यापारी मंडी से बाहर भी किसानों की फसल खरीद सकेंगे। पहले किसान अपनी फसल सिर्फ मंडी में ही बेचने को मजबूर थे। साथ ही, अब किसान कंपनियों के साथ पहले ही सौदा कर पाएंगे कि फसल आएगी तो कंपनी किस कीमत पर खरीदेगी। फसल आने के समय दाम कम हुआ तो कंपनी को समझौते वाला दाम देना होगा जबकि ज्यादा हुआ तो कंपनी को ज्यादा दाम चुकाना पड़ेगा। इससे किसान को फायदा होगा।से ही खरीदा जा सकता था। वहीं केंद्र ने अब दाल, आलू, प्याज, अनाज, इडेबल ऑयल आदि को आवश्यक वस्तु के नियम से बाहर कर इसकी स्टॉक सीमा खत्म कर दी है। इन दोनों के अलावा केंद्र सरकार ने कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग को बढ़ावा देने की भी नीति पर काम शुरू किया है, जिससे किसान नाराज हैं। विरोध करने वाले संगठनों में कांग्रेस से लेकर भारतीय किसान यूनियन जैसे बड़े संगठन भी शामिल हैं, जिन्हें अब अकाली दल का भी समर्थन मिल गया है।
‘वोटबैंक’ है विरोध का कारण
पंजाब में डेढ़ साल बाद चुनाव हैं, कांग्रेस सरकार चला रहे अमरिंदर सिंह ने खुली चुनौती दी थी कि शिरोमणि अकाली दल किसानों के साथ है तो केंद्र में भाजपा का साथ छोड़े। कथित रूप से प्रभावित होने वाले 30 हजार आढ़तिए, 3 लाख मंडी मजदूर, 20 लाख खेत मजदूरों का वोटबैंक देखते हुए मंत्री हरसिमरत ने इस्तीफा दिया।
क्या एनडीए टूट गया? : अभी नहीं, शिअद बैठक कर यह निर्णय लेगा कि एनडीए में रहना है या साथ छोड़ना है।
दूसरे राज्य क्यों विरोध में? : जो राज्य विरोध कर रहे, उनकी चिंता यह है कि एपीएमसी की हैसियत खत्म होने और किसान को कहीं भी फसल बेचने की आजादी मिलने से उनकी कमाई खत्म हो जाएगी।
विरोध के पीछे तर्क क्या? : कहा जा रहा है कि कंपनियां किसानों के साथ मनमाने करार करेंगी और उनसे अदालतों में लड़ने की हैसियत किसान की नहीं है।

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