कुछ न्यायिक फैसलों से लगता है कि न्यायपालिका का हस्तक्षेप बढ़ा है : नायडू

केवड़िया (गुजरात): ‘विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सौहार्दपूर्ण समन्वय-जीवंत लोकतंत्र की कुंजी’ विषय पर अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के 80वें सम्मेलन को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने बुधवार को कहा कि देश के तीनों अंगों में से कोई भी खुद के सर्वोच्च होने का दावा नहीं कर सकता क्योंकि संविधान ही सर्वोच्च है। हालांकि, अदालतों के कुछ फैसलों से प्रतीत होता है कि न्यायपालिका का हस्तक्षेप बढ़ा है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका संविधान के तहत परिभाषित अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत काम करने के लिए बाध्य हैं। तीनों अंग एक-दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप किए बगैर काम करते हैं और सौहार्द बना रहता है। इसमें परस्पर सम्म्मान, जवाबदेही और धैर्य की जरूरत होती है। दुर्भाग्य से ऐसे कई उदाहरण हैं, जब सीमाएं लांघी गयीं। ऐसे कई न्यायिक फैसले किये गये जिसमें हस्तक्षेप का मामला प्रतीत होता है। न्यायपालिका को ‘सर्वोपरि कार्यपालिका’ या ‘सर्वोपरि विधायिका’ की तरह नहीं समझना चाहिए। स्वतंत्रता के बाद से उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय ने ऐसे कई फैसले दिये जिनका सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों पर दूरगामी असर हुआ। इसके अलावा इसने हस्तक्षेप कर चीजें ठीक कीं। लेकिन यदा-कदा चिंताएं जतायी गयीं कि क्या वह कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में प्रवेश कर रही है। इस तरह की बहस है कि क्या कुछ मुद्दों को सरकार के अन्य अंगों पर वैधानिक रूप से छोड़ दिया जाना चाहिए।
नायडू ने कुछ उदाहरण देते हुए कहा कि दिवाली पर पटाखों को लेकर फैसला देने वाली न्यायपालिका कॉलेजियम के माध्यम से जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका को भूमिका देने से इनकार कर देती है। नायडू ने कहा कि कई बार विधायिका ने भी रेखा लांघी है। इसे लेकर उन्होंने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के चुनाव को लेकर 1975 में किये गये 39वें सविधान संशोधन का जिक्र किया।

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