कबूतर का घोंसला बेढंगा क्यों होता है

बच्चो आपको पता है ? पक्षियों में प्रत्येक का घर होता है, जिसे वास्तव में घोंसला आप कह सकते हैं, पर एकमात्र कबूतर का घोंसला इतने बेढंगे तरीके से बना होता है कि उसे घोंसला कह ही नहीं सकते तथा उसमें से अंडे कभी भी गिर सकते हैं !.. आप जानते हैं कि ऐसा बेढंगा घोसला बनने के पीछे कारण क्या है ?. इसके पीछे एक रोचक कहानी है। आइए जानते हैं –बहुत पुराने समय की बात है। उस समय कबूतर अपना घोंसला नहीं बनाते थे, बल्कि समय आने पर उसकी साथिन कबूतरी जमीन पर सटकर अंडे दे दिया करती थी। एक बार की बात है। ऐसे ही एक कबूतर के जोड़े के अंडे जमीन पर थे कि एक दिन एक धूर्त और चालाक लोमड़ी ने चुपके से आकर सारे अंडे खा लिये। जब कबूतर दम्पति ने देखा तो उनका कलेजा धक-सा रह गया। कबूतरी ने तो दम ही तोड़ दिया और कबूतर आकाश में उड़ानंे भरता और झाड़ियों की कोमल टहनियों पर बैठकर निःश्वास लेता। और सिसक-सिसक कर कहता –‘छह अंडे थे, अब एक भी नहीं बचा। वह धूर्त लोमड़ी मेरे सभी अंडों को चुराकर ले गई। मेरी कबूतरी भी इस गम में मुझे छोड़कर चली गई।’ इस तरह से वह कई दिनों तक अपने अंडे और कबूतरी के लिए शोक मनाता रहा। अंत में उसने घोंसला बनाने का निश्चय किया ताकि उसकी नई साथिन घोसले में अंडे दे सकें। इसलिए उसने तिनके इकट्ठे करने शुरू कर दिये ,जब काफी संख्या में तिनके इकट्ठे हो गये ,और घोंसला बनाने बैठा तो उसने महसूस किया कि उसे घोसला बनाना तो आता ही नहीं है ! .. वह तो जानता भी नहीं है कि घोसला बनता कैसे है ? तब उसने जंगल के सारे पक्षियों को को आमंत्रित किया कि –‘ मुझे आप सब आकर घोंसला बनाना सिखा दें, तो आपकी बहुत मेहरबानी होंगी।’ सब पक्षी ख़ुशी-ख़ुशी इकट्ठे होकर ,कबूतर के साथ आये। उसका घोंसला बनाने और सिखाने के लिए वे बहुत उत्साहित थे, इसलिए वे जल्दी -जल्दी तिनके उठाकर-उठाकर घोंसला बनाने लगे, परंतु अभी पक्षियों ने कुछ तिनके ही जमाये थे कि कबूतर ने उनको रोककर कहा -‘मुझे पता है कि घोंसला किस तरह बनाया जाता है। ‘ और वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा –‘मैं अपने आप बना सकता हूँ।’ ‘जब कोई स्वयं अपना काम कर सकता है तो हम क्यों बेवजह कष्ट करें और अपना समय बर्बाद करें।’ कहकर सब पक्षी वापस अपने घर की ओर उड़ गए।’ अब कबूतर तिनका एक टहनी पर रखता और दूसरा दूसरी टहनी पर, इस तरह दरख्त की हर शाख पर उसने कोशिश की। कई बार कोशिश की पर नाकाम रहा और घोसला नहीं बना सका। अब क्या करे ? उसने फिर सब पक्षियों को घोसला बनाने और सिखाने के लिए मिन्नतें कीं। तो सब फिर एक बार उड़कर आ पहुंचे। और उन्होंने अपना काम शुरू कर दिया लगे फिर से घोसला बनाने लेकिन ज्योंही उनलोगों ने मिलकर घोंसले का आधा हिस्सा ही पूरा किया कि लगा कबूतर फिर से चिल्लाने –‘मैं जानता हूँ यह कैसे बनता है, मैं खुद बना सकता हूँ।’ इस बार कबूतर के इस बेहयापन से आजिज होकर कहने लगे -‘ठीक है तुम खुद बना सकते हो तो बना लो। हमें नाहक परेशान क्यों करते हो ?’ ऐसा कहकर गुस्से से बौखलाए पक्षी वहां से उड़ गये। घमंडी और अकड़ू कबूतर अपने काम में जुट गया। उसने एक तिनका इधर रखा ,एक उधर। पर उससे कुछ भी बन नहीं पा रहा था। उसने तीसरी बार पक्षियों को बुलाया, पर इस बार वे आना तो दूर उससे सीधे मुंह बात हीं नहीं की। ऊपर से ताना मारा सो अलग कि -‘जो यह समझता हो कि वह सब कुछ समझता है तो उसको कुछ सिखाने से क्या लाभ ?’ और घमंडी कबूतर चुपचाप लौट गया। यही कारण है कि कबूतर का घोंसला सही नहीं बन पाया और आजतक उसका घोंसला बेढंगा ही बनता है। यह एक प्रकार ऐसे लोगों को सीख भी है कि जिन्हें लगता है कि वे सब जानते हैं, पर,असल में उन्हें आता-वाता कुछ नहीं है लेकिन वे अपनी कमी लोगों के सामने स्वीकारने में अपनी तौहीन समझते हैं। अंशुल अग्रवाल

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