और गुरु अर्जुन देव को गर्म लोहे पर बैठा दिया गया

कहा जाता है कि आस्था तथा पूरा विश्वास हर व्यक्ति का व्यक्तिगत विषय है। और यह भी सच है कि देव दूत कहलाने वाले धर्म गुरुओं के दिखाए हुए सन्मार्ग पर चलने वाले इन्सान ही सही अर्थों में मानव कहलाते आए हैं।कौन थे अर्जुन देव ?सिख समुदाय के पाँचवें गुरुअर्जुन देव जी का जन्म पंजाब के पवित्र स्थान गोबिंदवाल साहेब में 15 अप्रैल 1553 को धार्मिक विचारों वाली माता बीबी भानी जी की कोख से हुआ था। धर्म तथा मानवता के सन्मार्ग पर चलने वाली माता भानी एवं पिता रामदास जी के संस्कारों पर चलने वाले तेजस्वी बालक अर्जुन देव साधू संतों के उपदेश एवं प्रवचन सुनने के लिए दूर दराज तक उनके साथ चले जाते थे। कहा जाता है कि एकलौते बालक को इस तरह भटकता देखकर उनके पिता गुरु रामदास जीने बीबी गंगा जी नामक धार्मिक संस्कारों वाली लड़की के साथ बेटे अर्जुन देव जी की शादी करवा दी थी। और फिर समय अनुसार ही पिता अर्जुन देव जी तथा माता गंगा जी के घर हर गोबिन्द नामक एक सुन्दर बालक ने जन्म लिया था। पानागढ़ गुरुद्वारे के मुख्य सचिव ज्ञानी जगतार सिंह एवं ज्ञानी गुरमेज सिंह के अनुसार उन दिनों मुगल शासक जहांगीर भी अपने पूर्वजों की तरह साधारण लोगों पर कई प्रकार के अवमाननीय अत्याचार करने में व्यस्त था। और जहांगीर का महामंत्री चंदू भी इस महापाप में खुलकर उसका सहयोग कर रहा था। कहा जाता है कि दूसरी तरफ गुरु अर्जुन देव जी मुगल शासक जहांगीर तथा उसके महामंत्री चंदू के खूनी अत्याचारों का खुल कर विरोध करने लगे थे। बताया जाता है कि इसलिए चंदू अर्जुन देव जी को सबक सिखलाने वाले अवसर की तालाश करने लगा था। विवरण के मुताबिक उन दिनों नये रिश्ते तलाश करने का काम पंडित और नाई मिलकर किया करते थे और जहांगीर के महामंत्री चंदू ने भी अपनी सुन्दर बेटी के लिए योग्य वर तालाश करने का काम एक जोड़ी को सौंप रखा था और उस जोड़ी ने गुरु अर्जुन देव जी के सुन्दर बेटे हरगोबिंद के साथ महामंत्री चंदू के बेटी का रिश्ता गुरु अर्जुन देव से मिलकर स्वयं ही तय कर दिया था।गर्म लोहे पर बिठा दिया लेकिन दूसरी तरफ इस जोड़ी ने यह रिश्ता तय करने की बात महामंत्री चंदू को जाकर जब बताई। तब चंदू ने उन पर बहुत क्रोधित होते हुए कहा – ‘अरे बेवकूफो, तुम लोग मेरे महल की सुन्दर ईंट को उस संत अर्जुन की झोपड़ी में क्यों लग आए हो ?’ बताया जाता है कि चंदू की यह व्यंग्य भरी बात सुनकर गुरु अर्जुन देव जी ने संगत की सलाह मानकर चंदू की बेटी के साथ अपने पुत्र हरगोबिन्द की शादी करने से साफ शब्दों में इन्कार कर दिया था। बस फिर क्या था, इसी तरह के मौके को तलाश करने वाले महामंत्री चंदू की सलाह मानकर मुगल शासक जहांगीर ने कई प्रकार से झूठे आरोप लगाकर गुरु अर्जुन देव को गिरफ्तार करवाकर मई के तपते हुए गर्म दिनों में उन्हें गर्म लोहे पर बैठा दिया था। यही नहीं, कहा जाता है कि अर्जुन देव जी को गर्म लोहे पर बैठाने के बाद जहांगीर ने उनके सर पर गर्म बालू भी डालने का आदेश दिया था। सिख गुरुओं के इतिहास के अनुसार जहांगीर ने गुरु अर्जुन देव जी के सर पर लगातार सात दिनों तक बालू डलवाने का जुल्म भी किया था और आठवें दिन यानि 26 मई 1666 को गुरु अर्जुन देव जी ने जहांगीर से कहा कि वह समीप की रावी नदी में स्नान करना चाहते हैं। उनकी यह बात मानकर जहांगीर ने अपने सैनिकों के साथ अर्जुन देव जी को स्नान करने भेज दिया था। कहा जाता है कि गुरु अर्जुन देव जी पावन नदी के पवित्र जल में खडे़ होकर सबसे पहले हाथ जोड़कर अकाल पुरख (भगवान) का स्मरण किया और फिर अरदास करते हुए रावी नदी के पवित्र जल में अपने जीवन की अंतिम डुबकी लगाकर शहीद हो गए। शहीदों के सरताज कहलाने वाले देवदूत एवं सिख समुदाय के पांचवें गुरु अर्जुन देव जी की याद में भारत सहित अन्य देशों के सभी गुरुद्वारों में प्रत्येक वर्ष 26 मई को संगत के बीच मीठा शरबत तथा चने का प्रसाद वितरण किया जाता है। महान शहीद गुरु अर्जुन देव जी को शहीद दिवस पर नमन।
सतपाल सिह ‘मुकेश’

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