एयर इंडिया बेचने का फैसला अमित शाह करेंगे

राजनीतिक गपशप
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के पूरी तरह से ठीक हो जाने के बाद उनके पास जो पहला काम है वह है भारतीय सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया को बेचने के बारे में निर्णय करना। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एजेंडे में सबसे ऊपर है और अगले वर्ष 31 मार्च के पहले बेची जाने वाली 26 सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों की सूची में भी पहला है। 31 मार्च तक एयर इंडिया को बेचे जाने के लिए गठित मंत्रिसमूह के अमित शाह अध्यक्ष हैं। बीपीसीएल और अन्य कंपनियों को खरीदने वाले कई हैं, लेकिन एयर इंडिया को बेचना नागर विमानन मंत्री हरदीप सिंह पुरी के लिए बड़ा कठिन कार्य है। यह पता चला है कि टाटा समूह कुछ हद तक विमुख हो गया है। टाटा समूह पहले से ही एयर एशिया और विस्तारा चला रहा है तथा सीईओ एन चंद्रशेखरन ने जाहिर कर दिया है कि वे उड्डयन कारोबार के क्षेत्र में और पैसा लगाने के अनिच्छुक हैं। अब सरकार इसके लिए एक और रियायत दे रही है और वह एयरलाइन के पूरे वर्किंग कैपिटल कर्ज को माफ कर देगी, जो 15,500 करोड़ रुपये है। इससे इच्छुक खरीददारों पर कर्ज का बोझ घटकर 20,000 करोड़ रुपये रह जाएगा। संभवतः सरकार एयर इंडिया को बेचने से पहले उसके 22 हजार करोड़ के बकायों का भी वेंडर्स को भुगतान कर सकती है। यह बकाया राशि हवाई अड्डे के किराए और तेल कंपनियों के मद में है। इसके पहले सरकार ने एयर इंडिया का 29,400 करोड़ रुपये का कर्ज ले लिया था। खातों में एयर इंडिया पर लगभग 60 हजार करोड़ का बकाया है यानी अभी भी 30 हजार 600 करोड़ राशि की देनदारी बची है। अब सरकार ने इसमें से भी देनदारी को और घटा दिया है।इससे अलग एयर इंडिया की अन्य देनदारी की राशि 22 हजार करोड़ रुपये और है जिसमें हवाई जहाज का 12,500 करोड़ का कर्ज है, 2030-31 तक 5500 करोड़ एअरबस का बकाया और 6 बोइंग 787 ड्रीम लाइनर्स का 7000 करोड़ का ब्रिज लोन है। 7000 करोड़ के इस ब्रिज लोन को सेल एंड लीजबैक या सीधी खरीद पर रिफाइनेंस कर दिया जाएगा। खाड़ी के 2 देशों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अच्छे संबंधों के आधार पर इसमें दिलचस्पी दिखाई है। सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों की बिक्री से 2020-21 में 2 लाख करोड़ रुपये बटोरना चाहती है, जिससे अगले वर्ष का बजट घाटा जो 8% है उसे पूरा किया जा सके।
राहुल ने लोकसभा में पार्टी नेता पद ठुकराया, अधीर बने रहेंगे: राहुल गांधी के लोकसभा में कांग्रेस के नेता बनने की चर्चा अटकलों में ही खत्म हो गई। मेडिकल जांच के लिए सोनिया गांधी के साथ अमेरिका जाने से पहले राहुल गांधी ने इस सुझाव को अस्वीकृत कर दिया। अधीर रंजन चौधरी को पश्चिम बंगाल कांग्रेस का मुखिया बनाए जाने के बाद कई नेताओं ने यह सुझाव दिया था। अधीर रंजन चौधरी फिलहाल लोकसभा में कांग्रेस पार्टी के नेता हैं। लोगों में यह बात चल रही थी कि एक आदमी-एक पद के सिद्धांत के तहत अधीर को लोकसभा में पार्टी नेता का पद छोड़ना पड़ेगा और वह अगले साल होने वाले चुनाव में पश्चिम बंगाल में पार्टी का नेतृत्व करेंगे। लेकिन राहुल गांधी ने यह साफ कर दिया कि वह पार्टी का कोई भी पद स्वीकार नहीं करेंगे। वह लोकसभा में और बाहर पार्टी के सक्रिय सदस्य बने रहेंगे। गांधी परिवार के करीबी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि कई ऐसे नेता हैं जिन्होंने 2 पदों पर काम किया है और लंबे समय तक काम किया है, जैसे गुलाम नबी आजाद। आजाद राज्यसभा में विपक्ष के नेता हैं और पिछले हफ्ते के फेरबदल के पहले तक वह महासचिव भी थे। अधीर को इस पद पर नियुक्त किया जाना भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह टीएमसी नेता और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के तीव्र विरोधी हैं। वह 5 बार से सांसद हैं और दो-दो बार मोदी लहर और ममता की पार्टी का सामना कर चुके हैं। उनकी नियुक्ति एक संकेत है कि विधानसभा चुनावों में कांग्रेस वामपंथी दलों के साथ हाथ मिला सकती है।
मोदी ने गमछा छोड़ा और कंगना में मास्क: कोरोना महामारी की छाया में हो रहे संसद सत्र के पहले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गमछा छोड़कर संसद भवन में जाते समय 3 परतों वाला नीले रंग का मास्क पहनने का निश्चय किया। कई लोगों को चकित करते हुए मोदी ने गरीब लोगों के मास्क का उपयोग आरंभ कर दिया और अपना वह ‘गमछा’ छोड़ दिया, जिसे उन्होंने पहले कई बार टीवी पर आकर प्रमोट किया था। पता चला है कि एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया और अन्य स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गमछा लपेटे जाने पर चिंता जाहिर की। उसके बाद मोदी ने सांसदों और मंत्रियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे एन95/ एन99 मास्क की बजाय नीले रंग के इस साधारण मास्क का उपयोग आरंभ किया। शायद वह मात्र 2 रुपये कीमत वाला नीले रंग का मास्क अपनाकर गरीबों को एक और संकेत देना चाहते हैं।
दूसरी तरफ, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर मास्क पहनने की कई बार दी जारी कोविड नियमों का कंगना रणौत द्वारा लगातार उल्लंघन जारी है। उन्होंने भीड़ में बातचीत करते समय 6 फीट दूरी के नियमों को भी हवा में उड़ा दिया। शिवसेना के इशारे पर बीएमसी द्वारा उनके ऑफिस पर बुलडोजर चलाए जाने के बाद जब वह उसे देखने गईं तो उनके कर्मचारी तथा कमांडो भी उनके साथ थे और उन्होंने कहीं भी मास्क नहीं पहना था। मानो इतना ही काफी नहीं था, ‘झांसी की रानी’ ने तब भी मास्क नहीं लगाया जब उन्होंने महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से भेंट की, जबकि बेचारे गवर्नर ने मास्क लगा रखा था। कंगना रणौत और उनकी बहन रंगोली ने कोविड के नियमों को नहीं माना और बेचारा बीएमसी कुछ नहीं कर सका जबकि उसने बिहार के आईपीएस अधिकारियों को जबरदस्ती क्वॉरंटाइन में डाल दिया था।
सोनिया हमलावर, असंतुष्ट बचाव की मुद्रा में: मेडिकल जांच के लिए विदेश रवाना होने से पहले सोनिया गांधी ने कुछ असंतुष्ट नेताओं को जमीन सुंघा दी। हालांकि उन्होंने मुकुल वासनिक, जितिन प्रसाद अरविंद सिंह लवली और दो अन्य को कमेटियों में बनाए रखने की सावधानी बरती। यह कमेटी अगले साल पार्टी के अध्यक्ष और वर्किंग कमेटी के लिए आंतरिक चुनाव कराएगी। लेकिन पार्टी के जो बड़े नेता हैं जैसे गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा पृथ्वीराज चौहान, अखिलेश प्रसाद सिंह, भूपेंद्र सिंह हुड्डा को किनारे कर दिया गया। आनंद शर्मा उम्मीद पाले बैठे थे कि अगले साल चुनाव की देखरेख करने वाली 6 सदस्यीय समिति में उन्हें रखा जाएगा, लेकिन सोनिया गांधी ने मुकुल वासनिक को वहां बैठा दिया। वासनिक ने खुल्लम खुल्ला सोनिया की वफादारी दिखाई थी। सोनिया शायद आनंद शर्मा को माफ नहीं करेंगी क्योंकि बगावत वाले पत्र का मजमून तैयार करने वालों में वह प्रमुखता से शामिल थे। उन्होंने हुड्डा को भी विशेष आमंत्रित का पद देकर उनकी हैसियत घटा है जबकि पहले वह कांग्रेस कार्यकारिणी समिति में स्थाई आमंत्रित सदस्य थे। विशेष आमंत्रित के रूप में कुलदीप बिश्नोई की नियुक्ति महत्वपूर्ण है। अगर सोनिया ने गंदी राजनीति के कारण सचिन पायलट को कांग्रेस कार्यकारिणी समिति से बाहर कर दिया तो उन्होंने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को भी कांग्रेस कार्यकारिणी समिति से हटा दिया। उन्होंने अविनाश पांडे को सीडब्ल्यूसी के पूर्ण सदस्य से हटाकर स्थाई आमंत्रित का पद दे दिया, क्योंकि वे गहलोत के करीबी समझे जाते थे। मनीष तिवारी, शशि थरूर और कई अन्य लोगों को कहीं भी जगह नहीं दी। अब असंतुष्ट नेता अखबारों में इंटरव्यू दे रहे हैं, कुछ सोनिया के नेतृत्व में विश्वास जता रहे हैं तो कुछ परोक्ष रूप से ‘प्रतिदिन एक ट्वीट’ स्टाइल में मोदी विरोधी अभियान को लेकर राहुल गांधी पर हमला बोल रहे हैं। लेकिन अब वे दोराहे पर खड़े हैं और समझ नहीं पा रहे हैं कि किधर बढ़ें।
अस्थाना को बनाया जा सकता है सीबीआई प्रमुख : 3 महीने से चल रहा रिया चक्रवर्ती नाटक उस समय खत्म होता नजर आया जब नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीसी) ने इस केस में हाथ डाला और आखिरकार रिया को गिरफ्तार कर लिया। इससे, दिल्ली के राजनीतिक आकाओं की नजर में एनसीबी के महानिदेशक राकेश अस्थाना का ग्राफ भी काफी ऊंचा चला गया। सुशांत सिंह राजपूत की रहस्यमयी मौत के मामले में अस्थाना ने वहां सफलता हासिल कर दिखाई जहां सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) रिया चक्रवर्ती या अन्य किसी के खिलाफ कोई भी सबूत का कतरा तक जुटा पाने में नाकाम साबित हुए। दोनों एजेंसियां कई हफ्ते तक मशक्कत करती रहीं, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। यहां तक कि सीबीआई के निदेशक आरके शुक्ला और एनफोर्समेंट डायरेक्टर संजय कुमार मिश्रा हफ्तों तक चली 50 घंटों की पूछताछ के बावजूद रिया से कुछ ऐसा नहीं उगलवा सके जो सबूत बन सके। एक शीर्ष अधिकारी दिल्ली से विशेष तौर पर पूछताछ के लिए मुंबई आए। गहन पूछताछ में मौजूद रहने के बाद उस अधिकारी ने अपने उच्च अधिकारियों से कह दिया – सॉरी सर! सबूत का कतरा तक नहीं मिला। विचलित संजय मिश्रा ने अपनी ना-कामयाबी की रिपोर्ट दी और उसके बाद एनसीबी ने इसमें हाथ डाला। लेकिन एनसीबी ने केवल हफ्तेभर में यह कर दिखाया और रिया चक्रवर्ती को सलाखों के पीछे डाल दिया ताकि बिहार में तूफान कम हो जाए। जानकार लोगों का कहना है कि अगले साल की शुरुआत में शुक्ला के रिटायर होने के बाद अस्थाना के सीबीआई प्रमुख बनने की संभावना बहुत बढ़ गई है। अस्थाना वैसे भी तब से बहुत नाखुश थे, जब उन्हें पिछले साल सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर पद से हटा दिया गया था। तत्कालीन सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा से उनका काफी झगड़ा हुआ था, बाद में वर्मा को भी हटा दिया गया और अस्थाना को सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक के रूप में नियुक्ति दी गई, साथ ही एनसीबी का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया। वह 1985 बैच के गुजरात काडर के आईपीएस अधिकारी हैं तथा गृह मंत्री अमित शाह के करीबी हैं।

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