केवल सबरीमाला में ही महिलाओं का प्रवेश वर्जित नहीं, अन्य धर्मों में भी है ऐसा- रंजन गोगोई

Supreme court

नई दिल्ली : सबरीमाला मामले में पुनर्विचार याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने सात न्यायाधीशों की पीठ के पास यह मामला भेज दिया है। यह फैसला 3:2 से लिया गया। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई का कहना है कि ऐसे धार्मिक मुद्दों पर सात न्यायाधीशों की पीठ को विचार करना चाहिए। हालांकि, न्यायालय ने कहा कि अंतिम फैसले तक उसका पिछला आदेश बरकरार रहेगा। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि केवल सबरीमाला ही ऐसा धार्मिक स्‍थल नहीं जहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित है, अन्य धर्मों में भी ऐसा है। उन्होंने कहा सबरीमाला, मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, महिलाओं में खतना जैसे अहम धार्मिक मुद्दे हैं जिनपर फैसला वृहद पीठ लेगी।

धर्म और आस्‍था पर बहस फिर शुरु करने का उद्देश्य

मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश पर रोक का हवाला देते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि उच्चतम न्यायालय को सबरीमाला जैसे धार्मिक स्थलों के लिए एक समान नीति बनाना चाहिए। सबरीमाला मंदिर पर उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले के पुनर्विचार की मांग कर रही याचिकाओं पर गोगोई ने कहा कि याचिकाकर्ता धर्म और आस्था पर बहस फिर शुरू करना चाहते हैं।

बहुमत से दी गई थी महिलाओं के प्रवेश को मंजूरी

गौरतलब है कि न्यायालय ने 28 सितंबर 2018 को 4:1 के बहुमत से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को मंजूरी दी थी। फैसले पर 56 पुनर्विचार समेत 65 याचिकाएं दायर की गई थीं। इन पर 6 फरवरी को अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।

पुनर्विचार याचिकाएं गोगोई की अगुआई वाली 5 जजों की बेंच में दायर की गई थीं। प्रधान न्यायाधीश, न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा और न्यायमूर्ति एएम खानविलकर ने इस मामले को वृहद पीठ के पास भेजने के पक्ष में फैसला सुनाया। वहीं, न्यायमूर्ति फली नरीमन और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने इसके खिलाफ फैसला दिया।

प्रतिबंध्‍ा को बताया गया था असंवैधानिक

सबरीमाला, मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश और फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन से जुड़े धार्मिक मुद्दों पर वृहद पीठ द्वारा विचार किया जाएगा। इस पीठ की एकमात्र महिला न्यायाधीश ने कहा था- धार्मिक मुद्दों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में महिलाओं के प्रवेश को मंजूरी देते हुए कहा था- दशकों पुरानी हिंदू धार्मिक प्रथा गैरकानूनी और असंवैधानिक थी। न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने कहा था- धर्मनिरपेक्षता की स्थिति बनाए रखने के लिए न्यायालय को धार्मिक अर्थों से जुड़े मुद्दों को नहीं छेड़ना चाहिए। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने कहा था- शरीर के प्राकृतिक नियमों के चलते मंदिर में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाना रिवाज का आवश्यक हिस्सा नहीं। यह पुरूष प्रधान विचारधारा को दर्शाता है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ का इस मामले में कहना था कि- महिलाओं को माहवारी के आधार पर प्रतिबंधित करना असंवैधानिक है। यह मानवता के खिलाफ है।

1990 में सामने आया था मामला

सबरीमाला का मामला आज से 29 साल पहले यानि 1990 में सामने आया था। इसके तहत मंदिर परिसर में 10-50 साल के बीच की उम्र की महिलाओं के प्रवेश को लेकर लोगों में विवाद शुरु हो गया। इन्हें रोकने के लिए केरल उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई। उस समय न्यायालय ने सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध की सदियों पुरानी परंपरा को सही ठहराया था। इसके बाद वर्ष 2006 में इस प्रतिबंध को चुनौती मिली। तभी से सबरीमाला बार-बार सुर्खियों में आने लगा।

वर्ष 2007 में केरल की वामपंथी सरकार ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर यंग लॉयर एसोसिएशन की याचिका के समर्थन में हलफनामा दाखिल किया। फरवरी 2016 में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकार आई तो महिलाओं को प्रवेश देने की मांग से पलट गई। कहा कि परंपरा की रक्षा होनी चाहिए। इसके बाद 2017 में उच्चतम न्यायालय ने यह मामला संविधान पीठ को सौंप दिया।

भगवान अयप्पा को माना जाता है ब्रह्मचारी

ऐसी मान्यता है कि 12वीं सदी के भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं। जिस कारण सबरीमाला मंदिर में उन महिलाओं का प्रवेश वर्जित किया गया जिनकी आयु 10 से 50 वर्ष की है।

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