रेल के ईटिकटों की कालाबाजारी के अंतरराष्ट्रीय गिरोह का भंडाफोड़

* दुबई, पाकिस्तान, बांग्लादेश से रैकेट के संबंध, आतंकी वित्तपोषण की आशंका, 24 गिरफ्तार
* 563 आईडी, 20,000 एजेंट और 3000 बैंक शाखाओं में थे खाते
*10-15 करोड़ रुपये हर माह कमाते थे, मुख्य सरगना दुबई में, गोंडा स्कूल बम कांड के बाद से फरार
नयी दिल्ली : अवैध सॉफ्टवेयर के माध्यम से तत्काल श्रेणी के रेलटिकटों की कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ अभियान में रेल सुरक्षा बल (आरपीएफ) ने अंतरराष्ट्रीय अपराधियों के एक ऐसे गिरोह का पर्दाफाश किया है जो क्रिप्टो करंसी एवं हवाला के माध्यम से पैसा विदेश भेजकर उसका इस्तेमाल आतंकवाद के वित्तपोषण के लिए करता है।
आरपीएफ के महानिदेशक अरुण कुमार ने यहां रेल भवन में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में इस गिरोह का खुलासा किया और बताया कि इसमें एक प्रमुख सूत्रधार समेत 24 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और उनके पास उपलब्ध उन्नत तकनीक का भी पता चला है। उन्होंने बताया कि इस गिरोह में 20 हजार से अधिक एजेंटों वाले 200 से 300 पैनल देश भर में सक्रिय हैं, जिससे वे 10-15 करोड़ रुपये हर माह आय करते थे। इस गिरोह का सरगना हामिद अशरफ दुबई में बैठा है। वह पाकिस्तान के संदिग्ध एवं विवादास्पद संगठन तब्लीग ए जमात पाकिस्तान से जुड़ा है। उत्तर प्रदेश के बस्ती के रहने वाले हामिद अशरफ को 2016 में बस्ती में सीबीआई, रेलवे विजिलेंस एवं स्थानीय पुलिस के संयुक्त दल ने गिरफ्तार किया था, जो जमानत पर बाहर आने के बाद से फरार हो गया और संभवत: नेपाल के रास्ते दुबई चला गया। वह 2019 में गोंडा के एक स्कूल में बम विस्फोट कांड में भी वांछित है। टिकटों के कालाबाजारी के इस काम में बेंगलुरु की एक सॉफ्टवेयर कंपनी भी साझीदार है और गुरुजी के कूटनाम वाला एक उच्च तकनीकविद इस गिरोह को सक्रिय मदद देता है। कुमार ने बताया कि इस गिरोह के पास फर्जी आधार कार्ड एवं फर्जी पैन कार्ड बनाने की तकनीक है और यह गिरोह बांग्लादेश से लोगों को अवैध रूप से लाने एवं यहां बसाने का काम भी कर रहा था। इस प्रकार इस मामले की संवेदनशीलता बढ़ गयी है और आंतरिक सुरक्षा के लिये गंभीर खतरे वाली बात है। इसलिए इस मामले में एनआईए, सीबीआई, गुप्तचर ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, कर्नाटक पुलिस की विशेष जांच इकाई आदि एजेंसियां भी जुड़ गयीं हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर

अरुण कुमार ने कहा कि गत वर्ष त्योहार के सीजन के पहले अगस्त-सितंबर में रेल टिकटों की कालाबाजारी के खिलाफ शुरू किये गये अभियान में बेंगलुरु में गिरफ्तार किये गये एजेंटों से पूछताछ में बार-बार गुलाम मुस्तफा का नाम आ रहा था। इसके बाद से ही आरपीएफ सोशल मीडिया के माध्यम से गुलाम मुस्तफा पर नजर रख रही थी। उसे इसी माह भुवनेश्वर से गिरफ्तार करके बेंगलुरु लाया गया और दस दिन की रिमांड में उससे गिरोह की सनसनीखेज गतिविधियों का खुलासा हुआ। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के बस्ती का रहने वाला हामिद अशरफ इस गिरोह का सरगना है। उसे 2016 में बस्ती में सीबीआई, रेलवे विजिलेंस एवं स्थानीय पुलिस के संयुक्त दल ने गिरफ्तार किया था, जो जमानत पर बाहर आने के बाद से फरार हो गया और संभवत: नेपाल के रास्ते दुबई चला गया। वह 2019 में गोंडा के एक स्कूल में बम विस्फोट कांड में भी वांछित है। एएनएमएस नाम से चल रहे अशरफ के गिरोह के बारे में कुमार ने बताया कि गिरोह में देश के विभिन्न स्थानों पर 18 से 20 लीड सेलर हैं, जिन्हें रीजनल कमांडर कहा जाता है। इनका काम पैसा संभालना और हवाला माध्यमों से अशरफ तक भेजना है। इनके नीचे 200 से 300 पैनल सेलर काम करते हैं, जिनकी भूमिका लीड सेलर से सॉफ्टवेयर और आईडी लेकर एजेंटों को देना है। इन पैनल सेलर को 28 हजार रुपये का वेतन मिलता है। इनके नीचे करीब 20 हजार एजेंट काम करते हैं और वे एएनएमएस सॉफ्टवेयर के माध्यम से टिकट बुक करके कालाबाजारी करते हैं और ये एजेंट हर माह 10 से 15 करोड़ रुपये कालाधन नकदी के रूप में कमाते हैं। उन्होंने कहा कि गुलाम मुस्तफा 28 साल का युवक है और यह झारखंड के गिरीडीह का रहने वाला है। उसकी शिक्षा दीक्षा मदरसे में हुई है और उसने बेंगलुरु में टिकटों की कालाबाजारी शुरू की। वह डॉर्कनेट के माध्यम से उन्नत सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करता था। उसके लैपटॉप में लाइनेक्स आधारित हैकिंग सिस्टम मिला है। वह बिट क्वॉइन एवं अन्य क्रिप्टो करंसी के माध्यम से कालाधन देश के बाहर भेजता था। उसके पास से एएनएमएस साथ 563 निजी आईआरसीटीसी आईडी मिली है। वह वीपीएन प्रॉक्सी के माध्यम से विदेशी मोबाइल नंबर से व्हाट्सएप चैट करता था। आरपीएफ महानिदेशक के अनुसार उसके पास भारतीय स्टेट बैंक की 2400 शाखाओं एवं 600 अन्य क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की शाखाओं की सूची भी मिली है जिनका इस्तेमाल टिकट बुक करने में किया जाता था। उसके मोबाइल में कूटबद्ध संदिग्ध संदेश भी मिले हैं। इस पूरे खेल में काले धन को सफेद बनाना और आतंकवादियों के वित्तपोषण किये जाने के संकेत मिले हैं, जिनकी जांच शुरू हो चुकी है। पुलिस की साइबर सेल ने सारे डाटा को क्लोन करके उसका विश्लेषण आरंभ कर दिया है। कुमार ने बताया कि पाकिस्तान में संदिग्ध गतिविधियों के कारण विवादास्पद रहे संगठन तब्लीग ए जमात पाकिस्तान के अनुयायी गुलाम मुस्तफा की कॉन्टेक्ट सूची में पाकिस्तान, बांग्लादेश, पश्चिम एशिया, इंडोनेशिया एवं नेपाल के कई लोगों के नंबर मिले हैं। उसके पास भी छह आभासी नंबर तथा फर्जी आधार कार्ड एवं फर्जी पैन कार्ड बनाने वाले एप मिले हैं। उन्होंने बताया कि मुस्तफा के लैपटॉप में सरकारी वेबसाइटों की डिजिटल सामग्री, हाई डाटा एन्क्रिप्शन सिस्टम के अलावा यह भी पता चला है कि वह कार्टोसेट के माध्यम से वीडियो देखता था। इन सबसे इस मामले की संवेदनशीलता बढ़ गयी है। एक संदिग्ध के बारे में पता चला है कि वह बांग्लादेश से लोगों को भारत लाने एवं अस्पताल में भर्ती कराने का काम भी करता था। इससे उसके अंग व्यापार में शामिल होने का भी अंदेशा है। उन्होंने कहा कि इस पूरे गिरोह में एक गुरुजी नाम का शख्स भी है, जो गिरोह के वित्त प्रबंधन का काम देखता है। वह तकनीकी विशेषज्ञ है और गिरोह को तकनीकी ज्ञान देता है। युगोस्लावियाई नंबर एवं वीपीएन के माध्यम से गुरुजी को मुस्तफा से 13 लाख रुपये प्राप्त हुए हैं। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि इस मामले में बेंगलुरु की एक सॉफ्टवेयर कंपनी भी शामिल है जिसके दक्षिण भारत में कई शहरों तथा सिंगापुर एवं दुबई में कार्यालय हैं। सिंगापुर में इस कंपनी की काले धन को सफेद करने के मामले में जांच चल रही है।
कुमार ने बताया कि गुलाम मुस्तफा से मिले सुराग के आधार पर अब तक 23 लोगों को गिरफ्तार करके उनसे पूछताछ की जा रही है। देश भर में छापों का सिलसिला जारी है। मुस्तफा को सोमवार को अदालत में पेश किया गया और वहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेजा जा चुका है। उन्होंने बताया कि फिलहाल ऊपर के दो स्तरों की गहन तहकीकात हो रही है। गिरोह के बाकी ढांचे में शामिल लोगों की भी पहचान की जा रही है। यह भी जांच हो रही है कि धन को किस प्रकार से बाहर भेजा जा रहा था और किस प्रकार से आतंकवादियों को पैसा पहुंचाया जा रहा था। रेलवे के क्रिस के तकनीकी अधिकारियों ने भी मुस्तफा से पूछताछ की है और उससे प्राप्त जानकारी के आधार पर वे आईआरसीटीसी सॉफ्टवेयर की सुरक्षा को दुरुस्त करेंगे। उल्लेखनीय है कि एएनएमएस की रेल टिकट बुक करने वाले अवैध सॉफ्टवेयर कारोबार में 85 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। ये सॉफ्टवेयर 30 सेकेंड में 500 टिकट बुक कर सकता है। टिकट बुकिंग के लिए कैप्चा एवं बैंकिंग के लिए ओटीपी की जरूरत को भी बाइपास करके टिकट बुक कर लेता है। इस गिरोह का भंडाफोड़ होने से लाखों रेलयात्रियों को राहत मिलेगी और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़े खतरे को समाप्त किया जा सकेगा।

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