जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने उमर अब्दुल्ला को बताया बड़ा खतरा, रिहाई याचिका पर इस दिन होगी सुनवाई

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नई दिल्ली : नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला को सार्वजनिक सुरक्षा कानून (पीएसए) के तहत हिरासत में लेने के मामले को चुनौती देने वाली याचिका पर शीर्ष न्यायालय 2 मार्च को सुनवाई करेगी। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा और इंदिरा बनर्जी की बेंच ने आज इस याचिका की सुनवाई की तारीख तय की है। उमर अब्दुल्ला को सार्वजनिक सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लेने के मामले पर उनकी बहन सारा पायलट ने चुनौती दी थी। सारा पायलट की याचिका पर जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की पीठ के समक्ष सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वह सारा पायलट की याचिका पर जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से जवाब दाखिल करेंगे। शीर्ष न्यायालय ने सारा पायलट द्वारा दायर इसी याचिका पर जम्मू-कश्मीर प्रशासन को नोटिस जारी किया है। सारा पायलट की ओर से न्यायालय में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल पैरवी के लिए पहुंचे थे।

याचिकाकर्ता को पहले उच्च न्यायालय जाना चाहिए : अटॉर्नी जनरल

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने शीर्ष अदालत के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा, नजरबंदी के मामले में याचिकाकर्ता को पहले उच्च न्यायालय जाना चाहिए। पीठ ने इस याचिका को गुरुवार के लिए सूचीबद्ध किया और कहा कि याचिकाकर्ता जम्मू-कश्मीर प्रशासन के जवाब पर अपना जवाबी हलफनामा दायर कर सकती हैं। बता दें कि सारा पायलट ने शीर्ष अदालत में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर अपने भाई उमर अब्दुल्ला की जन सुरक्षा कानून के तहत नजरबंदी के 5 फरवरी के प्रशासन के आदेश को चुनौती दे रखी है।

हिरासत का आदेश गैरकानूनी है : सारा पायलट

सारा पायलट ने याचिका में कहा है कि हिरासत का आदेश गैरकानूनी है और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने में उनके भाई की ओर से किसी भी तरह के खतरे की बात नहीं है। वहीं न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से जिला मजिस्ट्रेट द्वारा पेश हलफनामे में कहा गया कि उमर की नजरबंदी वैध है और 24 फरवरी को सलाहकार बोर्ड द्वारा स्वीकृत भी है। उमर ने न तो किसी को सलाहकार बोर्ड के समक्ष अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना है और न ही उन्होंने वहां उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।

अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के बहुत मुखर आलोचक थे उमर

हलफनामे में कहा गया है कि दस्तावेज स्पष्ट रूप से इंगित करते हैं कि ‘अतीत में घटनाओं के बीच एक संबंध मौजूद है कि उनकी गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा हो सकती हैं।’ साथ ही यह भी कहा गया है कि उमर 5 अगस्त 2019 को निरस्त करने से पहले, अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के बहुत मुखर आलोचक थे।

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