असम एनआरसी से बाहर रह गए 2000 ट्रांसजेंडर, शीर्ष न्यायालय में दायर हुई याचिका

नई दिल्ली : उच्चतम न्यायालय में सोमवार को असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) से करीब 2000 ट्रांसजेंडरों को शामिल न किए जाने के खिलाफ याचिका दायर की गई है। असम की पहली ट्रांसजेंडर न्यायाधीश, न्यायमूर्ति स्वाति बिधान की ओर से यह याचिका दायर की गई है। याचिका के तहत उन्होंने लिखा है कि असम में एनआरसी लागू करते समय आवेदन में ट्रांसजेंडरों के लिए कोई अलग श्रेणी नहीं बनाई गई। आवेदन में केवल पुरुष या महिला श्रेणी का ही विकल्प दिया गया था और इन्हीं में से किसी एक श्रेणी को चुनने के‌ लिए उन्हें बाध्य किया गया। इसके अलावा ट्रांसजेंडरों के पास एनआरसी में शामिल होने के लिए आवश्यक 1971 के पहले के दस्तावेज भी मौजूद नहीं थे जिस वजह से वे सूची में शामिल नहीं हो पाए। इस याचिका पर प्रमुख न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है।

ट्रांसजेंडरों के साथ भेदभाव गैरकानूनी

पिछले वर्ष 26 नवंबर को ‘ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों का संरक्षण कानून, 2019’ को संसद में पारित किया गया था। इस कानून के तहत भारत में ट्रांसजेंटरों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक उत्थान के लिए आवश्यक प्रयासों का उल्लेख है। इसके अलावा ट्रांसजेंडरों के साथ भेदभाव पर प्रतिबंध लगाया गया है और किसी भी व्यक्ति को अपना जेंडर तय करने का अधिकार दिया गया है। इस कानून को राष्ट्रपति द्वारा 5 दिसंबर को मंजूरी दी गई थी।

करीब 19 लाख लोग असम एनआरसी से बाहर

गौरतलब है कि 31 अगस्त को असम में एनआरसी की आखिरी सूची जारी की गई थी। इस सूची के तहत राज्य के 3.29 करोड़ लोगों में से करीब 3.11 करोड़ लोगों को नागरिकता के लिए वैध माना गया है। वहीं, करीब 19 लाख लोगों को सूची में शामिल नहीं किया गया था। उन सभी लोगों को फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में अपील करने का अवसर दिया गया है जिनके नाम इस सूची में शामिल नहीं थे। एनआरसी की अंतिम सूची में केवल उन्हीं लोगों को शामिल किया गया, जिनके पास 25 मार्च 1971 के पहले से असम की नागरिकता के प्रमाण हैं या उनके पूर्वज यहां रहते आए हैं। सरकारी दस्तावेजों के जरिए इनकी नागर‌िकता का सत्यापन किया गया।

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