आम आदमी व रिश्तों का तानाबाना है हमारी सफलता का मंत्र : नंदिता राय

-डॉ.अभिज्ञात

20 को रिलीज होगी पारिवारिक अटूट रिश्ते पर बनी फिल्म-‘बेलाशुरू’
कोलकाताः नंदिता राय ने शिवप्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर एक दर्जन से अधिक बांग्ला फिल्में बनायी हैं। उनकी पहली फिल्म ‘इच्छे’ 2011 में आयी थी। उनकी अगली फिल्म फिल्म ‘बेलाशुरू’ 20 मई को रिलीज होने जा रही है। इस मौके पर की गयी एक बातचीत में नंदिता राय कहती हैं-‘पहले फिल्म बनायी थी ‘बेलाशेषे’। अब बनायी है ‘बेलेशुरू’। ‘बेलेशुरू’ में लीड रोल सौमित्र चटर्जी और स्वातिलेखा सेनगुप्ता का है। दोनों कलाकार अब नहीं रहे। इस लिहाज से यह फिल्म ऐतिहासिक हो उठी है क्योंकि इन दोनों महत्वपूर्ण कलाकारों की यह अंतिम फिल्म है। ‘बेलाशेषे’ सात साल पहले बनायी थी। ‘बेलाशेषे’ में जो परिवार था उसी की बाद की कहानी है। यह सिक्वल है मगर कहानी बिल्कुल अलग है। इसे अलग फिल्म ही माना जाये। एक परिवार की जो बातें आधी बेलाशेषे में छूट गयी थीं वे इस फिल्म में आकर पूरी हुई हैं। जो ‘बेलाशेषे’ में चरित्र हैैं, वही चरित्र इसमें भी हैं।

”हमारी फिल्मों में दर्शकों को पुरुष और स्त्री दोनों के नजरिये का संगम दिखायी देता है। यह वेहद जरूरी होता है। हमारी फिल्में दोनों के नजरिये से पूर्ण लगती हैं और स्त्री-पुरुष दोनों को पसंद आती हैं।”

वही ‘विश्वनाथ मजुमदार’ हैं, बस इसमें उनका सरनेम बदला है, उनका नाम हो गया है-‘विश्वनाथ सरकार’। उसे फिल्म में मां का नाम था ‘आरती मजुमदार’ इसमें नाम है ‘आरती सरकार’। बच्चे जो थे, वही सारे चरित्र हैं। बस इतना सम्पर्क है कि एक कहानी से फिल्म आगे बढ़ती है और दूसरे में प्रवेश करती है।’ दोनों की लेखिका खुद नंदिता हैं। उन्होंने जितनी भी ‍फिल्में निर्देशित की हैं ‍उनमें से ज्यादातर की कहानियां खुद लिखी हैं। हालांकि सिर्फ फिल्मों के लिए ही लिखती हैं। वे स्वतंत्र लेखिका नहीं हैं अर्थात कोई उपन्यास या कहानियों के तौर पर उनकी कृतियां नहीं आयी हैं। पहली फिल्म सन 2008 में आयी थी-‘इच्छे’। कहानी लेखन और फिल्म निर्देशन की शुरूआत इसी फिल्म से की थी। वे कहती हैं-‘यह फिल्म शिवप्रसाद मुखर्जी और मैंने साथ मिलकर बनायी थी। दोनों की पार्टनरशिप उस समय से अब तक जारी है।’ दो-दो व्यक्ति फिल्म निर्देशक होने पर भी किसी तरह का कामकाज में गतिरोध पर उन्होंने कहा कि ‘हममें तालमेल रहता है। काम शुरू करने से पहले ही हम आपस में खूब चर्चा करते हैं फिर उसका अंतिम रूप तय होता है। शिवप्रसाद कांसेप्ट देते हैं तो मैं उसकी पटकथा तैयार करती हूं और वे डॉयलाग लिखते हैं। जब हम फिल्म बनाने जाते हैं तो उसका खाका हमारे दिमाग में एकदम साफ होता है कि हम क्या करने वाले हैं। हमने कामकाज की देखरेख के लिए अलग-अलग विभाग बांट लिये हैं। कभी मन में यह खयाल नहीं आया कि मैं अकेले ही ‍फिल्म बनाऊं। सिनेमा की दुनिया में हम-एक दूसरे के पूरक हैं। हमारी फिल्मों में दर्शकों को पुरुष और स्त्री दोनों के नजरिये का संगम दिखायी देता है। यह बेहद जरूरी होता है। हमारी फिल्में दोनों के नजरिये से पूर्ण लगती हैं और स्त्री-पुरुष दोनों को पसंद आती हैं।’
फिल्म ‘बेलाशुरू’ के बारे में वे कहती हैं कि इसे फिल्माने में हमें बहुत मजा आया था। और अब जबकि इसके दोनों प्रमुख अभिनेता अब दुनिया में नहीं है तो इसकी मोहकता बढ़ गयी है यह फिल्म हमारे लिए बहुत ही नास्टेल्जिक है। फिल्म के रिलीज में विलम्ब की चर्चा करते हुए वे कहती हैं-‘फिल्म कोविड के दौर से पहले ही रेडी हो गयी थी। हम मई में इसे रिलीज करने वाले थे किन्तु मार्च में लॉकडाउन घोषित हो गया। इसलिए रिलीज नहीं कर पाये। अब जाकर हम इसे रिलीज करने जा रहे हैं। हमारी सबसे अधिक चलने वाली फिल्म रही ‘बेलाशेषे’। इस फिल्म ने 227 दिन तक एक मल्टीप्लैक्स में लगातार चलने और 250 दिन तक सिंगल थिएटर में चलने का रिकार्ड बनाया है। चूंकि यह नयी फिल्म इसकी सिक्वील है तो हमारी उम्मीदें और बढ़ गयी हैं कि यह और अधिक चलेगी।
अपनी फिल्मों पर बाजार के दबाव को नकारते हुए वे कहती हैं-‘हम बाजार का ध्यान में रखते हुए फिल्म नहीं बनाते। दिल जो चाहता है, जो कहानियां हमें कहनी हैं वही हम बनाते हैं। हम आर्ट फिल्म और कमर्शियल फिल्म का बंटवारा नहीं मानते। हमारी हर फिल्म कमर्शियली हिट रही। हमने शायद कमर्शियल फिल्म की परिभाषा बदल दी है।’
अपनी सफलता के राज पर वे कहती हैं-‘हमारी फिल्म देखकर आम आदमी कहता है कि फिल्म में जो कुछ दिखाया जा रहा है वह हमारी जानी-पहचानी दुनिया है। अरे यह तो मैं ही लग रहा हूं। यह तो मेरी फिल्म है। हम चाहते भी यही हैं कि हम ऐसी फिल्में बनायें कि उसे आम जनता अपना माने। उसमें अपने को देखे। कला के नाम पर अंधेरे को दिखाने वाली और सिर के ऊपर से चली जाने वाली फिल्में मैं नहीं बनाती। मेरी कहानियां आम लोगों के पास से आती हैं। मैं उनकी कहानियां लिखती हूं। हालांकि मेरी कहानियों में थोड़ा मैसेज तो होता है, जो उन्हें छूता है। और उन्हें लगता है कि जो कहा गया है वैसा भी हो सकता है। थोड़ी सी फिलासफी होती है। सामाजिक मैसेज होता है। सौमित्र दा, खराज मुखर्जी मैंने अपने अपनी ‍फिल्मों में रिपीट किया है क्योंकि वे बहुमुखी कलाकार हैं। शिवप्रसाद ने भी कई फिल्मों में काम किया है। वे अभिनेता पहले हैं, निर्देशक बाद में हैं। अपने पसंदीदा फिल्मकारों के बारे में वे कहती हैं-‘राजू हिरानी की फिल्में मुझे बहुत पसंद हैं। हिन्दी फिल्मकारों में राजीव राय को बहुत पसंद करती हूं। हिन्दी सिनेमा में नंदिता राय अपनी बांग्ला फिल्म ‘पोस्तो’ के हिन्दी रिमेक ‘शास्त्री वर्सेस शास्त्री’ के जरिये कदम रखने की तैयारी में हैं। इसमें मुख्य भूमिका परेश रावेल की है। बांग्ला में सौमित्र चटर्जी ने वह रोल किया है। यह फिल्म इस साल के अंत में या अगले साल रिलीज हो सकती है।
अपनी फिल्मों की खूबी को रेखांकित करते हुए कहती हैं कि बेलाशेषे को बहुत प्यार मिला है। बेलाशुरू में भी यह देखने को मिल सकता है। यह पारिवारिक अटूट रिश्ते की बेहतरीन प्रेम कहानी है। कोरोना काल के बाद समाज में रिश्तों में बदलाव आया है। यह महसूस किया गया है कि यह दूर जाने का समय नहीं है। परिवार फिर बहुत महत्वपूर्ण हो उठा है। मेरी सारी फिल्में रिश्तों के तानेबाने की फिल्में है। मेरी फिल्में आठ से अस्सी साल के लोग एक साथ बैठकर देख सकते हैं। और अंत में वे कहती हैं कि ‘मैं संगीत को महत्व देती हूं। मेरी हर फिल्म के गाने हिट रहे हैं।’

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