फिल्म निर्देशकों ने मेरे अंदर से निकाला है एक और कलाकार: ऋतुपर्णा सेनगुप्ता

‘बेलाशुरू’ में बेटी व पिता के बीच भावुक दृश्य छोड़ेगा अमिट छाप

कोलकाता: ऋतुपर्णा सेनगुप्ता ने पिछले ढाई दशकों में हिन्दी और बांग्ला फिल्मों में अपने बेहतरीन अभिनय के बल पर अपनी एक खास पहचान बनायी है। उनकी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अपनी सफलता के झंडे गाड़े हैं। वे बांग्ला की सबसे सफल अभिनेत्रियों में से एक हैं। इस अभिनेत्री ने बांग्ला फिल्म श्वेत पत्थरेर थाला (1992) के साथ बड़े पर्दे पर शुरुआत की थी और उन्होंने स्टारडम की राह पकड़ ली। बॉलीवुड में उन्होंने पार्थो घोष की फिल्म तीसरा कौन (1994) के साथ कदम रखा था। वे बांग्लादेश की फिल्मों की भी स्टार हैं। विंडोज प्रोडक्शन की आज 20 मई को रिलीज होने जा रही नंदिता राय और शिवप्रसाद मुखर्जी निर्देशित फिल्म ‘बेलाशुरू’ में उन्होंने एक प्रमुख किरदार मिली की भूमिका निभाई है। ‘बेलाशेषे’ में भी उनकी मिली की ही भूमिका थी। प्रस्तुत है इस अवसर पर ऋतुपर्णा सेनगुप्ता से की गयी बातचीत का एक अंश:

सिनेमा जगत में 25 साल में आये बदलाव के सम्बंध में वे कहती है कि मैं तमाम बदलाव की साक्षी रही और मैंने इससे बहुत कुछ सीखा। हर बदलाव को एक चुनौती की तरह लिया। यह एक आमूलचूल रूपांतरण है। मैं जिस अभिनय की दुनिया में कदम रखा था वह अब एकदम बदल चुका है। उस समय की फिल्मों कार्यप्रणाली पूरी तरह से अलग थी। व्यावसायिक तौर-तरीके अलग थे। फिल्म डायरेक्टरों की सोच एकदम अलग थी। सब्जेक्ट मैटर्स अलग थे। माहौल एकदम अलग था। जब मैंने अभिनय शुरू किया मैं बस कॉलेज से निकली ही थी। उस समय मुझे फिल्म इंडस्ट्री के बारे में कुछ पता नहीं था क्योंकि मैं फिल्म इंडस्ट्री की थी ही नहीं। मेरे परिवार में से भी कोई फिल्मों से जुड़ा नहीं था। मैंने काम करते-करते सीखा। मेरा सौभाग्य यह रहा कि मैंने कई बेहतरीन डायरेक्टर्स के साथ काम किया। मैं हमेशा एक डाटरेक्टर्स एक्टर रही।

यह पूछने पर कि क्या आपको कभी यह नहीं लगा कि अमुक किरदार को इस तरह निभाना चाहिए लेकिन डायरेक्टर तो कुछ और कह रहे हैं, वे कहती हैं-‘हां मुझे कभी-कभी लगता है कि इस करेक्टर को हम ऐसे भी कर सकते हैं, लेकिन इस मामले में मैं डायरेक्टर से हमेशा सलाह लेती हूं क्योंकि डायरेक्टर उस करेक्टर को मुझसे ज्यादा जानते हैं क्योंकि उन्होंने उस करेक्टर की सृष्टि की।

स्टारडम के किसी किरदार को निभाने में बाधक बनने के सवाल पर वे कहती हैं-‘यह सवाल मुझ पर लागू होता है। मैं व्यवसायिक सिनेमा का हिस्सा हूं। मैं बहुत ग्लैमर के माहौल से जोड़कर देखा जाता है। मुझे कभी-कभी लगता था कि स्टारडम में मैं खो जाऊंगी। बस एक स्टार बनकर रह जाऊंगी। यह बात कुछ डायरेक्टरों के मन में भी आयी कि ऋतिपर्णा बहुत ग्लैमरस है, अमुर रोल उस पर सूट नहीं करेगा। ‘परमितार एक दिन’ में मेरे साथ यही हुआ। बेहतरीन अदाकारा अर्पना सेन ने इस पिल्म को निर्देशित किया है। उन्होंने मुझे मेकओवर करके देखा लेकिन फिर कहा कि ‘बहुत ग्लैमरस लग रही हो। तुमसे यह नहीं होगा’ लेकिन बाद में मुझे में कहा कि यह तुम्हीं को करना पड़ेगा। और फिर यह बात चल पड़ी कि ‘यदि हम गाइडेंस दें तो ऋतु कर सकती है।’ इसीलिए ऋतुपर्णो घोष, अपर्णा सेन, राजा सेन, बुद्धदेव दासगुप्ता, तरुण मजूमदार आदि ने मेरे साथ काम किया और ऋतुपर्णा के अंदर एक और कलाकार को निकाला। नया डायरेक्टर आता है तो यह चुनौती होती है कि कलाकार उसे स्वीकार करेगा कि नहीं। आज जिस विंडोज प्रोडक्शन को हम देख रहे हैं उसका माहौल और महल एक दिन में नहीं बना है। उसकी पहली फिल्म को मैंने ही स्वीकार किया था और मैंने विश्वास रखा था कि यह डायरेक्टर जरूर कुछ खास करेगा। लीक से हटकर विंडोज फिल्म बनाती है मगर वह आफबीट फिल्म नहीं है। उसकी हर फिल्म हिट होती है। मैंने जिस भी डायरेक्टर को चुना वह व्यावसायिक तौर पर सफल रहा है।

अपने डायरेक्टर बनने की संभावना पर वे कहती हैं ‘मुझे अभी अभिनय की दुनिया में बहुत काम करना है इसलिए अभी उस दिशा में नहीं सोचा। मुझे बहुत सारे किरदार निभाने हैं।’ फिल्मों के रिमेक पर वह कहती हैं ‘ओरिजनल को बेहतर मानती हूं क्योंकि उसकी कापी नहीं हो सकती। पहला बेस्ट होता है। जो लोगों को जेहन में बैठ जाता है। रेखा जी ने जब उमराव जान किया था तो उमराव जान की छवि लोगों के मन में बैठ गयी। ऐश्वर्या जी ने बहुत अच्छा किया किन्तु सब कहते हैं कि रेखा जी का अच्छा है। अभी मैं दत्ता कर रही हूं वह शरतचंद्र के नावेल पर है, जो सुचित्रा सेन ने किया था। उसी का वर्जन हम आज कर रहे हैं। लेकिन मैं जानती हूं कि तुलना होगी और निश्चित तौर पर सुचित्रा सेन को ही लोग बेहतर कहेंगे। वे लीजेंड हैं। फिर भी मेरी यह कोशिश रहेगी कि अपना बेस्ट दे सकूं।’ दर्शकों की प्रतिक्रिया पर वे कहती हैं-‘लोगों के देखने का अपना अंदाज है। कई बार तो वे सिर पर बिठा लेते हैं और कई बार तो ट्रोल करते हैं। कई बार लगा कि रो लूं। फिर भी दर्शकों से मुझे प्यार है।’

‘सौमित्र दा सिनेमा जगत के भगवान’: ‘बेलाशुरू’ और ‘बेलाशेषे’ में प्रमुख भूमिका निभाने वाले सौमित्र चटर्जी से अपने लम्बे सम्बंधों को बारे में ऋतुपर्णा कहती है कि वे बड़े पर्दे पर अक्सर मेरे पिता की भूमिका में रहे। मेरे पूरे फिल्मी करियर में लगभग हर दूसरी फिल्म में वे मेरे साथ थे। उनसे मैंने और पूरे सिनेमा जगत ने बहुत कुछ सीखा है। यह उनकी आखिरी फिल्म है। मैं खुशनसीब हूं कि उन्होंने सचमुच पिता जैसा ही प्यार मुझे वास्तविक जिन्दगी में भी दिया। वे मेरी नजर में सिनेमा जगत के भगवान हैं। उनका अनंत योगदान है। इस फिल्म में मैं उनकी बेटी मिली बनी हूं। पिता और बेटी के रिश्ते पर यह फिल्म बेहद संवेदनशील ढंग से प्रभाव छोड़ेगी। मेरी विश्वास है यह सीन भारतीय सिनेमा में याद किया जायेगा।

फिल्मकार नंदिता राय और शिवप्रसाद मुखर्जी ने इतने प्यारे ढंग से संयुक्त परिवार के रिश्तों को इस फिल्म में पिराया है कि एकल परिवार यह महसूस करने लगेगा कि उसने क्या खोया है। हम कितने स्वार्थी हो गये हैं। परिवार का साथ क्या होता है यह फिल्म हमें याद दिलायेगी। फिल्म में परिवार के मुखिया सौमित्र चटर्जी और स्वातिलेखा सेनगुप्ता हैं। स्वातिलेखा आंटी की भी यह आखिरी फिल्म है। फिल्म में अपनी भूमिका के बारे में वे कहती है कि मिली का किरदार मैंने निभाया है। उसका पूरा नाम मालश्री है, जो शास्त्रीय संगीत के एक राग के नाम पर है, जो सुबह का राग है। इस फिल्म में संगीत का बहुत खूबसूरत प्रयोग है। मिली का चरित्र बहुत दिलचस्प है। मुझे लगता है कि हर घर में शायद एक मिली है। जिसे आप पहचान लेंगे। यह फिल्म लोगों के देखने के नजरिया बदल देगी। -डॉ.अभिज्ञात

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