‘बेलाशेषे’ के बाद इतिहास रचेगी ‘बेलाशुरू’

नंदिता राय और शिवप्रसाद मुखर्जी की पहली फिल्म ‘इच्छे’ 2011 में रिलीज हुई थी। उसके बाद ‘हैलो मेमसाहेब’ ‘एक्सीडेंट’,’मुक्तधारा’, ‘अलीक सुख’, ‘रामधनु’,’बेलाशेषे’, ‘हामी’, ‘प्राक्तन’, ‘पोस्तो’, ‘कंठ’, ‘गोत्र’ जैसी हिट फिल्में निर्देशकों की इस जोड़ी ने दीं। ‘मुक्तधारा’ के लिए सर्वश्रेष्ठ फिल्म का और ‘अलीक सुख’ को सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का फिल्मफेयर अवार्ड (ईस्ट) मिल चुका है। ‘इच्छे’ को इंडियन पैनोरमा फिल्म फेस्टिवल,’एक्सीडेंट’ को इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ केरल और ‘अलीक सुख’ को कान फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया। द इंडियन फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया ने ‘इच्छे’ को अपने सांस्कृतिक और शैक्षणिक अंग का हिस्सा बनाया है। ‘इच्छे’, ‘मुक्तधारा’ और ‘रामधनु’ को विश्वभारती यूनिवर्सिटी के बीएड पाठ्यक्रम में शामिल किया है। ‘इच्छे’ और ‘मुक्तधारा’ को महिलाओं के कानूनी और मनोवैज्ञानिक समस्याओं के पाठ्यक्रम के सर्टीफिकेट पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। बंगाल में जब कोई तलाक लेने जाता है तो कोर्ट की ओर से सुझाव दिया जाता है कि एक बार ‘बेलेशेषे’ जरूर देख लीजिए।


फिल्म निर्माता कंपनी विंडोज प्रोडक्शन के बैनरतले नंदिता राय और शिवप्रसाद मुखर्जी के निर्देशन में बांग्ला फिल्म ‘बेलाशुरू’ 20 मई 2022 को रिलीज होने जा रही है।
‘बेलाशेषे’ में शादी के पचास वर्षों बाद, अपनी तीन बेटियों और एक बेटे की परवरिश करने के बाद, विश्वनाथ अपनी पत्नी आरती को तलाक देने का फ़ैसला करता है। उसे लगता है कि उसकी शादीशुदा जिन्दगी नीरस हो चुकी है। यह एक बंगाली परिवार की कहानी है, जो परिवार के कई ऐसे मुद्दों को उठाती है, जिनसे हमारा सामना रोज होता है, पर हम उन पर ध्यान नहीं देते और हमारे जीवन से उल्लास उसके चलते खो जाता है। जीवन में सामान्य तौर पर सब ठीकठाक चल रहे परिवार में तब हड़कंप मच जाता है, जब वृद्धावस्था में विश्वनाथ आरती से तलाक मांगता है।
आने जा रही फिल्म ‘बेलाशुरू’ 2015 में आयी ‘बेलाशेषे’ की सिक्वल नहीं है लेकिन बेलाशेषे के प्रमुख पात्रों के जीवन का घटनाक्रम इसमें आगे बढ़ता है। यह कहानी दमदम में रहने वाले एक परिवार की सच्ची कहानी पर आधारित है। पवित्रचित्त नंदी और गीता नंदी दमदम के थे, दोनों कोविड के दौर के पहले गुजर गये। यह भी इक्तफाक है कि फिल्म में दोनों प्रमुख पात्रों की भूमिका निभाने वाले कलाकार सौमित्र चटर्जी और स्वातिलेखा सेनगुप्ता अब नहीं रहे। दोनों फिल्मों के मुख्य किरदार एक ही हैं। बेलाशुरू की कहानी एक स्वतंत्र कहानी है इसलिए दोनों का मुख्य किरदारों का सरनेम बदलकर मजुमदार से सरकार हो गया है। बदलते वक्त के साथ उनकी कहानियां बदल गयी हैं। बेलाशुरू में प्यार के विभिन्न रूपों को दर्शाया गया है।
विश्वनाथ परिवार की जिम्मेदारियों को तो समझता है मगर अपनी भावनाओं और इच्छाओं की भी कद्र करता है और अपनी पत्नी आरती से तलाक मांगता है। लेकिन बेलाशुरू के ट्रेलर और गीतों को देखकर लगता है कि अगली फिल्म में विश्वनाथ अब आरती की देखभाल को अधिक तरजीह दे रहा है। अब पूरे परिवार को समय देने के बदले अपनी पत्नी और अपने प्रिय लोगों को अधिक समय दे रहा है। यहां आरती और विश्वनाथ के प्रेम की विलक्षण गहराई का देखने को मिल सकती है। आरती एक मध्यवर्गीय परिवार की ऐसी महिला है, जिसका पूरा संसार केवल उसका परिवार है। बेलाशेषे में उसका भावुक संवाद लोगों के दिल में अमिट छाप छोड़ जाता है, जब वह अपने पति विश्वनाथ से कहती है कि ‘मैं भगवान से मनाती हूं कि वह आपको मुझसे पहले बुला ले क्योंकि मैं तो आपके बिना जी लूंगी लेकिन आप वृद्धावस्था में मेरी देखभाल के बिना नहीं रह पायेंगे।’
विश्वनाथ की बड़ी बेटी की भूमिका अपराजिता आध्या और दामाद बरीन की भूमिका खराज मुखर्जी ने निभाई है। वे दोनों एक खुशहाल जोड़े के रूप में न सिर्फ प्रभावित करते हैं। मलयश्री उर्फ मिली की भूमिका रितुपर्णा सेनगुप्ता ने निभाई है। मिली अपने विवाहित जीवन से खुश नहीं है और पति बिजन (सुजोय प्रसाद चटर्जी) से अलग एक अन्य व्यक्ति के प्रेम में है। बेलाशुरू में मिली महसूस करती है कि एक उम्र के बाद जब दैहिक आकर्षण खत्म हो जाता है तो दोस्ती और प्रेम ही अंत तक साथ रहता है। फिल्म में पिऊ की भूमिका मोनामी घोष ने निभाई है, जो परिवार की सबसे छोटी और प्यारी सदस्या है। बेलाशेषे में पिऊ और पलाश (अनिंद्य चटर्जी) ने प्रेममय युवा जोड़े की भूमिका निभाई है। बेलाशुरू में दोनों ने आधुनिक दौर में वैवाहिक जीवन में प्रेम की स्थिति को दर्शाया है। ● डॉ.अभिज्ञात

 

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