हिंदी फिल्मों में कोर्टरूम का रोमांच

र्देशक सुभाष कपूर की फिल्म जाॅली एलएलबी-2 में वकील जाॅली जगदीश्वर मिश्रा बने अभिनेता अक्षय कुमार को कोर्टरूम ड्रामा इधर खूब रास आ रहा है। इससे पहले एतराज, रुस्तम जैसी कई फिल्मों में वह अदालत में जिरह करते दिखाई दिए थे। लेकिन इस बार उन्होंने वकील का एक नया जामा पहना है। इस बार वह बेहद तिकड़म के साथ अपना पक्ष रखते है। क्योंकि वकील जाॅली को मुकदमे में पराजय पसंद नहीं है। अक्षय कहते हैं, ‘पहले तो मैं यह बता दूं कि यह एक सिक्वल है,पर इसके पहले भाग से इसका कोई मेल नहीं है। यह सिर्फ पहले भाग की कहानी को आगे बढ़ाती है। असल में जाॅली-2 का जगदीश्वर मिश्रा बातों ही बातों में कई अदालती खामियों की तरफ इशारा भी करता है। पर उसका इरादा किसी का आवमानना करना नही है। बेहद हल्के फुल्के ढंग से अदालती गतिविधियों को पेश किया गया है।’
अदालत में अक्षय- वैसे पूर्व में भी अक्षय को अदालत के अन्दर या उसके इर्द-गिर्द घूमने में बहुत मजा आता रहा है। पूर्व में 2004 की अब्बास-मस्तान की एतराज में अदालती चक्कर में फंस गए थे। तब बैरिस्टर राम चैटरानी बने अन्नू कपूर और वकील बनी उनकी बीवी प्रिया मल्होत्रा ने उन्हें अंतत: प्रियंका चोपड़ा के कानूनी शिकंजे से बचाया था। अदलत की दिलचस्प जिरह के चलते यह फिल्म काफी रोचक बन गई थी और इसने बाॅक्स आफिस में अच्छी-खास कमाई की थी। जबकि 2008 की फिल्म ओह माई गाॅड में अक्षय भगवान कृष्ण बन कर अदालत में चल रही गतिविधियों को देखते हैं। लेकिन 2016 की रुस्तम में उनका आत्मविश्वास इस कदर बढ़ा कि उन्होंने अपने मुकदमे की जिरह खुद की और जीते भी। यह फिल्म वर्षों पहले के चर्चित के.एम. नानावती मर्डर केस पर बेस्ड थी। इससे पहले 1963 में अभिनेत्री साधना के पति और निर्देशक आर.के. नय्यर ने ये रास्ते हैं प्यार के, लीला नायडू,सुनील दत्त,अशोक कुमार,मोतीलाल,शशिकला आदि को लेकर एक फिल्म बनायी थी। उस समय बेहद चर्चित यह फिल्म बाॅक्स आफिस में बड़ी हिट नहीं थी। मगर कोर्टरूम सीन को आज भी बेहद आकर्षक माना जाता है। 1973 की गुलज़ार की उम्दा फिल्म ‘अचानक’ भी इसी घटना पर आधारित थी।
‘अचानक’ के विनोद खन्ना-1973 की फिल्म अचानक के बारे में विस्तार से कुछ बताने की जरूरत नहीं है। इसमें कोई अदालती कार्यवाही नहीं थी। मेजर रणजीत खन्ना यानी विनोद खन्ना अपनी बीवी पुष्पा खन्ना अभिनेत्री लिली चक्रवर्ती से बेपनाह मोहब्बत करता है। लेकिन जैसे ही उसे पता चलता है कि उसकी बीवी का अफेयर उसके ही दोस्त से चल रहा है। वह उसकी हत्या कर देता है। और खुद पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर देता है। लेकिन बीवी के अस्थिकलश के विसर्जन को लेकर उसकी पुलिस से लुका-छिपी का खेल शुरू होता है।
और अंततः उसकी मृत्यु हो जाती है। इसके चलते ही यह फिल्म बेहद उल्लेखनीय बन जाती है। के.एम. नानावती मर्डर की घटना पर बेस्ड होने के बावजूद लेखक ख्वाज़ा अहमद अब्बास-गुलज़ार की जोड़ी ने इसे अदालती कार्यवाहियों में नहीं उलझाया था। आज वर्षों बाद विनोद खन्ना अपनी इस फिल्म को अपनी एक श्रेष्ठ फिल्म मानते हैं।
नानावती कांड पर ‘ये रास्ते हैं प्यार के’- निःसंदेह नानावती कांड पर पहली बनी यह फिल्म हमेशा यादगार रहेगी। खास तौर से इसके वकील अशोक कुमार और मोतीलाल के अदालती नोंक-झोंक को सिने रसिक शायद भुला पाएं।
इस दृष्टि से अक्षय की रुस्तम कहीं नहीं टिकती है। जबकि ये रास्ते… इसकी नायिका लीला नायडू के कमजोर भाव अभिव्यक्ति के बावजूद यह अपनी अदालती दृश्यों की वजह से बेहद रोचक बन जाती है। 1963 की इस फिल्म को अभिनेता सुनील दत्त भी बहुत अच्छी तरह से संभालते हैं।
‘पिंक’ के वकील अमिताभ- सच तो यह है कि अनिरुद्ध राय चौधरी की फिल्म पिंक से उसके दो वकील का किरदार करनेवाले एक्टर अमिताभ बच्चन और पीयूष मिश्रा के शानदार परफार्मेंस को निकाल दिया जाए,तो इस फिल्म को दर्शक पांच मिनट भी बर्दाश्त नहीं करेंगे।
यह कोई बड़ी हिट फिल्म नहीं थी। और इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि इसके कोर्टरूम सीन भी बहुत सुस्त चलते हैं। असल में कोर्टरूम सीन में दर्शक हमेशा एक तेजी देखना चाहते हैं। पिंक जैसी फिल्में इस मामले में ही बहुत पीछे रह जाती है। कई फिल्मों में वकील का रोल बेहद दिलचस्प ढंग से कर चुके बेहतरीन अभिनेता अन्नू कपूर कहते है,‘यदि आपकी फिल्म में अदालती दृश्य है,तो इनके संवाद अदायगी पर आपको खास ध्यान देना होगा। मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है एतराज के बैरिस्टर राम चैट्टरानी के किरदार को करने से पहले मैने अपने संवादों पर बहुत होमवर्क किया था।’
याद आते हैं वे पुराने अदालती दृश्य- वैसे किन-किन फिल्मों का जिक्र किया जाए, हिंदी फिल्मों के उस पुराने सुनहरे दौर को याद कीजिए,जब हर तीसरी फिल्म का अंत कोर्टरूम ड्रामा के साथ खत्म होता था। अक्सर विलेन को सजा अदालती फैसले के जरिए ही मिलती थी। इस संदर्भ में 1965 की फिल्म वक्त का उदाहरण देना ही काफी होगा। इस फिल्म के अंतिम बीस मिनट के अदालती दृश्यों को आज भी कई फिल्मकार प्रेरक मानते हैं। फिल्म के अंत में वकील बने सुनील दत्त रहमान को जिस तरह से कातिल साबित करते हैं, वह अत्यंत दर्शनीय बन जाता है। इसमें विपक्षी वकील मोतीलाल के दिलचस्प तर्क-वितर्क भी बेहद उम्दा बन पडे़ थे।
‘कानून’ का शिकंजा- हमारे देश में न्याय प्रक्रिया भले ही बहुत सुस्त हो, कई कानून के विद्वान मानते हैं कि कानून यदि अपना काम पूरी ईमानदारी से करे तो कोई भी मुलजिम इससे बच नहीं सकता है। इसकी सबसे अच्छी बात यह है कि मुलजिम की तलाश में इसके शक की सूईं किसी की तरफ भी घूम सकती है।
1960 की कल्ट क्लासिक बी.आर. चोपड़ा की कानून में इसी बात को बेहद खबसूरती के साथ चित्रित किया गया था। जिसके चलते जज की कुर्सी में बैठे जज बद्री प्रसाद की भूमिका कर रहे अशोक कुमार को ही कातिल समझ लिया जाता है। इसमें घड़ी की सूई के साथ हर पल बदलती अदालती प्रक्रिया ने एक अलग तरह का ही रोमांच क्रियेट किया था।
‘कुदरत’ का मेलोड्रामा- दु:ख,सुख की माला कुदरत ही पिरोती है …..फिल्मकार चेतन आनंद की क्लासिक फिल्म कुदरत के इस लोकप्रिय गाने के साथ ही इसकी अदालती प्रक्रिया आगे बढ़ती है। और इसके साथ ही सिने प्रेमी कोर्टरूम ड्रामा में पूरी तरह से उलझ जाते हैं। इसका पूरा श्रेय राजकुमार, राजेश खन्ना, विनोद खन्ना आदि जैसे एक्टर को जाता है। इसके अदालत के 15-20 के दृश्यों में चेतन आनंद किसी को सामने नहीं आने देते है, यहां सिर्फ उनका कुशल निर्देशन और संवाद फिल्म को पूरी तरह से अपनी गिरफ्त में ले लेता है।
सफल वकील मोतीलाल और दादामणि- यूं तो अन्नू कपूर, बमन ईरानी,पीयूष मिश्रा,नीना गुप्ता जैसे कई एक्टर फिल्म के अदालती दृश्यों में खूब रोमांच भरते हैं। पर जब भी सफल फिल्मी वकील की चर्चा होगी अशोक कुमार,मोतीलाल, इफ्तिखार आदि का ही नाम लिया जाता है। ऐसे रोल में नायाब एक्टर अशोक कुमार के अभिनय के बारे में कुछ कहना बेमानी है। क्योंकि यहां भी हर पल अपनी भाव भंगिमा बदल लेते हैं। यकीन न हो तो असित सेन की फिल्म ममता में उनके बैरिस्टर के रोल को याद कीजिए,आप फिर उनके अभिनय संपन्नता पर मुग्ध हो जाएंगे। इसी तरह से अदालत में बेहद धीमे-धीमे संवाद बोलकर अभिनेता मोतीलाल भी ढेर सारे क्लाइंट यानी दर्शकों को अपने वश में कर लेते थे।
संवाद के बिना रोमांच कहां- निश्चित तौर पर अदालती कार्यवाही में चुस्त संवादों का बहुत योगदान होता है। अदालती प्रक्रिया के दो वकीलों की छोेटी-छाेटी चुटकी या तकरार एक अलग तरह का रोमांच लाती है। यही वजह है कि फिल्म ये रास्ते हैं प्यार के में आगा जानी कश्मीरी और वीएस थापा के संवादों ने दर्शकों को ठिठकने के लिए मजबूर कर दिया था। क्या आप यश चोपड़ा की वक्त के संवाद भूल सकते हैं। यह फिल्म अख्तर उल इमान के बेजोड़ संवादाें की वजह से भी हमेशा याद की जाएगी। फिल्म मेरी जंग के अदालती दृश्यों में अभिनेता अनिल कपूर को भी जावेद अख्तर के संवादों ने खूब साथ दिया था। अदालत में बोले गए संवादों का एक दूसरा सच यह भी है।

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