स्वस्थ जीवन का आधार सूर्य नमस्कार

सूर्य  नमस्कार शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभों का उत्तम स्रोत है। सूर्य नमस्कार का अर्थ है सूर्य को प्रणाम करना। यह एक सरल किन्तु परिपूर्ण यौगिक अभ्यास है। न केवल महत्त्वपूर्ण आसनों अपितु प्राणायाम एवं ध्यान के लाभ भी इसमें अंतर्निहित हैं। वस्तुत: यह बारह आसनों का एक समूह है। पूर्ण एकाग्रता एवं जागरूकता के साथ इनका अभ्यास किया जाता है। इन बारह क्रियाओं में प्रत्येक शरीर विन्यास के साथ एक मंत्रोच्चारण को निर्दिष्ट किया गया है। सूर्य नमस्कार की विशेषता यह है कि इसका अभ्यास किसी भी आयु के स्त्री, पुरुष, बालक बालिकाएं, प्रौढ़ एवं स्वस्थ सभी सहजतापूर्वक कर सकते हैं। यह शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक लाभों का एक ऐसा स्रोत है जिसकी प्राप्ति अन्यत्र दुर्लभ है। सूर्य नमस्कार का अभ्यास प्रात:काल निकलते हुए सूर्य के सामने किया जाता है।
सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों से परिपूर्ण ऐसे वातावरण में सूर्य नमस्कार का अभ्यास शरीर को नई चेतना तथा जीवनी शक्ति प्रदान करता है। सूर्य नमस्कार का अभ्यास प्रारंभ करते समय पहले दिन बारहों क्रियाओं का अभ्यास न करके केवल पहली तीन क्रियाओं का अभ्यास करना श्रेयस्कर होता है। इन तीनों क्रियाओं को तीन-चार बार दोहराया जा सकता है। इसके पश्चात क्रमश: रोज एक-दो क्रियाओं का अभ्यास बढ़ाना चाहिए। इस प्रकार लगभग एक सप्ताह में सूर्य नमस्कार को बारहों क्रियाओं का अभ्यास किया जा सकता है। इन बारह क्रियाओं के अभ्यास कर इनमें पूर्ण दक्षता प्राप्त कर लेने के उपरान्त सूर्य नमस्कार के बारह मंत्रों के उच्चारण के साथ इनका अभ्यास करना चाहिये। मंत्रोच्चारण करते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि उनका उच्चारण मात्र शाब्दिक ही न हो अपितु प्रत्येक आसन के साथ मानसिक रूप से हो। क्रमश: एक-एक आवृत्ति बढ़ाते हुए 10-12 बार सूर्य नमस्कार का अभ्यास किया जा सकता है।
सूर्य नमस्कार का अभ्यास भी धीरे-धीरे किया जाना चाहिये। सूर्य नमस्कार को स्वयं में संपूर्ण माना जाता है। सूर्य नमस्कार का अभ्यास प्रात:काल ठीक सूर्योदय के समय सूर्य की ओर मुख करके किया जाता है। उक्त रक्तचाप तथा हृदय रोग से पीड़ित व्यक्तियों को सूर्य नमस्कार का अभ्यास नहीं करना चाहिये। बुखार आदि में भी इसका अभ्यास वर्जित है।
पहली स्थिति (प्रणामासन) :- निकलते हुए सूर्य के सामने मुख करके सीधे खडे़ हो जाएं। दोनों पैरों, एड़ियों तथा पंजों को मिलाते हुए रीढ़ की हड्डी को बिल्कुल सीधा रखें। दोनों हाथों को नमस्कार की मुद्रा में जोड़कर कुछ क्षणों के लिये आंखों को बन्द कर लें। सम्पूर्ण शरीर का ध्यान करते हुए मानसिक शांति एवं स्थिरता का अनुभव करें। मन में पहले मंत्र ओम मित्राय नम: का उच्चारण करते हुए सूर्य देवता को प्रणाम करें। यह सूर्य नमस्कार की पहली क्रिया की पूर्ण स्थिति है।
दूसरी स्थिति (हस्तउत्तानासन) :- दोनों हाथों को ऊपर उठाते हुए कमर, पीठ, सिर और बाहों को पीछे की ओर ले जाएं। शरीर का संतुलन बनाये रखें। पैर बिल्कुल सीधे रहें। अभ्यास के प्रति जागरूकता रखें। मन में दूसरे मंत्र ओम रवये नम: का उच्चारण करते हुए सूर्य देवता को प्रणाम करें। यह सूर्य नमस्कार की दूसरी क्रिया की पूर्ण स्थिति हैं।
तीसरी स्थिति (पादहस्तासन) :- दोनों हाथों को वापस नीचे लाते हुए कमर से शरीर को मोड़ते हुए सामने की ओर झुकें। दोनों हाथों की हथेलियों को दोनों पैरों के बगल में भूमि पर रखने का प्रयास करे। पैरों एवं हाथों को उंगलियों को एक सीध में रखें। पैरों को बिल्कुल सीधा रखे। घुटने न मुडें ऐसा प्रयास करें। धीरे-धीरे सिर को घुटनों के साथ यथा संभव मिलाने का प्रयास करें। प्रारंभ में यह अभ्यास कठिन प्रतीत होता है किन्तु निरन्तर अभ्यास के पश्चात सुगमता से किया जा सकता है। इसलिये अभ्यासों की क्षमता के अनुसार ही शरीर को झुकाना चाहिये। मन में तीसरे मंत्र ओम सूर्याय नम: का उच्चारण करते हुए सूर्य देवता को प्रणाम करें। यह सूर्य नमस्कार की तीसरी स्थिति की पूर्ण स्थिति है।
चौथी स्थिति (अश्वसंचालनासन) :- हथेलियों को भूमि पर लगाए रखते हुए दाएं पैर को पीछे की ओर जितना संभव हो सकें, ले जाएं। दाएं पैर का घुटना भूमि से स्पर्श करता रहे। बाएं घुटने को मोड़कर पंजे के बल बैठें। बायां घुटना दोनों हाथों के मध्य में रहेगा। छाती को सामने की ओर एवं सिर को पीछे की ओर ले जाते हुए आकाश को ओर देखें। मन में चौथे मंत्र की ओम भानवे नम: का उच्चारण करते हुए सूर्य देवता को प्रणाम करें। यह सूर्य नमस्कार की चौथी क्रिया को पूर्ण स्थिति है।
पांचवीं स्थिति (पर्वतासन) :- हाथों एवं दायें पैर की स्थिति पहले जैसे रखते हुए बाएं पैर को भी पीछे ले जाएं। दोनों पैरों को परस्पर मिलाते हुए कमर के भाग को ऊपर उठाकर सिर को नीचे को ओर ले जाते हुए पर्वत के समान आकृति बनायें। सिर को दोनों भुजाओं के बीच में दृष्टि नाभि पर रखें। शरीर का पूरा भार दोनों पंजों एवं हथेलियों पर हो तथा दोनों एड़ियां भूमि से लगी रहें। मन में पांचवें मंत्र ओम खगाय नम: का उच्चारण करते हुए सूर्य देवता को प्रणाम करें। यह सूर्य नमस्कार की पांचवीं क्रिया की पूर्ण स्थिति है।
छठी स्थिति (अष्टांग नमस्कार) :- हाथों एवं पैरों की स्थिति पहले जैसी रखते हुए घुटनों को भूमि से स्पर्श कराते हुए बाहों को कुहनियों से मोड़कर नीचे लाएं। इस स्थिति में मस्तिष्क, छाती, दोनों घुटनों दोनों पंजों एवं दोनों हथेलियों का भूमि से स्पर्श होगा। यह स्थिति अष्टांग प्रणाम की है। मन में छठे मंत्र ओम् पूष्णे नम: का उच्चारण करते हुए सूर्य देवता को प्रणाम करें। यह सूर्य नमस्कार की छठी क्रिया की पूर्ण स्थिति है।
सातवीं स्थिति (भुजंगासन) :- हथेलियों को भूमि पर लगाए रखते हुए हाथों को सीधा करने का प्रयास करें। शरीर का निचला भाग भूमि को स्पर्श करता हुआ रहे तथा नाभि से ऊपर के भाग को उठाते हुए तथा सिर को यथासंभव पीछे की ओर ले जाते हुए आकाश की ओर रखें। यह भुजंगासन की स्थिति है। मन में सातवें मंत्र ओम् हिरण्यगर्भाय नम: का उरच्चारण करते हुए सूर्य देवता को प्रणाम करें। यह सूर्य नमस्कार की सातवों क्रिया को पूर्ण स्थिति है।
आठवीं स्थिति (पर्वतासन) :- यह स्थिति पांचवीं स्थिति के समान ही है। पुन: पर्वताकार स्थिति में आते हुए मन में आठवें मंत्र ओम मरीचये नम: का उच्चारण करते हुए सूर्य देवता को प्रणाम करें। यह सूर्य नमस्कार की आठवीं क्रिया की पूर्ण स्थिति है।
नौवीं स्थिति (अश्वसंचालनासन) :- हथेलियों को भूमि पर लगाये रखें। दायें पैर को घुटने से मोडकर सामने लाते हुए दोनों हाथों के बीच में रखें। बायें पैर को यथासंभव पीछे रखें। छाती को सामने की ओर लाते हुए सिर को पीछे की ओर ले जाएं तथा आकाश की ओर देखें। यह स्थिति चौथी स्थिति के समान ही है। मन में नवें मंत्र ओम् आदित्याय नम: का उच्चारण करते हुए सूर्य देवता को प्रणाम करें। यह सूर्य नमस्कार की नौवीं क्रिया की पूर्ण स्थिति है।
दसवीं स्थिति (पादहस्तासन) :- दोनों हथेलियों को भूमि पर रखते हुए दोनों पैरों को आगे लाकर समकक्ष रखें। तीसरी स्थिति के अनुरूप आते हुए सिर को घुटनों से स्पर्श करने का प्रयास करें। दोनों पैर बिल्कुल सीधे रहेंगे। मन में दसवें मंत्र ओम् सवित्रे नम: का उच्चारण करते हुए सूर्य देवता को प्रणाम करें। यह सूर्य नमस्कार की दसवीं क्रिया की पूर्ण स्थिति है।
ग्यारहवीं स्थिति हंसत उत्तानासत :- सीधे खडे़ हो जाएं। दूसरी स्थिति के अनुरूप दोनों हाथोंं को ऊपर उठाते हुए, कमर, पीठ, सिर, बांहों को पीछे की ओर ले जाएं। शरीर का संतुलन बनाए रखें। पैर बिल्कुल सीधे रहेंगे। मन में ग्यारहवें मंत्र ओम अर्काय नम: का उच्चारण करते हुए सूर्य देवता को प्रणाम करें। यह सूर्य नमस्कार की ग्यारहवीं क्रिया की पूर्ण स्थिति है।
बारहवीं स्थिति (प्रणामासन) :- सीधे खडे़ होकर पहली स्थिति के अनुरूप दोनों हाथों को प्रणाम की मुद्रा में जोड़ लें। आँखों को बन्द करते हुए मन में बारहवें मंत्र ओम् भास्कराय नम: का उच्चारण करते हुए सूर्य देवता को प्रणाम करें। यह सूर्य नमस्कार की बारहवीं क्रिया की पूर्ण स्थिति है।
सूर्य नमस्कार की बारहों क्रियाओं के अभ्यास के पश्चात कुछ क्षण शवासन में विश्राम कर पुन: इसका अभ्यास किया जा सकता है। सूर्य नमस्कार के नियमित अभ्यास से मन एवं हदय निर्मल होकर कार्य के प्रति ध्यान एकाग्र होता है। मन में आशावादी विचारों का संचार होता है। शरीर के सभी अंग लचीले और सशक्त बनते हैं तथा चेहरा तेजवान होता है। शरीर का रक्तसंचार बढ़ता है। कब्ज एवं वायु विकार दूर होकर पाचन शक्ति पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है अन्त:स्रावी ग्रन्थियों के स्राव संतुलित होते है। स्त्रियों का प्रदर रोग दूर होकर गर्भाशय सबल बनता है। कमर की अतिरिक्त वसा इसके नियमित अभ्यास से कम हो जाती है तथा मोटापा समाप्त होकर शरीर सुडौल हो जाता है। विद्यार्थियों में एकाग्रता व आत्मविश्वास में वृद्धि होती है, कार्य कुशलता व कार्यक्षमता बढ़ती है तथा अध्ययन कार्य भी वे अधिक तन्मयता से एवं सुग्राह्यता से कर सकते हैं। इसका नियमित अभ्यास मानसिक अशांति को दूर कर चिंत को शान्त और निर्मल बनाता है। इसलिये सूर्य नमस्कार का अभ्यास नियमित रूप से क्रिया जाना चाहिये।
सूर्य नमस्कार के बारह मंत्र
1. ओम् मित्राय नम: 2-ओम् रवये नम: 3- ओम् सूर्याय नम: 4. ओम् भानवे नम: 5. ओम् खगाय नम: 6. ओम् पूष्णे नम: 7. ओम् हिरण्यगर्भाय नम: 8- ओम् मरीचये नम: 9. ओम् आदित्याय नम: 10. ओमओम् सवित्रे नम: 11 – ओम् अर्काय नम: 12-ओम् भास्कराय नम:।
इसमें पहला ओम् है जिसे प्रणव कहते हैं। इसके बाद 6 बीज मंत्र है, तत्पश्चात् सूर्य के बारह गुणोंं को दर्शाने वाले उसके पर्यायवाची
शब्द हैं।- (स्वास्थ्य दर्पण)

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