सुविधा की सुरंग

इन दिनों मीडिया से लेकर आम लोगों की बातचीत तक उदयन दास और उसकी ‘प्रेमिका’ आकांक्षा की मौत चर्चा का अहम विषय बने हुए हैं। प्रथमदृष्टया मनोरोगी लगने वाले ‘हत्यारे’ उदयन दास के बारे में बताया जाता है कि उसने पुलिस द्वारा की गयी शुरुआती पूछताछ में में स्वीकार किया है कि उसने गत वर्ष दिसंबर में गुस्से में आकांक्षा का गला घोंट दिया था। यही नहीं उसने यह भी स्वीकार किया कि उसने 2012 में अपने माता-पिता की हत्या कर उनके शव आवास के अहाते में दफना दिये थे। पुलिस के अनुसार उदयन ने विभिन्न नामों से 100 ई-मेल अकाउंट और 100 फेसबुक प्रोफाइल बनाये हुए थे जिनके जरिये वह बताता था कि वह बहुत अमीर है। बताया जाता है कि इन्हीं फर्जी पहचानों के जरिये उसने आकांक्षा को अपने जाल में फंसाया था जबकि पुलिस पूछताछ में उसने बताया है कि उसका कोई दोस्त नहीं है। मीडिया रपटों के अनुसार उदयन अंतर्मुखी लड़का था जिसे उसकी कक्षा के साथी अक्सर परेशान करते रहते। उसकी किसी से मेलजोल न रखने की इस आदत ने उसे हिंसक प्रवृत्ति का बना दिया। उसकी कम्प्यूटर में काफी दिलचस्पी थी और शीघ्र ही उसने इसमें महारत हासिल कर ली। सबसे पहले उसने अपने दो दोस्तों के ओवुर्ट प्रोफाइल हैक किये। उन दोनों को अपने ये प्रोफाइल मिटाने( डिलीट) पड़े। उदयन ने इसे अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि माना और जब फेसबुक की शुरुआत हुई तो उसने अपने परिवार के सदस्यों के नाम से आधा दर्जन फेसबुक प्रोफाइल खोल दिये जिनके जरिये वह लोगों को प्रभावित करने की कोशिश करता था और इन फेसबुक ‘वाल’ पर प्रतिक्रियाएं, टिप्पणियां लिखता। उदयन आॅनलाइन प्रयोक्ताआें को बताता कि उसका नाम उदयन वोन रिच्थोफेन मेहरा है और सैन्डियागो, कैलिफोर्निया का रहने वाला है। उदयन आकांक्षा की हत्या के बाद भी आकांक्ष उदयन मेहरा नाम से बनाये गये फेसबुक प्रोफाइल की वाल पर संदेश देता कि वह अपनी वतंमान जिंदगी से खुश है। वह फेसबुक, वाॅट्सएप और अन्य माध्यमों से आकांक्षा के ‘प्रोफाइल’ से उसके माता-पिता व परिजनों  को बताता कि वह अमरीका में खुश है और यूनीसेफ में अच्छी नौकरी कर रही है।
इस मामले पर अभी जांच चल रही है और अब तक मिली जानकारियों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी लेकिन यह घटना सिर्फ किसी ‘उन्मादी’ की पाशविकता का पर्दा फाश ही नही करती वरन इंटरनेट संजाल पर बढ़ती निर्भरता से जुड़े आपराधिक कृत्यों के प्रति भी लोगों को आगाह करती है। बेशक संचार क्रांति के इस युग में सुदूर परिजनों, आत्मीयों से  सम्पर्क कर उनका हालचाल पूछने और समान विचारधारा या मकसद के लोगों के साथ सूचना व विचारों के आदान-प्रदान के अलावा नित नये दोस्त बनाने के मामले में निःसंदेह ‘सोशल मीडिया’ सबसे अहम और प्रभावशाली सम्पर्क चैनल हैं और गत एक दशक के दौरान ‘सोशल मीडिया’ नाम से विकसित इंटरनेट आधारित ये सम्पर्क चैनल चाहे अनचाहे हमारे जीवन के अहम हिस्से बन गये हैं। नये साथी पाने के साथ-साथ नये रोजगार की संभावनाएं तलाशने में सोशल मीडिया काफी मददगार साबित हुए हैं (एक अध्ययन रपट के अनुसार अमरीका तथा कई अन्य विकसित देशों में बेहतर रोजगार पाने की कोशिश कर रहे करीब 73 प्रतिशत लोग अपने मकसद को पाने के लिए सोशल नेटवर्विंग साइट का इस्तेमाल करते हैं) लेकिन एक दूसरे का हालचाल जानने, फोटो, वीडियो आदि शेयर करने के अलावा वैचारिक, सामाजिक, राजनीतिक और व्यावसायिक सूचना सम्प्रेषण की इस सुविधा ने साथ ही नयी तरह की सामाजिक विसंगतियों को भी जन्म दिया है। यही नहीं इसने अपराधों के तौर-तरीके भी बदले हैं। आज हो रहे इंटरनेट आधारित अपराधों के बारे में बताया जाता है कि 81 प्रतिशत अपराध इन्हीं सोशल मीडिया चैनलों के जरिये अंजाम दिये जाते हैं।
सर्वाधिक प्रयुक्त सोशल साइट फेसबुक, ट्विटर, ब्लाॅग, इंस्टाग्राम, वाॅट्सएप आदि साइबर अपराधियों के इस तरह की धोखाधड़ी से बेखबर लोगों तक पहुंचने के पसंदीदा जरिया हैं। इन अपराधों में किसी व्यक्ति/उपभोक्ता की पहचान (आईडेंटिटी चुरा लेना, लोगों को ई-मेल भेजकर खुद को जानीमानी कंपनी बताकर उनसे पासवर्ड, क्रेडिट/डेबिट कार्ड के नंबर आदि व्यक्ति व्यक्तिगत जानकारी हासिल करने की कोशिश जैसी जालसाजी (फिशिंग), ठगी और महत्वपूर्ण जानकारियां/आंकड़े हासिल करना आदि प्रमुख हैं। एक रपट के अनुसार हर पांचवां व्यक्ति इन जासाजों के झांसे में आ जाता है और हर रोज दस लाख से ज्यादा लोग ऐसे अपराधियों के शिकार बनते र्है। लाखों लोगों की मेहनत की कमाई (जिसका परिमाण खरबों रुपये होता है) जालसाजों के हाथ चली जाती है।
विशेषज्ञों को अंदेशा है कि साइबर अपराध दुनिया में वित्तीय जालसाजी की दूसरी सबस बड़ी वजह बन सकते र्है क्योिंक विभिन्न व्यावसायिक कंपनियों की इंटरनेट आधारित सेवाआें पर निर्भरता दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। अमरीका के  कारनेगी मेलन विश्वविद्यालय और फेडरल ब्यूरो आॅफ इन्वेस्टिगेशन (अमरीका का घरेलू जासूसी व्ा सुरक्षा प्रतिष्ठान एफबीआई) ने कुछ प्रमुख संस्थाआें के साथ मिलकर करीब 500 आला अफसरों, सुरक्षा विशेषज्ञों तथा निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों के अधिकारियों को लेकर एक सर्वेक्षण किया जिसमें करीब चालीस प्रतिशत उत्तरदाताआें ने कंपनी की परिसंपत्ति में हेराफेरी को सबसे बड़ा खतरा बताया और  एक तिहाई ने स्वीकार किया कि वे साइबर अपराध उननी कंपनी के लिए दूसरा सबसे बड़ा खतरा हैं।
इंटरनेट के जरिये होने वाले अपराध केवल नेट/कम्प्यूटर, टैब या मोबाइल फोन पर काम करते हुए ही नहीं होते बल्कि इनके जरिये लगभग सारे अपराधों को अंजाम दिया जा सकता है। आये दिन मीडिया में ऐसी खबरें आती रहती हैं जब चोरी, सेंधमारी, महिलाआें के प्रति अपराध, यौन अपराध आदि में सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया गया, अपराधियों ने सर्च इंजन ‘गूगल’ के ‘सट्रीट व्यू’ के जरिये अपने लक्षित शिकार पर नजर रखी। फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, वाइन, फोरस्क्वायर आदि के लिए प्रयुक्त होने वाले स्मार्टएप वेबसाइट, एसएमएस संदेश, वीडियो आदि विभिन्न माध्यमों के लिए प्रयुक्त  होने वाले भौगालिक पहचान मेटाडाटा (जानकारी उपलब्ध कराने की आधार सामग्री भंडार) ‘जियोटैग’ से संचालित होते र्है जिसकी मदद से किसी भी व्यक्ति की मौजूदगी की जगह की सटीक जानकारी हासिल की जा सकती है। चोर के लिए यह जानकारी काफी है कि उसके लक्षित घर से उसका मालिक या घर के लोग कितनी दूर हैं। इसलिए विशेषज्ञ लोगों को अक्सर आगाह करते रहते हैं कि सोशल नेटवर्विंग एप ( एप्लीकेशन्स) पर काम करते समय अपने स्मार्टफोन के जेयाटैगिंग फंक्शन को अशक्त (डिसएवल) कर दें। साइबर अपराधों से संबंधित अध्ययन और आंकड़े इंटरनेट की दुनिया की चौंकाने वाली तसवीर पेश करते र्है। इस सुविधा का जितना इस्तेमाल अपराध नियंत्रण के प्रशासन, पुलिस और सुरक्षा एजेिंसयां करती हैं। अपराधी भी अपने मकसद के लिए इनके इस्तेमाल से पीछे नहीं हैं। रपटों के अनुसार इंटरनेट आधारित एक तिहाई यौन अपराध सोशल नेटवर्किग साइटों के जरिये अंजाम दिये गये। नाबालिगों के प्रति अपराध की 50 फीसदी घटनाआें में सोशल नेटवर्किग के इस्तेमाल की अहम भूमिका रही। सर्वेक्षणों से पता चला है कि आज फेसबुक का इस्तेमाल करने वालों में करीब एक चौथाई दस साल से भी कम उम्र के बच्चे र्है, करीब 40 प्रतिशत 13 साल ( कई सोशल नेटवर्किग  साइटों के लिए उपभोक्ता की वांछित आयु) से कम उम्र के हैं। किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रख रहे ये बच्चे जब नेटवर्किंग में व्यस्त रहते हैं तो आसानी से अपराधी तत्वों के शिकार हो जाते हैं। उन्हें फुसलाकर उनसे उनके फोटो, घर का पता, उनकी वास्तविक आयु, उनके स्कूल, दोस्तों और घर के बाकी लोगों के बारे में जानकारी आदि व्यक्तिगत सूचनाएं हासिल कर ली जाती हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ये किशोर माता-पिता या अभिभावकों से छिपाकर सोशल नेटवर्किग करते हैं या उनके माता-पिता नियमित रूप से उनकी इस व्यस्तता पर नजर नहीं रखते।
भारत जैसा विकासशील देश ही नहीं अमरीका और यूरोप के विकसित देश भी इससे अछूते नहीं हैं। शोध रपटों के अनुसार अमरीका क लोग यूरोपीय देशों, खासतौर से जर्मनी, की तुलना में सोशल नेटवर्किग में निजता की ज्यादा परवाह नहीं करते। दो तिहाई अमरीकी अपने कम्प्यूटर/मोबाइल में दी गयी प्राइवेसी सेटिंग से अनविज्ञ हैं या उसकी परवाह नहीं करते और ऐसे हालात साइबर अपराधों के लिए जमीन तैयार करते हैं। निःसंदेह  फेसबुक ने लोगों के आपसी संवाद के तौर-तरीकों को लगभग बदल दिया है लकिन इसका दूसरा पक्ष भी है जो अत्यंत भयावह है। इसका संजाल इतना विस्तृत है कि कम से कम मौजूदा समय में इस पर पूरी तरह नजर रख पाना संभव नहीं है। इसके लिए प्रयोक्ता का भी दायित्व है कि वह इसके दोनों पहलुआें के बारे में वांछित जगरूकता रखकर खुद को अपराधियों के हत्थे चढ़ने से बचाये रखे। फोनकाॅल और ई-मेल के साथ ही अब ठगी के लिए फेसबुक का जमकर इस्तेमाल हो रहा है। बैंकों द्वारा इलेक्ट्राॅनिक मीडिया और समाचार पत्र-पत्रिकाआें में विज्ञापनों के अलावा अपने उपभोक्ताआें को एसएमएस आदि के जरिये अपने बैंक खाते के बारे में किसी से भी जानकारी साझा करने के बारे में बारे बार आगाह किये जाने और यह स्पष्ट किये जाने कि बैंक कभी भी अपने उपभोक्ता से ई-मेल या फोन के जरिये खाते संबंधी जानकारी नहीं मांगते, के बावजूद आये दिन लोग अनजान लोगों को ऐसी जानकारी मुहैया कराकर अपनी मेहनत की कमाई से हाथ धो देते हैं।
फेसबुक पर इस तरह की ठगी ज्यादा असरदार होती है जिसमें काफी दिलचस्प ढंग से उकसाते हुए किसी भी व्यक्ति के बैंक खाते, क्रेडिट/डेबिट कार्ड के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश की जाती है। सोशल नेटवर्विंग कर रहे व्यक्ति को इस तरह का संदेश भेजा जाता है जो पहली नजर में कोई शक पैदा न करे। उसे बताया जाता है कि उसके नाम लाॅटरी लगी है या उसने गिफ्ट कार्ड के तौर पर मुफ्त इनाम जीता है जिसे पाने के लिए उसे अपने क्रेडिट/डेबिट कार्ड का नंबर या सोशल सिक्युरिटी नंबर मेल करना होगा और तमाम सावधानियों के बावजूद कई बार लोग इसके झांसे में आ जाते हैं। फेसबुक आदि सोशल नेटवर्विंग मंचों पर दूसरे को मूर्ख बनाना, तरह-तरह की धमकी देना जैसी हरकतें आमतौर पर किशोरों द्वारा महज मनोरंजन के लिए की जाती हैं लेकिन कई बार इसके भारी दुष्परिणाम देखने को मिले हैं या तक ऐसे संदेश पाने वाला आत्महत्या जैसे कदम उठाने को भी उद्यत हो जाता है। दूसरे व्यक्ति का अकाउंट या साइट हैक करना और उस पर आपत्तिजनक सामग्री लोड करना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।
दूसरों को परेशान करना यानी ‘स्टाकिंग’ के लिए फेसबुक का जमकर इस्तेमाल होता है। इसमें किसी भी व्यक्ति को लगातार अवांछित, अश्लील संदेश या धमकियां भेजी जाती हैं। विकृति की श्रेणी में आने वाली ऐसी हरकत का मकसद भले ही ‘मनोरंजन’ हो लेकिन यह ऐसा अपराध है जो संदेश पाने वाले की निजता और शांति का हनन करती है। इसी सिलसिले में एक और जुमला ‘ट्राेल’ इन दिनोंसोशल नेटवर्विंग के उपभोक्ताआें की जबान पर है। अगर कोई व्यक्ति विभिन्न कारणों से सोशल नेटवर्विंग पर काफी सक्रिय रहता है तो उसका इस समस्या से दो-चार होना  अवश्यम्भावी है। खासतौर से फेसबुक पर अनचाहे, अनजाने लोग जबरन  किसी भी व्यक्ति के ‘पेज’ पर तरह -तरह के संदेशों, जुमलों के साथ घुसपैठ कर जाते हैं। चुटकुले, व्यंग्य संदेशों से लेकर वैचारिक मतभेद वालों का खाली देने तक के संदेशों वाली यह घुसपैठ कई बार असह्य हो जाती है खासतौर से जब ‘घुसपैठिया’ विभिन्न राजनीतिक या व्यक्तिवादी प्रतिबद्धता वाला हो। निर्वाचन के समय ऐसे तत्व कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो जाते हैं।

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