‘साधारण’ आदमी का ‘असाधारण’ चेहरा

यह नवम्बर 1947 के दिनों की बात है। भारत को आजाद हुए अभी कुछ ही महीने हुए थे। आजाद भारत के गवर्नर जनरल लार्ड माउण्टबेटन के भतीजे प्रिंस फिलिप और क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय की शादी थी और विवाह की तिथि 20 नवम्बर निश्चित हुई थी। इस अवसर पर उनका जाना आवश्यक था परन्तु समस्या यह थी कि उनकी अनुपस्थिति में उनके दफ्तर का कार्यभार कौन संभालेगा ?..
भारतीय मंत्रिमंडल ने निर्णय लिया कि गवर्नर जनरल माउण्टबेटन की अनुपस्थिति में उनके दफ्तर का कार्यभार चक्रवर्ती राजगोपालचारीजी संभालेंगे। माउण्टबेटन का जाना निश्चित हो गया। अब दूसरी समस्या लेडी माउंटबेटन के सामने आयीं। वे  उन दिनों शरणार्थियों के कार्यों में व्यस्त थीं। भारत में उनकी इस जिम्मेदारी को किसे सौंपा जाय, यह एक अहम सवाल बन गया था। क्या करें, क्या न करें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। बात नेहरूजी के माध्यम से गांधीजी तक पहुंची। गांधीजी ने नेहरू से कहा –‘वे इस विषय में लेडी माउंटबेटन से बात करेंगे।’
गांधीजी वाइस रीगल पैलेस (वर्तमान राष्ट्रपति भवन ) गये। उन्होंने बड़े सहज और सरल स्वभाव से लेडी माउंटबेटन से कहा ‘मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि आप इस समय बहुत व्यस्त हैं, फिर भी  आप हमारी एक मदद कर दीजिये।’ लेडी माउंटबेटन ने बड़ी उत्सुकता गांधी जी से पूछा ‘भला मैं  आपकी क्या मदद कर सकती हूँ  ?’
गांधीजी उसी सरल भाव में बोले, ‘भारत अभी-अभी आजाद हुआ है और हमारे सामने बड़ी-बड़ी समस्याएं हैं। इसलिए ब्रिटिश शाही परिवार की शादी में हमारा जाना संभव नहीं हो पा रहा है। अगर आप हमारी तरफ से भारत का प्रतिनिधित्व कर सकें तो बड़ा अच्छा होगा। यहां की जिम्मेदारी हम संभाल लेंगे। ‘
लेडी माउंटबेटन ने गांधीजी के आशय को समझते हुए कहा –‘जब आप कह रहें हैं तो मैं इससे कैसे इनकार कर सकती हूँ। ‘–और वे शादी में जाने को तैयार हो गयी। गांधीजी ने उनके जाने की पूरी तैयारियां करवा दीं।
अब गांधीजी माउंटबेटन से मिले और बड़े सरल स्वभाव में उनसे कहा –‘आपके लंदन जाने की तैयारियां पूरी हो गयी हैं लेकिन मेरी इच्छा ही कि नव-दम्पति के लिए कुछ तोहफा भेजा जाये।’ माउंटबेटन ने उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए अपनी सहमति दे दी।
लौटकर तोहफे की स्वीकृति की बात गांधीजी ने अपने सचिव प्यारेलाल को बतायी। यह सुनकर वे बड़े असमंजस में पड़ गये और बोलें –‘हम भेजेंगे क्या ?. हमारे पास फ़िलहाल तो कुछ है नहीं !’
गांधीजी ने कहा –‘यह तो मैने सोचा ही नहीं। ‘—कुछ देर सोचने के बाद वे अपने कमरे में गये और अपने हाथों से काते गये सूत से बनी एक सूती शाल उठाकर ले आये। उसे प्यारेलाल को दिखाते हुए बोले -‘इसे अच्छी तरह से पैक कर दीजिये।’
गांधीजी ने अब लार्ड  माउंटबेटन को एक पत्र लिखा –‘मैं जानता हूँ कि आप भारत सरकार की तरफ से तोहफे के रूप में बेशकीमती राजस्थानी हीरे का हार ले जा रहे हैं, लेकिन मैं बहुत छोटी-सी भेंट आपके भतीजे के लिए भेज रहा हूँ। तोहफे के रूप में दी जा रही यह छोटी -सी वस्तु मेरे अपने द्वारा काते गये डबल सूत से बनी है। इसकी बुनाई मेरी एक शिष्या पंजाबी लड़की ने बड़ी मेहनत और लगन से की है। मेरे इस नाचीज तोहफे को मेरी इन शुभकामनाओं के साथ वर-वधू को प्रदान कर दें कि वें लम्बे और सुखी जीवन के साथ मानवता की सेवा करें। ‘
तोहफा और पत्र गांधीजी ने माउंटबेटन को दे दिया। माउंटबेटन ने गांधीजी को विश्वास दिलाया कि वे इस तोहफे का व्यक्तिगत रूप से वर-वधू को दें देंगे।
लंदन में बड़ी धूमधाम से शाही शादी हुई। इस अवसर पर माउंटबेटन ने गांधीजी द्वारा दिया गया तोहफा इन शब्दों के साथ नव-दम्पति को भेंट किया –‘यह तुम्हारे लिए सबसे कीमती तोहफा है।’—तोहफा ग्रहण करते हुए प्रिंस फिलिप ने सबके सामने बुलंद आवाज में कहा –‘गाँधी एक महान व्यक्ति हैं और उनका तोहफा भी महान ही होगा। ‘
शादी के दिन दुनिया भर से एक से एक आला दर्ज़े के तोहफे आए थे। लगभग 1500 बेशकीमती तोहफों को शादी में देखने के लिए सजाया गया था। हैदराबाद के निजाम ने भी हीरे-जवाहरात टंके तोहफे भेजे थे। गांधीजी के तोहफे में न तो हीरे टंके थे और न ही जवाहरात। वह तो बीच में ‘जय -हिन्द ‘ लिखी हुई एक साधारण सूती शाल थी लेकिन इसका महत्व निश्चित ही कीमती हीरे से भी कहीं अधिक था, क्योंकि यह एक ‘असाधारण व्यक्ति का दिया हुआ  तोहफा था।’
इतिहासकारों और गांधीजी को जाननेवालों की निगाहों में कीमती तोहफों की अपेक्षा इसकी कद्र कई गुना अधिक थीं। उनकी नजरों में शाही परिवार के लिए तोहफे का उतना अधिक महत्व नहीं था जितना गांधीजी जैसे व्यक्ति विशेष का था।
बाकी बेशकीमती तोहफों का तो पता नहीं क्या हुआ लेकिन भारत-ब्रिटेन मैत्री की प्रतीक और गांधीजी द्वारा भेंट की गयी वह सूती शाल एक अनमोल तोहफे के रूप में आज भी शाही परिवार के खजाने की शोभा एक महत्वपूर्ण विरासत के रूप में बढ़ा रही हैं।
लंदन की नेशनल पोट्रेट गैलरी में मार्च 1991 में आयोजित ‘राज प्रदर्शनी ‘में एक सूती शाल को अन्तिम वस्तु के रूप में प्रदर्शित किया गया था। इसी सूती शाल की यह दिलचस्प कहानी है।        n संजय अग्रवाल

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