संघर्ष

कई दिनों से तेज वर्षा हो रही थी।    तेज वर्षा की वजह से बाग के बुरे दिन शुरू हो गए थे। सबसे अधिक हानि बाग के फूलों की हुई थी। हवा की तेजी और वर्षा की मार से फूलों की पंखुड़ियां टूटकर मिट्टी में मिलती जा रही थीं। पता नहीं प्रकृति का कैसा कोप था।
फूल अपनी ओर से पौधों का आदर बढ़ाते थे,बाग की शोभा बनते थे मगर तूफान से उनका विनाश शुरू हो गया था—फूलों के पौधे कुछ नहीं कर पा रहे थे।
कुछ लोग कहते थे कि देश के शासकों ने जो निरंतर बमों के धमाके किये थे,उनसे वातावरण में तहलका मच गया था। सबसे बुरा प्रभाव नाजुक फूलों पर हुआ था। सबसे अधिक उदास भी फूल ही थे।
कुछ फूल गिर गए थे। कुछ और गिरने वाले थे। बाग के फूलों की दुर्दशा देखकर माली लोग शोक मनाने लगे थे। उन्हें महसूस होने लगा था कि उनका परिश्रम बेकार हुआ जा रहा था। उनके आंसू भी वर्षा की भांति गिर रहे थे। वास्तव में वे फूलों के ही आंसू थे।
‘कितने बेदर्द दिन आ गए हैं।’ बाग को उजड़ता हुआ देखकर माली चिन्तित ही हो सकते थे-‘क्या कभी सुन्दरता इस तरह भी तबाह होती है?’
मगर तूफानी वर्षा में भी दो फूल,अभी तक बचे हुए थे। वे दोनों सुच्चे गुलाब के फूल थे। तीन दिनों तक वे तूफानी वर्षा को सहन करते रहे। जब एक-दूसरे को देखता तो उत्साह से भर जाता,मगर तूफान तो निरंतर चल रहा था,जैसे कि कयामत ही आ जाएगी।
चौथे दिन संध्या समय उनमें से पीले गुलाब को लगा कि वह अभी ही टूटकर गिर जाएगा। यह बात सोचकर वह बहुत उदास हुआ। उदास होने से उसका रंग और अधिक पीला हो गया। जैसे उसमें रक्त ही न रहा हो।
पीले रंग के फूल को उदास देखकर रक्ताभ फूल ने पूछा-‘भाई,क्या बात है? तू आज ठीक नहीं?’
पीले गुलाब ने कहा-‘मेरे भाई,मैं तुझे क्या बताऊं! यह तूफानी बरखा मुझे नष्ट कर देगी—’
‘निराश क्यों होता है?’ रक्ताभ फूल ने कहा।
‘फिर क्या करूं?’
पीले गुलाब की बात सुनकर रक्ताभ फूल ने कहा-‘मुझे देख!’
पीले गुलाब ने उसे देखा तो उसने फिर कहा-‘मैं भी तो जिए जा रहा  हूं’
पीले फूल ने कहा-‘तू बलवान है’
‘क्या तू दुर्बल है?’
‘नहीं!’ पीले फूल ने उत्तर में कहा-‘मैं दुर्बल नहीं—परंतु परिस्थिति की निष्ठुरता तो देख—’
‘तब भी कोई बात नहीं—’रक्ताभ फूल ने उसे साहस दिया।
‘मगर देखो तो सही—-’ पीला फूल कुछ कहता हुअ,रुक गया-‘मुझे लगता है कि तूफान नहीं थमेगा !’
दूसरे दृढ़ निश्चय वाले फूल ने पहले उदास होने वाले फूल के निकट जाकर स्नेह से कहा-‘फिर तू घबरा क्यों गया है?’
‘बरखा से मेरे मुखड़े की दो पत्तियां गिर गई हैं !’ पीले फूल ने दुःखी मन से कहा-‘इसलिए मैं सोच रहा हूं—कहीं शेष पत्तियां भी गिर न जाए—फिर मेरा क्या बनेगा?’
रक्ताभ फूल ने पीले फूल की बात सुनकर फिर उसे देखा तो उसे लगा कि पीले फूल की बात ठीक थी। दो पत्तियां गिर जाने से उसका चेहरा बुरा-सा लगने लगा था—और उसे अपने सौन्दर्य का कितना गौरव था—पीला फूल हर समय कहता रहता था कि उसका रंग रूपसियों को अधिक आकर्षित करता है।
रक्ताभ ने उसे कहा-‘तू अपना चेहरा नीचे की ओर झुका ले और बरखा को मत देख—’
‘फिर क्या होगा?’
‘तू मेरी बात मानकर देख—’
‘उससे क्या लाभ होगा?’
‘तू सुरक्षित रहेगा—’
‘क्या यह सच है?’
‘हां, तेज तूफान चल रहा हो तो झुक जाना चाहिए।’ रक्ताभ फूल ने मन की बात की,तो पीले फूल ने आशा से पूछा-‘सच कहते हो?’ उस समय वह रक्ताभ फूल की तरफ देख रहा था। उसे महसूस होने लगा जैसे रक्ताभ फूल ने उसे कोई ईश्वरीय रहस्य बता दिया हो!’
रक्ताभ फूल उस पीले गुलाब का साहस बढ़ाने के लिए कहे जा रहा था-‘हां,बिलकुल सच है—हम इसी तरह तूफानी बरखा का मुकाबला कर सकते हैं।’ पीले गुलाब ने फिर कहा-‘मगर तूने यह बात मुझे पहले नहीं बताई थी—’
‘अवसर ही कहां था !’रक्ताभ गुलाब के फूल ने कहा-‘तूफान ने हमें अकस्मात ही दबोच लिया था—’
‘हां, यह सच है।’ पीले फूल ने भी कहा-‘संकट के समय तो व्यक्ति को अपनी भी होश नहीं रहती—’
रक्ताभ फूल ने कहा-‘अब तू मेरी बात मान ले!’
‘तेरी बात ठीक है।’ पीले फूल गुलाब ने भी कहा और अपना चेहरा झुका लिया।
रक्ताभ गुलाब कहने लगा-‘एक और काम कर!’
‘वह कौन-सा?’ पीले गुलाब ने पूछा तो रक्ताभ फूल ने कहा-‘कुछ समय के लिए खुद को हरी पत्तियों में छिपा ले।’
पीला गुलाब घबरा गया-‘क्या मैं  स्वयं को छिपा लूं?’
‘हां, तू यही कर।’
‘इस तरह मेरी मृत्यु निश्चित है।’
‘नहीं, तेरी मृत्यु न होगी। रक्ताभ फूल हंसकर पीले गुलाब को कहा-‘आज तू कैसी बातें कर रहा है?’
‘तूफान ने मुझे निराश कर दिया है—’
रक्ताभ गुलाब ने स्नेह से कहा-‘मैं कहता हूं—तू खुद को हरी पत्तियों की ओट (आश्रय) में छिपा ले।’
‘उससे क्या होगा?’ क्या पत्तियां अधिक बलवती हैं?’
‘इसका उत्तर मैं तुझे कल सुबह  ही दे पाऊंगा !’ रक्ताभ गुलाब ने कहा।
‘अगर मैं सुबह तक जीवित ही न रह पाया?’ पीले गुलाब ने उदास भाव से कहा -‘फिर क्या होगा?’
‘जीवित रहने की कोशिश कर।’ रक्ताभ गुलाब ने दृढ़ भाव से कहा-‘और तूफानी बरखा का कठोरता से सामना कर—जैसे मैं कर रहा हूं! यह मुकाबला तुम्हें करना ही पड़ेगा,नहीं तो बच नहीं सकेगा—’
‘अच्छा !’ पीले गुलाब ने साहस से कहा और उसने कोशिश करके स्वयं को हरी पत्तियों में छिपा लिया—-रक्ताभ गुलाब की भांति ही। उस समय उसके मन में आ  रहा था-‘यह मुकाबला मुझे करना ही पड़ेगा—क्योंकि मैं संकट में फंस गया हूं। अचानक ही  संकट में आने पर यह बेहतर तरीका है कि स्वयं को छिपा लिया जाए—लोग इसे पराजय कहते  हैं तो कहते रहें।’
फिर अपने विचारों में से निकलकर पीले गुलाब ने देखा कि रक्ताभ गुलाब पूरी तरह पत्तियों के नीचे छिपा हुआ था और एक भी शब्द नहीं कह रहा था। पीले गुलाब ने भी खुद को कहा-‘अगर रक्ताभ गुलाब का फूल तूफानी बरखा का मुकाबला कर सकता है, तो मैं क्यों नहीं कर सकता?’ और रात भर वह यही बात सोचता रहा। उसके मन में जीने की तमन्ना बढ़ गई थी। अगले दिन सूर्योदय से पूर्व ही वर्षा थम गई थी,मगर बादल आकाश में घूमते दिख रहे थे। दिन का प्रकाश होने पर रक्ताभ फूल ने हरी पत्तियों के पीछे से चेहरा बाहर निकालकर पीले गुलाब से पूछा-‘कहो भाई! जीवित हो?’
रक्ताभ गुलाब की बात सुनकर पीले गुलाब के फूल ने भी हरी पत्तियों में से अपना मुखड़ा बाहर निकाला और फिर मुस्कुराकर दृढ़ता से रक्ताभ गुलाब के फूल को एक विश्वास के साथ कहा-‘हां,मैं जीवित हूं—पूरी तरह जीवित हूं!’
-जसंवत सिंह विरदी

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