मैंने जो कुछ सीखा है,राज कपूर यूनिवर्सिटी से सीखा है :ऋषि कपूर

मेरा नाम जोकर से लेकर कपूर एंड संस तक,फिल्म इंडस्ट्री में बिताए 46 साल हो गए । 63 का मैं भी हो गया हूं। सबसे अच्छी बात यह है कि अब भी काम कर रहा हूं। करना मजबूरी भी है। इसके अलावा मैं कर भी कुछ नहीं सकता। इसलिए जब तक लोग प्यार से काम के लिए बुला रहे हैं, मैं भी आराम से फिल्में कर रहा हूं।
हीरो की लंबी पारी खेली-खैर,जोकर के तीन साल बाद मैं 1973 में बतौर वयस्क नायक बॉबी में दिखाई पड़ा। उसके बाद मैं 25 साल से ज्यादा हीरो बन कर आता रहा। कई उम्दा और कई बकवास फिल्में की। हीरो के तौर पर खेल-खेल में,लैला मजनू,कभी-कभी,दूसरा आदमी,अमर अकबर एंथोनी ,सरगम, कर्ज, नसीब,हम किसी से कम नहीं,कूली,प्रेम रोग,तवायफ,सागर नसीब अपना अपना,नगीना,एक चादर मैली सी,हथियार,घराना,चांदनी हिना,बोल राधा बोल,दीवाना,हम दोनों,दरार आदि 75 से ज्यादा हीरोवाली फिल्मों में से इन फिल्मों की यादें आज भी ताजा है। किसी एक्टर के लिए यह कोई नई बात नहीं हैं। पर माधुरी के साथ याराना और प्रेमग्रंथ के बाद मैंने फाइनली तय किया कि अब हीरो के रोल करने से बचूंगा। बस उसके बाद से कैरेक्टर रोल कर रहा हूं।
माता-पिता का नाम बताने से बचता रहा-मेरा ख्याल है कि मेरे निजी और फिल्मी जीवन के बारे में आप बहुत कुछ जानते हैं इसलिए आज अपने बारे में बताने के बजाय बेटे रणबीर के बारे में बताना अच्छा लगता है। एक्टिंग कोर्स समाप्त कर जब वह न्यूयार्क से वापस लौटा,तब तक वह पूरी तरह से एक अलग व्यक्ति बन चुका था। पहला परिवर्तन जो मैंने उसमें देखा, वह यह था कि माता-पिता के तौर पर हमारा नाम इस्तेमाल करने से वह बच रहा है। जैसे अपने ट्रेनिंग के दौरान उसने तय कर लिया था कि जो भी करेगा,अपने दम पर करेगा। माता-पिता के नाम की बात जाने दें,काम पाने के लिए किसी खास व्यक्ति के रेफरेंस का भी वह इस्तेमाल नहीं करना चाहता था। वह खुद ही अपने आप प्रोडक्शन हाउस का नंबर लेकर वहां ऑडिशन देने जाता था। मैं ऐसा हरगिज नहीं कह रहा हूं कि मेरा या नीतू का नाम बताने से निर्माता-निर्देशक उसे फटाफट मौका दे देते। लेकिन ऑडिशन की लाइन में थोड़ा वह आगे जरूर बढ़ जाता।
रणबीर को लेकर गर्वित हूं-रणबीर की कुछ ऐसी बातें हैं,जिसके चलते मैं आज सचमुच उस पर गर्वित हूं। वह फिल्मों में जिस तरह के रोल पसंद कर रहा है। वह जिस तरह से तोड़-मरोड़ कर अपने आपको गढ़ रहा है,वह एक बड़ी बात है। लोग उससे प्यार कर रहे हैं,ठीक उसी तरह से उसके बाप-दादा को लोग प्यार करते थे। वह रणबीर को भी मिल रहा है। यह सब देख कर बहुत अच्छा लगता है। असल में रणबीर कपूर परिवार की चौथी पीढ़ी है। सब ईश्वर की कृपा है।
सीखना जरूरी होता है- अपने अभिनय जीवन की बात करूं,तो मैंने जो कुछ सीखा है,राज कपूर यूनिवर्सिटी से सीखा है। अभिनय सीखने का इतना बड़ा इंस्टीट्यूट होने के बावजूद मैंने रणबीर को एक्टिंग सीखने के लिए न्यूयार्क के द ली स्ट्रासबर्ग थिएटर एंड फिल्म इंस्टीट्यूट में पढ़ने के लिए भेजा था। असल में इन दिनों अपने आपको अप-टु-डेट रखना बहुत जरूरी है। इस दृष्टि से रणबीर के लिए कपूर परिवार का परिवेेश काफी था। लेकिन एक्टिंग को लेकर माॅडर्न एप्रोच जानना भी उसके लिए जरूरी था। इस बात का ख्याल रख कर ही मैंने उसे न्यूयार्क के इंस्टीट्यूट भेजा था। उसका हर तरह से सीखना जरूरी भी था,क्यूंकि 17 साल के एक लड़के से मैं अचानक यह नहीं कह सकता हूं कि चलो तुम अब एक्टर बन जाओं। इसके लिए तो उसे अपने आपको तैयार करना होगा। उसने ऐसा ही किया। वह ऐसा इसलिए कर पाया क्यूंकि उसके अदर अभिनय के बीच मौजूद थे।
सुखी दाम्पत्य जीवन का रहस्य-अब जरा अपने 35 साल से ज्यादा के अपने विवाहित जीवन के बारे में। इसका एक ही मूलमंत्र है प्यार…मैं मानता हूं कि मेरे और नीतू के बीच कई बातों में मतभेद होते हैं। लड़ाई भी होती है। कभी-कभी एक-दो दिन दोनों के बीच बातचीत भी बंद हो जाती है। अन्य साधारण गृहस्थ परिवार में जैसा होता है,हमारे बीच भी वैसा होता है लेकिन एक बात है रिश्ते को बनाएं रखने के लिए प्यार के साथ ही आपसी विश्वास को भी बनाए रखना पड़ता है। हम बराबर उस पर अपनी गहरी नजर रखते आए हैं।
पुराने दिन को याद करता हूं तो मेरे दादाजी पृथ्वीराज कपूर सन् ‘30 में फिल्म इंडस्ट्री में आए थे। उनका हाथ पकड़ कर ही फिल्म इंडस्ट्री में कपूर पविार की यात्रा शुरू हुई। ईश्वर की कृपा है कि उस धारा को हम अब भी पूरे सम्मान के साा आगे बढ़ा पा रहे हैं। फिल्म परिवार के बेटे के तौर पर इससे बड़ा संतोषजनक बात कुछ नहीं है। मैं फिलहाल आज भी अपने एक्टिंग को लेकर ही सोच रहा हूं। इसके अलावा कुछ और अलग नहीं सोच रहा हूं। फिल्म बनाने के बारे में भी कोई रुचि नहीं है। मूल बात यह है कि एक्टिंग के कमिटमेंट को संभालने के बाद समय निकालना मेेरे लिए एक बड़ी समस्या है। इसलिए इस चक्कर में नहीं पड़ना चाहता हूं। फिल्म आ अब लौट चलें का निर्देशन किया था,पर मजा नहीं आया।

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