बुरी संगत का प्रभाव विनाशकारी होता है

एक नदी के किनारे एक पेड़ था। उस पेड़ पर एक हंस रहता था। पेड़ के नीचे एक गुफा में एक शेर रहता था। बहुत दिनों से साथ में रहते-रहते वे दोनों बहुत अच्छे मित्र बन गये थे। हंस के साथ रहने पर शेर का व्यवहार भी बदल गया था। वह बिना वजह जानवरों का शिकार नहीं करता तथा नदी आस -पास सभी जानवर भी मिलजुल के रहने लगे थे।
एक दिन आया एक चापलूस कौआ
एक बार हंस कुछ दिन के लिए कहीं बाहर चला गया था। तब उस पेड़ पर एक कौआ आकर रहने लगा। वह रोज शेर से बात करता और कहता -‘राजाजी ! आपका और हंस का भला क्या मेल ? आप दोनों मित्र कैसे हो सकते हैं ? वो हंस और आप जंगल के राजा। ‘कौवा के मन में हंस और अन्य जानवरों के प्रति बहुत ही कुविचार (हिंसा के भाव) थे। वह चाहता था कि शेर उन सब का शिकार करे और इस प्रकार वह बिना मेहनत किए, अपने लिए मजेदार भोजन पा लेगा और अन्य जानवरों में उसका भय और रुतबा भी बना रहेगा। इसलिए दिन-रात, उठते-बैठते वह शेर की चापलूसी करते हुए झठी-झूठी कहानियां कहता और अपना उल्लू सीधा करता रहता। धीरे-धीरे जंगल के सभी जानवर नदी के उस स्थान से दूर रहने लगें। शेर को भी जानवरों के मध्य अपना भय बढ़ता देखकर बहुत ख़ुशी होने लगी।
नदी का किनारा हुआ वीरान
एक दिन कौए ने मौके का खूब फायदा उठाया और जानवरों पर शेर के नाम से राज करने लगा। जानवर भी अब शेर के साथ उसकी मित्रता देख उसकी बात मानने लगे। कौए ने शेर को राजाओं जैसा व्यवहार करते हुए बाकी सब से दूर रहने की सीख दी। अब शेर भी कौए पर पूर्णतया निर्भर हो गया। अब नदी का किनारा भी वीरान रहने लगा। एक दिन जब शेर सो रहा था, तब उसे पंख फड़फड़ाने की आवाज आयी। उसने बिना देखे ही उस पक्षी पर हमला कर दिया। हंस जोर से चिल्लाया –‘दोस्त ! मैं हूं।’ तब घबराकर शेर ने तुरंत अपना पंजा हटा लिया। लहूलुहान हंस किसी तरह अपने को बचाते हुए पेड़ पर पहुंचा। उसने वहां अपनी जगह पर एक कौए को बैठे देखा ,वह उस पर हंस रहा था। हंस को अब पूरा माजरा समझ में आ गया। वह बिना कुछ बोले वहां बैठा रहा और अपने जख्मों के भरने का इंतजार करने लगा।
हारकर शेर ने हंस से कहा-
इधर ईर्ष्यालु कौआ तो उसके मरने के बाद उसे खाने की सोच रहा था। इसलिए मौक़े की नजाकत को देखते हुए, वह लगातार शेर से हंस पर एक और वार करने को कहने लगा। शेर में अब भी हंस से दोस्ताना लगाव था इसलिए हारकर उसने (शेर ने) हंस से कहा -‘हंस थे सो उड़ गये अब कागा भए दिवान/ जा मितर घर अपने सिंह किसके जजमान।’
संगति से ही मनुष्य की पहचान होती है
सच ही कहा गया है कि बुरी संगत का प्रभाव विनाशकारी ही होता है। संगति से ही मनुष्य की पहचान होती है। वैसे नीम बहुत गुणकारी होता है फिर भी नीम के पेड़ को अगर दूध और घी से भी सींचा जाए तो भी नीम का वृक्ष मीठा नहीं हो जाता और बिच्छू को कितना भी प्यार करो वो डंक मारना नहीं छोड़ता, क्योंकि वो उसका जन्मजात स्वभाव है। ठीक उसी प्रकार दुष्ट व्यक्ति को कितना भी ज्ञान दो, वो अपनी दुष्टता नहीं त्यागता।

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