बुद्धिमान कारीगर और धूर्त मंत्री

विजयनगर के राजा विक्रमसिंह बहुत ही बहादुर, परोपकारी और न्यायप्रिय राजा थे। एक दिन उनके दरबार में एक कारीगर बहुत ही बढ़िया जूतियां राजा के लिए बनाकर लाया। राजा जूतियां देखकर अत्यधिक प्रसन्न हुए। खजांची को आदेश दिया –‘इस कारीगर को सोने के 100 सिक्के तत्काल दे दिये जायें।’ ‘जो आज्ञा महाराज ! खजांची ने आज्ञा का शीघ्र पालन किया। कारीगर को इतनी बड़ी रकम मिलने की आशा न थी। वह राजा को झुक-झुककर सलाम करने के बाद सोने के सिक्के लेकर चला गया। सोने के सिक्के दिये जाने से मंत्री को काफी बुरा लगा। उसने राजा से कहा -महाराज ! आपने एक जोड़ी जूतियों के लिए 100 सोने के सिक्के उस कारीगर को दिलवा दिये !जबकि ऐसी जूतियों के लिए तो एक सिक्का ही काफी था।’ राजा ने कहा -‘मैं राजा हूँ। मुझे अपनी हैसियत के अनुसार ही देना चाहिए। ‘ मंत्री ने समझाते हुए कहा -‘महाराज ! जब जनता को पता चलेगा कि आपने एक जोड़ी जूतियों के लिए इतने सिक्के एक मामूली कारीगर को दे दिये है तब वह अपने हर काम के लिए बड़े इनाम की आशा करेगी। आपको यह निर्णय बदलना चाहिए।’राजा ने कहा, ‘यह कैसे किया जाय ?अब तो कुछ भी नहीं हो सकता। ‘ मंत्री अपनी धूर्तता में सफल होता देख फुसफुसाकर कर बोला -‘यह तो बहुत आसान काम है महाराज ! आप कारीगर से पूछें कि यह जूतियां गर्म हैं या ठंडी। यदि वह उसे गर्म बताये तो आप कह दें कि आपने उसे ठंडी मानते हुए 100 सिक्के देने को कहा था। यदि वह उसे ठंडी बताये तो कह दें कि आपने उसे गर्म समझते हुए इनाम दिया था। वह दोनों प्रकार से हीं इनाम खो देगा।’ कारीगर को वापस बुलवाया गया। राजा ने उससे पूछा -‘जूतियां गरम हैं या ठण्डी ?’ कारीगर हाथ जोड़कर बोला –‘हुजूर ! आपने जूतियों की सुन्दरता को देखकर मुझे 100 सिक्के इनाम देने की घोषणा की। मैं जानता हूँ कि आप सही बताने पर और अधिक इनाम देंगे लेकिन मैंने यह जूतियां पहली बार और विशेष कर आपके लिए ही बनायी थी। इस वजह से मैं इनके गरम या ठण्डा होने के बारे में बिल्कुल अनभिज्ञ हूँ।’कारीगर का जवाब सुन मंत्री का मुंह लटक गया। राजा ने खुश होकर खजांची से कारीगर को और 100 सिक्के दिलवाये। कारीगर ने इनाम लेकर राजा को खूब दुआएं दीं। जब कारीगर जा रहा था, उसके थैले से एक सिक्का गिरकर बालू रेत में दब गया। कारीगर गिरे सिक्के को तलाशने लगा। मंत्री को फिर उसके विरुद्ध कुछ कहने का मौका मिल गया। उसने कहा -देखा महाराज ! यह कितना लालची इन्सान है ! उसे 200 सिक्के मिले हैं, किन्तु एक सिक्का भी छोड़ना नहीं चाहता। इसका इस प्रकार आपके सामने सिक्का तलाश करना अशोभनीय है। यह व्यक्ति आपकी उदारता का पात्र नहीं हैं।’ राजा को भी यह बात बुरी लगी और क्रोधित होकर कारीगर को बुलाकर एकदम गरजते हुए कहा –‘तुम तो बड़े लालची कारीगर हो ! मैंने तुमको इतना इनाम दिया,मगर तुमसे एक सिक्का भी छोड़ा नहीं जा रहा ?’इधर कारीगर को गिरा हुआ सिक्का मिल चुका था। उसने भूमि तक झुककर राजा को 3 बार सलाम किया, फिर बोला –‘हुजूर ! आपके अलावा इतना इनाम कौन दे सकता है।’ राजा ने गुस्से से तमतमाते हुए कहा –‘फिर भी तुम एक सिक्के को छोड़ नहीं सके। ‘ कारीगर बोला -‘हुजूर ,मेरे माई बाप ! प्रश्न सिक्के का नहीं, आपकी शान का है। सिक्के में एक ओर आपका नाम और दूसरी ओर आपका सुन्दर चित्र अंकित है। यदि मैं उसे यूं ही पड़ा रहने देता तो वह सभी नौकरों के पैरों तले दबा रहता। उस पर किसी के पैरों का पड़ना मैं कैसे बर्दाश्त कर सकता था?.. इसलिए सिक्का खोज रहा था हुजूर।’
राजा कारीगर के उत्तर से इतना लाजवाब हुआ कि उसने प्रसन्न होकर उसे 1 हजार और सोने के सिक्के देने का हुक्म दे दिया। मंत्री कारीगर के हाजिर जवाब अंदाज को देखकर दंग रह गया। वह कारीगर को बस जाते हुए देखता ही रह गया।
n संजय अग्रवाल

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