नायाब नीलाभ गुलाब

कोलकाता के ऐतिहासिक एग्री-हार्टिकल्चरल गार्डेन में इस साल की शीतकालीन बावनवीं पुष्प-प्रदर्शनी में बंगाल रोज सोसाइटी ने नीले गुलाबों की नुमाइश की, जिसके नजारे के लिए दर्शकों का तांता लग गया। शीतकालीन पुष्प-प्रदर्शनी में रंग-बिरंगे गुलाब, वैजयंती, डहलिया और चमकती चंद्रमल्लिकाओं की बेइंतहा बहार छाए बिन नहीं रहती। दो शताब्दी होने को हैं कि सन 1820 में विलियम केरी के सौजन्य से इस गार्डेन को देश के सर्व प्रथम फूलों के मेला के आयोजन का गौरव हासिल है। ऐसा कोई साल नहीं जाता जब किसी न किसी नए किस्म के गुलाब का गुलाल नहीं उड़ता। गुलाब का हर रंग प्रतीकात्मक होता है – हरे से उम्मीद, काले से नाउम्मीद, सादा से सादगी, बैंगनी से बेगाना, पीला से प्रभात या पवित्र, गुलाबी से सहमति, नारंगी से निमंत्रण और नीला से नेहभरा न्यौछावर! पर प्रकृति की नियति ऐसी है कि उसने नीले गुलाब को खिलने से ही नकार दिया है। हालांकि गुलाब की एक किस्म का नाम है ‘ब्लू रोज’ पर वह नीला नहीं होता। कभी नील कमल खिलते थे, खूब खिलते थे, अब नील कमलों का नीमिलन हो गया है, वे नहीं मिलते।
एक ही महीने में जब दो पूर्णिमाएं हों, तो दूसरी पूर्णिमा को ‘ब्लू मून’ कहा जाता है पर वह तांबई होता है, नीला तो बिल्कुल नहीं। दस दिसंबर अठारह सौ तिरासी को उगे ‘ब्लू मून’ को देखकर दर्शक दंग रह गए। उन्नीस सौ पचास में एक डच वैज्ञानिक ने प्रमाणित किया कि वाकई चांद नीला ही नजर आया था क्योंकि वातावरण में व्याप्त गर्द-गुबार के कारण परावर्तित किरणों का करिश्मा हो गया था। गुलाबों की भी ऐसी ही गफलत है। मानिए, न मानिए कि गुलाब रंगहीन होते हैं। वैज्ञानिकों के ऐसे ही विस्मित करने वाले विचार हैं। प्रकाश न हो तो रंगों का कोई अस्तित्व ही नहीं। दरअसल, गुलाबों में ऐसे विशेष गुणसूत्र (जींस) होते हैं, जो प्रकाश के सात रंगों में किसी खास रंग को अपनाते हैं या परावर्तित करते हैं, ऐसी प्रक्रिया में, जिस रंग की आभा से अपूर्ण होते हैं, उसी रंग का चोला पहन लेते हैं। इस प्रकार गुलाबों की इंद्रधनुषी रंग-बिरंगी छटा छा जाती है। रंग-रंग के गुलाब के पाहुन हैं प्रकाश।
पांच हजार सालों से बाग-बगीचों के गुलाबों की गरिमा गूंजती है। गुलाब की असंख्य जातियां हैं। नई दिल्ली के ‘भारतीय कृषि गवेषणा केंद्र’ में दो हजार जाति के गुलाबों की खेती हो रही है। हर साल किसी नई जाति का जन्म होता है। रूप-रंग-गंध, खिलने की अवधि के अनुसार इनकी दो श्रेणियां हैं – प्राचीन प्रजाति और आधुनिक प्रजाति। प्राचीन प्रज्ञातियों में बार बार संकर-संघटन के फलस्वरूप आज की आधुनिक प्रजातियों का प्रजनन हुआ है – संकर टी व हाइब्रिड टी और फ्लोरिब्लांडा व हाइब्रिड पलिएंथा। हाइब्रिड परपेचुअल और टी सेंटेड गुलाब के संकर-संघटन से हाइब्रिड टी प्रजाति बनी है। बाग-बगीचों में खिलने-मिलने वाले गुलाब चाहे वे मिनिएचर, लतर या रेंबलर हों, इसी परिवार के सदस्य होते हैं ये इकहरे, दोहरे और बहुरंगी होते हैं। सुपरस्टार नारंगी, ब्लू मून (नील), माइकेल मीलेंड (हल्के गुलाबी), शोगर्ल (गहरे गुलाबी), क्रिम्सन ग्लोरी (लाल), ग्रनाडा और अमेरिकन हेरिटेज( दो रंगी) गुलाबों का बाहुल्य होता है।
जितने भी गुलाब हैं, वे आदिम से आधुनिक हुए हैं। लेकिन नीले गुलाबों के लिए कभी निश्चिंत नहीं हुआ जा सका। गुलाबों में ये कुलीन हैं। कुलीनता की कामना केवल कल्पना नहीं। नीले गुलाबों से भाग्योदय का भरोसा भी जुड़ गया। चीनियों की बद्धमूल धारणा है कि नील गुलाब दुर्लभ प्रेम की प्राप्ति के प्रतीक है। 1944 में टेनेसी विलियम्स ने एक दुखांत नाटक लिखी ‘दी ग्लास मेनेग्री’ जिसका एक पात्र लारा प्लूरिसि (फेफड़े के प्रदाह) से ग्रस्त थी, उसके प्रेमी ने ‘प्लूरिसी’ को गलती से ‘ब्लू रोज’ सुन लिया। उसने उसका का उपनाम ‘ब्लू रोज’ रख दिया। शोभा-शिल्पी सुमित्रा नंदन पंत के ‘नील कुसुम’ शीर्षक कविता में उद्गार हैं ‘नील फूल हरता मेरा मन/वह क्या नयनों का प्रतीक? स्मित दृष्टि गगन में जिसके / दृग खो जाते तत्क्षण / निर्निमेष वन /’
गुलाब विशेषज्ञ अमिताभ मुखर्जी के मुताबिक तीन तरह के रंगों (पिगमेंट्स) से ही गुलाब में रंगत आती है, क्लोरोफिल, एंथोसाइनिंस और कैरोटीनायड्स। सभी जानते हैं कि क्लोरोफिल हरे रंग का परावर्तन करते हैं, इसलिए पत्तियों के रंग हरे होते हैं। कैरोटीनायड्स नीले, बैंगनी और हरे रंग अवशोषित कर पीले या नारंगी रंग दर्शाते हैं। पीले गुलाबों में मौजूद कैरोटीनायड्स को जैन्थोफिल कहते हैं। एंथोसाइनिंस लाल, गुलाबी और बैंगनी रंगों के कारक हैं। गुलाबों में ये सभी रंग पेलारगोनिडिन के पुरस्कार हैं। साइनिडिन इसी से संबंधित होते हैं। नीले रंग के नियामक डेलाफिनीडिन इसी श्रेणी के हैं पर प्रकृति ने न जाने क्यों उन्हें गुलाबों के लिए प्रतिबंधित कर दिया है। इसीलिए नैसर्गिक नीले गुलाब नहीं खिलते। कुछ साल पहले दिल्ली के कुछ शोधकर्त्ताओं ने संसार का सर्वप्रथम नीले गुलाब खिलाने का दावा तो किया था पर प्रकारांतर से उनका दावा खारिज हो गया। कई प्रकार के गुलाब बीजों से उगाए जाते हैं लेकिन उनकी खेती के लिए आम तौर पर कलमें ही इस्तेमाल की जाती हैं। ऐसी चार पद्धतियां प्रचलित हैं- दावा कलम, शाखा कलम, चश्माकलम और भेंट या बांधा कलम। इनकी तरह – तरह की तकनीकें होती हैं।
आखिर नीलाभ गुलाब बाजारों में कैसे और कहां से आए? उपर्युक्त तकनीक से नीले गुलाब नहीं उगाए गए, उन्हें उगाने के लिए संकर संघटन की तकनीक ही अपनानी पड़ी पर इस तकनीक से उगे गुलाब निहायत नीले नहीं, नीलक (लिलक) निकले। इसके पूर्व सफेद गुलाबों को ही नीले रंग में सराबोर कर नकली नीले गुलाब बनाए जाते थे। बारहवीं शताब्दी में अरबी में इब्न अव्वाम अल इश्बली ने ‘किताब अल फेलाह’ लिखी थी, जिसका फ्रांसीसी में अनुवाद हुआ था, उसमें नील-नभ-नाई गुलाब का जिक्र किया गया था। ऐसे गुलाब के तने में नील रंग भरने की तकनीक आजमायी गयी थी। नीले गुलाब को उगाने की नाकामी से निराश हुए बिन आधुनिक वैज्ञानिकों ने जीन्स-यांत्रिकी से निरीक्षण-परीक्षण किए। आस्ट्रेलियाई और जापानी कंपनियों ने मिल जुल कर तेरह वर्षों तक अथक प्रयोग किए और तब कहीं जाकर सन दो हजार चार में ‘अल्पाज’ नामक नीले गुलाब उगाए जा सके।
नीले गुलाब उगाने की जींस-यांत्रिकी के तीन चरण हैं, दो गुणसूत्र जोड़ने और तीसरे में तब्दीली की तकनीक। शोध कर्त्ताओं ने नील रंगज डेलफिनिडिन का संयोजन करने के लिए पैंसी नामक फूल से क्लोन बनाया और बैंगनी गुलाब में स्थापित कर दिया। इस प्रकार एक गहरा बरगंडी गुलाब खिल गया। अब गुणसूत्र के एक अवयब आर.एन.ए. की ऐसी प्रभावी प्रक्रिया सक्रिय की गई, जिससे डेलफिनिडिन के रंग के उभरने में प्रोटीन बाधक न बन सके। इस सिद्धांत के सफल रूपायन से चटख नीला गुलाब खिल सकता है। पर नीलें रंग में बाधक प्रोटीन डी.एफ.आर को पूर्णतः निष्क्रिय नहीं किया जा सका पर लेवेंडर की तरह नीला गुलाब खिलाखिलाया। नीले रंग के निखरने के लिए गुलाब की प्रकृति क्षारीय होनी चाहिए न कि अम्लीय। अब गुलाब की मौलिक प्रकृति में अम्लीय परिवर्तन की प्रतीक्षा है, जिसका समाधान भविष्य के गर्भ में है।
जापानी कंपनी संतोरी ने सन 2010 में दस हजार ‘अल्पाज’ नामक नील गुलाब बेच डाले और अब इनकी बिक्री विश्वव्यापी होने वाली है, मगर ये महंगे हैं पर मन-भावन हैं। बंगाल रोज सोसाइटी भी हाथ पर हाथ रख कर नहीं बैठी है। चीन गुलाब का चर्चित चहेता है। बीजिंग में तीस हजार वर्ग मीटर में अंतराष्ट्रीय गुलाब संग्रहालय है, जिसमें एक लाख गुलाब की झाड़ियां झांकती है। कभी कतिपय अंग्रेज गुलाब प्रेमियों ने ऐसे गुलाबों की कई कलमें दूसरा लंदन कहलाने वाला कोलकाता भेजीं, जो शिवपुर स्थित (रायल) बोटैनिकल गार्डेन में रोपित शोभित हैं। ऐतिहासिक एग्री-हार्टिकल्चर सोसाइटी भी पुष्प प्रदर्शिनियों से गुलाबों की दमकती गरिमा बढ़ाने में सक्रिय है। निरालापन तो निमंत्रित होता ही है, नीले गुलाब को नकारा नहीं जा सकता।
-संतन कुमार पांडेय

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