दयानंद सरस्वती – आधुनिक भारत के महान चिंतक और संन्यासी योद्धा

‘आर्य समाज ‘ के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म  21 फरवरी संवत 1881 को अंबाशंकर  नाम के एक  ब्राह्मण के  परिवार में हुआ था। हिन्दू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की दशमी को उनका जन्म हुआ था।
इनका  प्रारंभिक नाम मूलशंकर तिवारी था। ये बचपन से ही बड़े होनहार, मेधावी, निडर और बुद्धिमान थे। मात्र 2 वर्ष की उम्र में उन्हें गायत्री मंत्र कंठस्थ हो गया था और उनका उच्चारण भी बिल्कुल स्पष्ट था। ‘होनहार बिरवान के होत चिकने पात’  कहावत  को इनकी बौद्धिक कौशल ने  चरितार्थ कर दिखाया।
धार्मिक परिवार में जन्म लेने के कारण उनको  हमेशा पूजा-पाठ और सत्संग का वातावरण  मिला और पिता की  शिव  पर प्रगाढ़ भक्ति ने बालक मूलशंकर को ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा जगा दी। इसलिए 14 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने  धर्म शास्त्रों सहित संपूर्ण संस्कृत, पाणिनि, व्याकरण, पांतजल -योगसूत्र तथा वेद-वेदांग- सामवेद व यजुर्वेद का अध्ययन कर लिया। बचपन से ही सभी चीजों को तार्किक दृष्टि से समझने का प्रयास करते थे।
स्वामी विरजानन्द से शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे समाज में व्याप्त  सामाजिक कुप्रथा और जातिगत कुरीतियों का विरोध करने के लिए यात्रा पर निकल पड़े।  भ्रमण करते हुए उन्हें कई विद्वानों व आचार्यों से ज्ञान अर्जित किया और फिर आपने गुरु के पास आये जहां, गुरु विरजानन्द द्धारा ही उन्हें ‘सरस्वती’ की उपाधि मिली।
कहते हैं कि गुरु दक्षिणा में गुरु विरजानन्द ने उनसे मांगा कि ‘विद्या को सफल कर दिखाओ, परोपकार करो, सत्य शास्त्रों का उद्धार करो, मत -मतांतरों की अविद्या मिटाओ, वेद के प्रकाश से इस अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करो, वैदिक धर्म का आलोक सर्वत्र विर्कीण करो। यही तुम्हारी गुरु दक्षिणा है।’ और आशीर्वाद दिया कि -‘ईश्वर उनके पुरुषार्थ को सफल करे।’
अपने गुरु के निर्देशानुसार स्वामीजी वेदों के प्रचार-प्रसार में जुट गये। और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत 1932 सन  (1875 )को गिरगांव में आर्यसमाज की स्थापना की।
धर्म सुधार की मंशा से महर्षि दयानंद जी ने आर्य समाज की स्थापना करके वेदों के महत्व को देशभर में घूम-घूमकर लोगों को बतलाया। उनके लगातार किये गए अथक प्रयासों के कारण कालान्तर में कई लोगों ने सामाजिक व धार्मिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज बुलन्द की। वेदों की सत्ता को सदा सर्वोपरि माना। वे मानते थे कि —‘वेदों को छोड़कर कोई अन्य धर्म ग्रन्थ प्रमाण नहीं हैं। ‘ अपने क्रान्तिकारी विचारधारा के कारण  उनसे आतंकित अंग्रेजी सरकार द्वारा  एक संन्यासी योद्धा और बागी फकीर कहलाये।
स्वामी जी जातिवाद, बालविवाह, सतीप्रथा  के खिलाफ थे और विधवा विवाह के पक्षधर थे। इन्होंने आजादी के प्रथम संग्राम में भी अग्रणी भूमिका निभाई थी। अंग्रेजों से सख्त चिढ़ने वाले स्पष्टवादिता के कारण वे  कई धार्मिक कट्टरवादियों, पोंगापंडितों और अंग्रेजी हुकूमत की नजरों में कांटे की तरह चुभते थे। जिनकी वजह से इन्हें कई जगहों पर उनका विरोध सहना पड़ा। उनपर कई बार जानलेवा हमले हुए, षड्यंत्र रचे गये।
जब वे जोधपुर में महाराज जसवंत सिंह के महल में थे तो वे वहां नित्य प्रवचन देते थे। महाराज भी उनके चरणों में बैठकर उनका प्रवचन सुना करते थे। महल में उन्होंने देखा कि ‘नन्ही’ नामक वेश्या का अनावश्यक हस्तक्षेप और महाराज पर अत्यधिक प्रभाव है तो उन्होंने  महाराज को समझाया तो महाराज ने नन्ही से सम्बन्ध तोड़ लिया। इस पर नन्ही स्वामी जी के विरुद्ध हो गई  और  उसने षड्यंत्र करके स्वामी जी के रसोइए कलिया (जगन्नाथ )को अपनी तरफ करके दूध में पिसा कांच मिला कर पिलवा दिया। बाद में कलिया ने स्वामी जी के सामने अपना अपराध स्वीकार किया और क्षमा मांगी। उदार हृदय -मना स्वामी जी ने न सिर्फ उसे माफ़ किया बल्कि कुछ रुपये देकर उसे विदा किया ताकि उसे पुलिस परेशान न करें। उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया जहां चिकित्सक  भी औषधि के नाम पर हल्का विष ही पिलाता रहा। जब अजमेर के अस्पताल में ले जाया गया तब तक बहुत विलम्ब हो चुका था और स्वामीजी को बचाया न जा सका। यह सारा षड्यंत्र अंग्रेजी सरकार के इशारे पर हुआ।1883 में कार्तिक अमावस्या (दीपावली )की संध्या को स्वामी जी का पार्थिव शरीर  पंचतत्व में विलीन हो गया।
उनके अन्तिम शब्द थे –‘प्रभु !तूने अच्छी लीला की !आपकी इच्छा पूर्ण हो।’
आज स्वामीजी  शारीरिक रूप से हमारे  के बीच  नहीं रहे, लेकिन सत्य का जो प्रकाश उन्होंने जगत में फैलाया था वह आज भी अंधेरे को दूर करके उजियारा  कायम कर रहा है।
इनकी रचित पुस्तकें —जैसे –सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, ऋग्वेदभाष्य, यजुर्वेद भाष्य, संस्कार विधि, अष्टाध्यायी भाष्य, वेदांग प्रकाश आदि आज भी हमें राह दिखा
रही हैं।

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