क्या मूर्तिकार लालची था ?

राजा विक्रमादित्य ने पेड़ पर चढ़कर उस पर लटके शव को उतार लिया और अपने कंधे पर डालकर अंधेरे में बढ़ चला। रास्ते में शव में मौजूद बेताल ने कहा, ‘राजन ! यात्रा की ऊब को दूर करने के लिए एक कहानी सुनाता हूं सुनो, लेकिन बीच में बोलना मत।’ इतना कहकर बेताल ने कहानी शुरू की-
ललितपुरी नामक एक छोटे से गांव में एक महान शिल्पकार रहता था। उसका नाम था कुमार वर्मा। वह बहुत बड़ा शिल्पकार था। पत्थरों को तराश कर वह इतनी आसानी से सुंदर-सुंदर आकृतियां गढ़ देता था मानों वह पत्थर से नहीं मोम से बना रहा हो। उसकी इस कला की प्रशंसा पूरा गांव करता था। एक दिन गांव के मुखिया ने उसे बुलाया और उससे कुछ बातें की। वर्मा ! मेरी बात ध्यान से सुनना। कोई भी कला और कलाकार तभी अागे बढ़ता है जब उसे सही संरक्षक मिल जाता है। दूर दराज के इस छोटे से गांव में तुम क्या प्राप्त कर सकते हो। इसलिए, मेरी बातों को गंभीरता से लो और इस राज्य के राजा के पास जाकर पनी कला दिखाओ। निश्चितरूप से तुम्हें मदद मिलेगी।
वर्मा को यह बात जंच गयी। मुखिया की बातों में दम था। उसने कहा, ‘आप ठीक कहते हैं। आपने जो कुछ कहा है मैं वही करूंगा।’
वर्मा ने उसी दिन आवश्यक सामान बांधा और राजधानी के लिए रवाना हो गया और कुछ ही दिनों में वहां पहुंच गया। कुछ दिनों तक वह राजा से मिलने की कोशिश करता रहा। जब उसकी सारी कोशिशें व्यर्थ हो गयीं तब वह गांव लौट आया। अपनी गरीबी से वह काफी निराश था। इतना ही नहीं उसकी कला से भी उसकी आजीविका चलाने में मदद नहीं मिल पा रही थी। दिनों दिन बदतर होती जा रही अपनी स्थिति से तंग आकर वह सोचने लगा कि इससे तो अच्छा है कि जान ही दे दूं। तभी एक घटना घटी। दूर के एक गांव के मुखिया ने उसे तुरंत बुलाया। वर्मा दौड़ता-दौड़ता उस गांव में पहुंचा। गांव के मुखिया ने उसे आराम से बैठाया। जब वर्मा की सांसें नियंत्रित हो गयीं तब मुखिया ने कहना शुरू किया- ‘कुमार वर्मा ! मुझे पता चला है कि तुम एक दक्ष शिल्पकार हो। मैंने तुम्हारी कला को लोगों के सामने प्रदर्शित करना चाहता हूं। अब से मैं तुम्हें हर माह सौ वाराह वेतन दिया करूंगा। तुम काम शुरू करो और ज्यादा से ज्यादा सुंदर सुंदर प्रतिमाएं बनाना शुरू कर दो। ठीक है न ?’
कुमार वर्मा ने मुस्कुराया और हां में सिर हिला दिया। उस दिन से वर्मा पत्थरों को तराशकर सुंदर-सुंदर मूर्तियां बनाने लगा। सारा गांव और आसपास के गांव के लोग भी उसकी कला से चकित थे।
गांव का मुखिया वर्मा और उसके काम से बहुत खुश था। उसने वर्मा की बनायी मूर्तियों को पास के गांवाें, कस्बों में ले जाकर बेचना शुरू कर दिया और उनसे इतना धन कमाया कि कुछ ही दिनों में वह इस क्षेत्र का धनी जमींदार बन गया। एक दिन एक व्यापारी जमींदार ने एक मूर्ति खरीदी। मूर्ति की सुंदरता को वह देखता रह गया। उसने सोचा कि अगर वर्मा को अपने लिए काम करने के लिए तैयार कर लिया जाये तो काफी धन कमाया जा सकता है। यह विचार आते ही उसने तुरंत वर्मा को एक संदेश भेजा और वर्मा उस जमींदार के पास पहुंच गया। उसने कहा-‘कुमार वर्मा ! मैं तुम्हारी इस मूर्ति कला का दीवाना हूं। मुझ लगता है कि तुम्हारा वर्तमान मालिक तुम्हें सिर्फ सौ वाराह देकर तुम्हारा अपमान कर रहा है। अगर तुम यहां रहकर मेरे लिए काम कर सकाे तो मैं तुम्हें प्रति माह पांच सौ वाराह दूंगा और रहने, भोजन और वस्त्र की व्यवस्था अलग से कर दूंगा। बोलो कर सकोगे?’ उसने वर्मा से पूछा। वर्मा के चेहरे पर वैसा कोई भाव नहीं आया जैसा पहले मुखिया के यहां आया था। उसने हां कह दी।
जमींदार बहुत खुश था क्योंकि वर्मा उसकी मर्जी के मुताबिक राजी हो गया था। उसके बाद उसने वर्मा को सभी आवश्यक व्यवस्थाएं कर दीं। वर्मा ने अपने सुंदर विचारों को पत्थरों पर उकेरना शुरू कर दिया। उसने दो फीट से सात फीट तक की मूर्तियां बनानी शुरू कर दी। जमींदार उन मूर्तियों को दूरदराज के क्षेत्र में भेजने लगा और उन्हें धनवान लोगों को बेचने लगा। वर्मा की कृतियों का आकर्षण और उनकी मांग दिनोंदिन बढ़ने लगी और इतनी बढ़ गयी कि ऊंचे दामों में ये मूर्तियां बिकने लगीं और सारा धन जमींदार के जेबों में जाने लगा।  धीरे-धीरे वर्मा और उसकी मूर्ति कला की प्रशंसा फैलने लगी। राज्य के शासक ने कुछ मूर्तियां खरीदी और उन मूर्तियों की जीवंतता को देखकर मुग्ध हो गये। उसने मंत्रियों को आदेश दिया कि वे वर्मा को दरबार में ले आएं। मंत्री तुरंत उस स्थान पर पहुंच गए जहां वर्मा जमींदार के साथ काम कर रहा था।
उन लोगों ने उन्हें राजा का आदेश सुनाया अौर अपने साथ ले गये। उन्होंने राजा के सामने उसे प्रस्तुत किया। राजा ने वर्मा का स्वागत किया, हालचाल पूछा और उसकी कला की भूरि-भूरि प्रशंसा की। मुझे गर्व है कि मेरे राज्य में ऐसा कलाकार है। अब से तुम राज्य के कला विभाग के प्रमुख होगे और तुम्हें प्रति माह एक हजार वाराह और अन्य सुविधाएं भी मिलेंगी। मेरा आग्रह है कि तुम ऐसी आकृतियां बनाओ, जिन्हें मैं विभिन्न राज्यों में भेजूंगा। मैं चाहता हूं कि तुम्हारा नाम इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाये।
आश्चर्यजनक रूप से वर्मा ने चेहरे पर बिना कोई भाव लाए अपनी सहमति दे दी। वर्मा ने कहा कि वह शानदार मूर्तियां बनाना चाहता है और उसके लिए अच्छी किस्म के संगमरमर की आवश्यकता है। उसने राजा से कहा कि वह उत्तर भारत से पत्थर मंगवा दें। राजा ने उसकी यह मांग मान ली और अपने आदमियों पर यह काम सौंप दिया। एक महीने के बाद राजा के कर्मचारी बड़े-बड़े आकार के संगमरमर पत्थर लेकर आ गये। इस बीच वर्मा ने इन संगमरमर को तराशने के लिए विशेष छेनी तैयार कर ली। पहले ही दिन से वर्मा ने अद्वितीय प्रतिमाएं बनाने के लिए संगमरमर के टुकड़ों को तराशने के काम शुरू कर दिया। राजा इन मूर्तियों को अपने पड़ोसी राज्यों के राजाओं को उपहार देने लगा और इसके जरिये उन राजाओं के साथ कई सामाजिक-राजनैतिक तथा आर्थिक समझौते कर लिये। इसी तरह से राजा ने कुछ सुन्दर प्रतिमाएं महाराज को वार्षिक कर के साथ भेज दीं।
यह वही राजा था जिससे मिलने की इच्छा वर्मा ने जतायी थी और मिलने की कोशिश भी की थी लेकिन अवसर नहीं मिल पाने के कारण वह निराश होकर लौट आया था। राजा ने उन प्रतिमाओं को देखते ही भरे दरबार में उस शिल्पी की मुक्त कंठ से प्रशंसा करने से अपने आपको रोक नहीं पाया। उसने अपने प्रमुख दरबारियों से कहा कि वे शाही रथ लेकर जायें और उस शिल्पी को पूरे सम्मान के साथ राज्य में लेकर आएं।
वर्मा रथ पर बैठने वाला ही था कि एक गरीब आदमी, जिसका नाम था विरुपाक्ष, आंखों में चमक लिए कुमार वर्मा के पास पहुंचा। उसने वर्मा से कहा, ‘हे महान शिल्पी, मुझे पत्थर तराशने की कला का थोड़ा बहुत ज्ञान है। आपके कार्य से प्रेरित होकर मैंने भी कुछ पत्थरों को तराशा है। मैंने महसूस किया कि किसी भी विधा में व्यक्ति पारंगत तब तक नहीं हो सकता जब तक किसी गुरु से प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया जाए। कृपया मुझे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कीजिए और शिल्पकला के सभी पहलुओं के बारे में मुझे बताइये। वर्मा ने चुपचाप  वीरुपाक्ष के अनुरोध को सुना और बिना कुछ कहे रथ पर सवार हो गया। ’
रथ जैसे ही राज महल पहुंचा, राजा ने बड़े ही गर्मजोशी  से स्वागत किया। उन्होंने कहा, ‘हे महान कुमार वर्मा ! मैंने अपने राज्य में तुम्हारे जैसा शिल्पकार नहीं देखा। तुम मेरे राज्य में रहते हो यह जानकर मुझे अति प्रसन्नता हुई। मैं तुम्हें शिल्प विभाग का प्रमुख और शाही मूर्तिकार के पद पर बिठाना चाहता हूं और इस पद के लिए तुम्हें प्रति माह दस हजार वराह दिये जाएंगे।’ यह सुनने के बाद पहली बार कुमार वर्मा ने बोलना शुरू किया, ‘महाराज ! आपने जो सम्मान मुझे दिया है, वह सब शिरोधार्य है लेकिन मैंने अपने गांव जाने का निश्चय किया है। वहीं रहकर मैं अपना शेष जीवन अपनी इसी कला के साथ गुजार दूंगा। कृपया मुझे क्षमा करें, मैं आपका यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सकता।’
यह सुनते ही सारे दरबार में सन्नाटा छा गया। सबको यह आशंका सताने लगी कि वर्मा के इस उत्तर को सुनकर राजा नाराज हो जायेंगे। लेकिन राजा का व्यवहार इसके विपरीत हुआ। वे वर्मा को देखकर मुस्कुराये  और कहा, ‘तुम्हारी नम्रता से मैं प्रसन्न हूं।
तुम्हें यहां सुदूर स्थान से लाया गया है इसलिए मैं तुम्हें खाली हाथ नहीं भेजूंगा। कृपया इसे अपने कौशल के लिए मेरी ओर से दी गयी भेंट स्वीकार करो।’ इतना कहकर वर्मा ने एक लाख वराह उसे दे दिया; साथ ही ललितापुरी गांव भी उसे दे दिया। तमाम उपहारों को लेकर वर्मा अपने गांव लौट आया।
ललितापुरी लौटने के बाद वर्मा ने एक संस्थान खोला और वहां मूर्तिकला का प्रशिक्षण देना प्रारंभ कर दिया। विरुपाक्ष उसका पहला शिष्य बना।
बेताल ने इतना कहकर राजा से पूछा, ‘विक्रमादित्य ! कुमार वर्मा धूर्त स्वभाव का प्रतीत होता है। क्या तुम्हें नहीं लगता कि उसके स्वभाव में यह था कि सफलता के लिए जिस सीढ़ी का इस्तेमाल करो उसे बाद में गिरा दो ?अब तुम यह बताओ कि
सबसे पहले उसने राजदरबार में शरण लेने का प्रयास किया। और जब स्वयं राजा ने उसे पद देना चाहा तो उसे  मना क्यों कर दिया ?’
विक्रमादित्य ने मुस्कुराते हुए कहा कि कुमार वर्मा न तो लालची था, न ही घमंडी और अहंकारी। वह अपनी कला के सच्चे पारखी की तलाश में  अपने मालिकों को बदलता गया। हर किसी ने वर्मा से व्यापारिक लाभ लेने के लिए उससे संबंध बनाये। लेकिन राजा ने ऐसा नहीं किया। कोई भी कलाकार उस्ताद तभी हो सकता है जब कोई उसकी कला की नकल करे या अनुसरण करे। विरुपाक्ष का अनुरोध करना इस बात का प्रमाण है। वर्मा ने ऐसे लोगों को प्रशिक्षित करने की इच्छा प्रकट की और उन्हें हर संभव सिखाना शुरू कर दिया। इसीलिए उसने प्रशिक्षण केंद्र भी खोला।
बेताल इस उत्तर से संतुष्ट हुआ और फिर से उड़कर पेड़ की डाल पर जा लटका।

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