कामनाएं और सुख

दिन भर खेत में काम करने वाला किसान शाम तक थक कर चूर हो जाता है। भोजन के बाद वह कंधे का अपना गमछा जमीन पर बिछा कर उस पर देह गिरा देता है। देह गिराने भर की देर होती है कि उसे नींद आ घेरती है। वह जब सोकर उठता है तो तरोताजा रहता है और फिर अपने काम में लग जाता है।
एक व्यापारी दिन भर अपने व्यवसाय में लगा रहता है। वह शरीर से कम थकता है। अपने वातानुकूलित कक्ष में बैठे-बैठे वह अधीनस्थों को आदेश देकर अपना काम कराता रहता है। दिन भर वह दूरभाष, लैपटॉप और इन्टरनेट पर उलझा रहता है। जब वह खाने बैठता है तो उसे भूख नहीं रहती। देर रात जब वह सोने जाता है तो उसे नींद नहीं आती।
नींद के लिये वह दवा की गोलियां खाता है। सुबह उसकी नींद देर से टूटती है। बिछावन छोड़ने का उसका मन नहीं करता। वह बिछावन पर ही चाय पीता है। रिमोट उठा कर टीवी पर समाचार देखता है अथवा भजन लगा कर समाचार पत्र उलटने लगता है। एक बार फिर चाय पीता है। उसके बाद वह बिछावन छोड़ता है और अपनी दिनचर्या में लग  पाता है।
एक किसान को दिन भर शारीरिक श्रम करने के बाद अच्छी भूख लगती है और वह सुख की नींद सोता है। दूसरी ओर एक व्यापारी है जिसे सुविधाओं की अधिकता के बाद भी ठीक से न भूख लगती है और न नींद आती है।
किसान, मजदूर जैसे सामान्य जनों की कामनाएं व्यापारी, अधिकारी और राजनेताओं की अपेक्षा कम होती हैं। एक रिक्शावाला सूखी रोटी नमक-प्याज के साथ खाकर तृप्त हो जाता है लेकिन सामान्य जन से ऊपर तबके के लोगों को बहु-व्यंजन के बाद भी भूख नहीं लगती। भोजन से पूर्व उन्हें भूख की दवा खानी पड़ती है।
नींद और भूख तो उदाहरण मात्र हैं। ऐसी अनेक आवश्यकताएं हैं जो जीवन के लिये आवश्यक हैं। घर-परिवार के लिये भी कुछ भौतिक आवश्यकताएं पूरी होनी चाहिये लेकिन भौतिक आवश्यकताओं का अंत नहीं है। अंतहीन आवश्यकताएं ही कामना हैं।
कामनाएं चूंकि अनंत हैं, इसलिये वे असीमित भी हैं। रहने के लिये घर मिल जाने पर अच्छे घर की कामना होती है। अच्छा घर बन जाने पर और अच्छे घर की कामना होती है। उसी तरह वाहन के नाम पर साइकिल, स्कूटर, मोटरसाइकिल से आगे अब कार की कामना आम बात हो गयी है। जिसके पास कार है, वह अधिक कीमती कार की कामना करता है।
मकान, कार के अतिरिक्त अनेक प्रकार की भौतिक कामनाएं हैं जैसे रेलगाड़ी के वातानुकूलित डिब्बे अथवा वायुयान से यात्रा करने की कामना, महंगे होटलों में भोजन की कामना, बड़े लोगों को अपने यहां भोजन पर आमंत्रित करने की कामना। छोटे-छोटे अवसरों पर बड़े-बड़े आयोजन करने की कामना, गुणविहीन होने पर भी आर्थिक बल पर लोकप्रिय बनने की कामना आदि।
कुछ लोगों को तरह-तरह के कपड़े अर्थात् पोशाक पहनने की कामना होती है। वे महंगी और तरह-तरह की पोशाकें खरीदते रहते हैं। ऐसे लोगों को कपड़ों की खरीदारी करने, उन्हें सिलवाने और पहन कर दूसरों को दिखाने में बड़ा मजा आता है। जितना अधिक कपड़ा, रख-रखाव में उतनी अधिक परेशानी लेकिन कामनाएं पूरी करने के लिये ऐसा करना पड़ता है।
बहुत से लोग खाने के शौकीन होते हैं। वे इतने प्रकार के भोजन खाते हैं कि उनका हाजमा ही बिगड़ जाता है। रात के भोजन के बाद सुबह से ही परेशानी शुरू हो जाती है लेकिन उसके बाद भी वे खाने से पीछे नहीं हटते। दूसरे दिन वे फिर तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजनों के नाम पर गरिष्ठ भोजन पर टूट पड़ते हैं। भोजन खाकर बीमार पड़ने वालों की संख्या कहीं अधिक है।
धन का उपयोग भौतिक कामनाएं पूरी करने के लिये होता है किन्तु इसके अलावा कुछ लोगों को मात्र धन संचय की कामना रहती है। ऐसे अधिकतर लोग अपने जीवन की आवश्यक सुविधाओं का भी उपयोग नहीं कर पाते।
इसी तरह कुछ लोग खेत या जमीन खरीदने की कामना से ग्रस्त होते हैं। जहां कहीं जमीन मिली, वे उसे खरीद लेते हैं। कुछ लोग तो इस कामना पूर्ति के लिये अपना और अपने परिवार का पेट काटने से भी नहीं हिचकते।
कामनाएं सहज पूरी नहीं होतीं, इसके लिये अथक प्रयास की आवश्यकता होती है। कामना पूर्ति के लिये किया गया प्रयास गलत तो भी सकता है। गलत प्रयास से की गयी कामना पूर्ति का समाज पर बुरा प्रभाव पड़ता है और इससे समाज में व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर आंच आ जाती है। गलत ढंग से की गयी कामना पूर्ति पर शासन की दृष्टि भी पड़ती है जिससे कानूनी अड़चनों की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
कामनाओं की पूर्ति को लोग सुख मानते हैं लेकिन कामनाएं पूरी हो जाना सुख नहीं है। यह सुख का आभास है। सच्चाई यह है कि कामनाएं जैसे-जैसे पूरी होती जाती हैं, सुख वैसे-वैसे समाप्त या कम होता जाता है। इसका मूल कारण है कि एक कामना की पूर्ति होते होते मन में दूसरी कामना पैदा हो जाती है। यह सिलसिला जारी रहता है। जितनी कामनाएं उत्पन्न होती हैं, उन सबकी पूर्ति नहीं हो पाती। इससे मन दुखित हो जाता है।
कुछ लोगों को अपने लाभ की कामना होती है तो कुछ लोगों को दूसरों को नुकसान पहुंचाने की कामना रहती है। ऐसी कामनाओं की पूर्ति से सुख का जो आभास होता है, वह वास्तविक नहीं है। ऐसे सुख में दूसरों के सुख में उत्पन्न बाधाओं का दुख समाहित रहता है।
ऐसे बहुत कम लोग हैं जिन्हें कामनाएं पूरी हो जाने पर वास्तविक सुख की प्राप्ति होती है लेकिन समाज में कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें वास्तविक सुख मिलता है। ऐसे कुछ लोग अपने आप सुखी रहना ही चाहते हैं, दूसरों को भी सुखी देखना चाहते हैं बल्कि दूसरों को सुख देकर उन्हें सुख मिलता है। ऐसे ही लोग दूसरे की बेटी की शादी कराना, शादी में सहयोग करना, किसी निर्धन छात्र की अध्ययन में सहायता करना, दूसरों को अपने पैरों पर खड़ा होने के लिये प्रेरित करना जैसे कामों में लगे रहते हैं। ऐसे लोगों की कामना यदि पूरी हो जाती है तो उन्हें वास्तविक सुख मिलता है। उस सुख में आनंद छिपा होता है।
वास्तविक सुख दिखाई नहीं देता क्योंकि यह आंतरिक होता है। भौतिक सुखों से इसकी कोई तुलना नहीं होती। वास्तविक रूप से सुखी व्यक्ति बाह्य रूप से आसानी से पहचान में आ जाये, यह आवश्यक नहीं है। वास्तविक रूप से सुखी व्यक्ति किसी पेड़ के नीचे जीवन यापन करने वाला भी हो सकता है और किसी आलीशान इमारत का स्वामी भी हो सकता है। वह नंगा भी हो सकता है और उसके पास कपड़ों का अंबार भी हो सकता है। वास्तविक रूप से सुखी व्यक्ति शारीरिक रूप से अस्वस्थ हो सकता है अथवा वह पूर्ण स्वस्थ भी हो सकता है। वास्तविक सुखी व्यक्ति को जानने-पहचानने वाला कोई नहीं हो सकता अथवा वह देश-दुनिया के लिये अति परिचित भी हो सकता है।
कामना और सुख में एक बहुत बड़ा अंतर होता है। कामनाओं का परिणाम प्राय: दृश्य होता है लेकिन वास्तविक सुख प्राय: अदृश्य होता है। कामना का उत्पत्ति स्थल मन है। अंतर्मन को नियंत्रित कर कामना को नियंत्रित किया जा  सकता है।

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