कश्मीर पर कैमरा

बेहद संवेदनशील जगह होने के बावजूद यहां शूटिंग करना हमारे फिल्मकारों को आज भी पसंद है

फिल्मों का एक दौर था जब गानों के फिल्मांकन की बात आती थी,ताे निर्देशक कश्मीर में डेरा डाल देते थे। लेकिन पिछले कई सालों से वहां के हालात इतने नाजुक हैं कि अब वहां शूटिंग करने की बात फिल्मवाले डरते-सहमते सोचते हैं। हाल के वर्षों में वहां यहां, हाइवे, ये जवानी है दीवानी, जब तक है जान, स्टूडेंट आॅफ द इयर, सात खून माफ, रॉकस्टार, लम्हा, रोजा, मिशन कश्मीर, माचिस, लक्ष्य, दिल से हैदर, फितर, बजरंगी भाईजान आदि कुछेक फिल्मों की ही शूटिंग ही हुई है। वह भी वहां की खूबसूरत वादियों को कुछेक फ्रेम में ही कैमराबद्ध किया गया था। वरना एक दौर था, जब बात-बात पर फिल्मवाले कश्मीर में शूटिंग के लिए भाग जाते थे। जानवर, जंगली, कश्मीर की कली, जब जब फूल खिले, आरजू, सिलसिला, कभी-कभी आदि उस दौर की ढेरों ऐसी फिल्में हैं, जो कश्मीर की पृष्ठभूमि में बनी, लेकिन इनमें कुछ फिल्में ही ऐसी है, जिसमें वहां की जीवन शैली को दर्शाया गया। असल में उन दिनों हर तीसरी फिल्म की शूटिंग के लिए निर्माता कश्मीर के बारे में सोचते थे। लेकिन हम यहां ऐसी फिल्मों का जिक्र करेंगे,जिसमें कश्मीर को बेस्ड करके पूरी कहानी रची गई।
फितूर मेें कश्मीरियत– इसमें गरीब घर के एक कश्मीरी युवक नूर मोहम्मद यानी आदित्य राय कपूर का प्यार एक बडे़ परिवार की बेटी फिरदौस-कैटरीना कैफ से हो जाता है। निर्देशक अभिषेक कपूर ने इस प्रेम कहानी के जरिए अपने तई कश्मीर के जीवन शैली में भी झांकने की कोशिश की थीं, मगर कमजोर कथाक्रम की वजह से वह इसमें विफल रहे। फिल्म भी विफल रही। पर उन्हें इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने इसमें कश्मीर के कुछ अंचल में जाकर और मुंबई के स्टूडियो में सेट बनाकर अमीर कश्मीरी और गरीब कश्मीरवासियों के विभेद को पेश किया था।
‘रोजा’ के मणि रत्नम– जहीन फिल्मकार मणि रत्नम उन चंद निर्देशकों में से एक जिन्हें कश्मीर हमेशा लुभाता रहा है। मणि रत्नम की फिल्म रोजा आतंकवाद पर केंद्रित थी। पहले मणि इस फिल्म की सारी शूटिंग यही करना चाहते थे, पर वहां के नाजुक हालत को देखते हुए उन्हें इसकी शूटिंग कुन्नूर, मनाली, ऊटी जैसे दूसरे हिल स्टेशन पर भी करनी पड़ी। लेकिन इसके बावजूद कश्मीर के लोगों की जीवन शैली को कहीं भी मिस नहीं किया था। उन्होंने पूरा प्रयास किया कि उनका कश्मीर प्रेम इसमें खिल कर सामने आ सके। इसमें उन्होंने एक दक्षिण भारतीय प्रेमी युगल ऋषि-रोजा के बहाने कश्मीर को सेंट्रल में रखा। यह प्रेमी युगल किस तरह से आतंकवादियों का सामना करते हुए उसकी चपेट से अपने आपको बाहर निकालते हैं, यह इस फिल्म का प्लस प्वायंट है। इसके साथ ही मणि इसी बहाने वहां की संस्कृति को भी बेहद उम्दा ढंग से दिखाते हैं।
विशाल की प्रिय जगह -निर्देशक विशाल भारद्वाज को भी कश्मीर में शूटिंग करना बहुत पसंंद है। सात खून माफ और हैदर अपनी इन दोनों फिल्मों की शूटिंग के लिए कश्मीर घूम चुके हैं। खास तौर से हैदर का पूरा सब्जेक्ट ही वहां का आतंकवाद था। इसके साथ ही उन्होंने इसमें डल लेक, पहलगाम, अनंतनाग, मत्तन, गुलमर्ग, पुराना श्रीनगर, निशात बाग, काजीगुंड, मार्तलैंड सन टेंपल, कश्मीर यूनिवर्सिटी गार्डेन, हजरत बल आदि उल्लेखनीय जगहों को बेहद कलात्मक ढंग से अपने कैमरे में कैद किया था। जाहिर है ऐसे में वहां की जीवन-शैली के कई पहलू खुद-ब-खुद सामने आ गए। और यही इस फिल्म का सबसे श्रेष्ठ पक्ष है।
गुलजार ने भी आतंकवाद को फिल्माया-बेहद संजीदा निर्देशक गुलजार ने भी अपनी फिल्म माचिस के बहाने यहां निचले तबके के आतंकी बनने की वजह की बहुत अच्छी तरह से पड़ताल की थी। किस तरह कश्मीरी युवक आंतकवादयों के बहकावे में आकर दिशाहीन हो जाते हैं और बाद में रास्ते में भी आ जाते हैं, इसे गुलजार जैसे निर्देशक ही पूरी कुशलता के साथ पेश कर सकते थे।
सुजीत की ‘यहां’- सुजीत सरकार की यहां में एक कश्मीरी युवती मीनिशा लांबा और सेना अधिकारी जिम्मी शेरगिल के प्यार के केन्द्र की जीवन यापन के कई सुदर पहलुओं को पेश किया था, जिसमें कुछ कटु और दिलचस्प पहलू थे। सुजीत ने काफी सावधानी बरतते हुए यहां के कुछ जगहों को अपनी फिल्म का लोकेशन बनाया था। उन्होंने इस बात को भी शिद्दत से दर्शाया था कि पैसे वहां के सीधे-सादे लोग दहशतगर्दों के झांसे में आ जाते हैं।
विधु का सपना पूरा हुआ– कश्मीर के रहनेवाले निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा ने अपनी दिली इच्छा मिशन कश्मीर बना कर पूरा किया था। और वह इसमें काफी सफल भी रही। कश्मीर के होने की वजह से वह कश्मीर के रग-रग से वाकिफ हैं, इसलिए उन्होंने आतंकवाद के भय की परवाह न करते हुए अपनी इस फिल्म को एक कश्मीरियत लुक दी थी। खास तौर से इसमें कश्मीरी युवक-युवती के तौर पर सिर्फ अभिनेता ऋतिक रोशन और प्रीटी जिंटा ही नहीं, बाकी सारे किरदार भी कश्मीरी लग रहे थे। विधु कहते हैं, ‘अब मैं वहां क यंग जनरेशन को पृष्ठभूमि में रखकर एक फिल्म बनाना चाहता है ताकि इसकी संस्कृति के दूसरे पहलू भी उभर कर सामने आ सके।’ फिर मौका मिला, तो मैं कश्मीर को बेस्ड बनाकर एक फिल्म जरूर बनाउंगा।’
जब-जब डल लेक में मिले– इन दिनों अस्वस्थ चल रहे अभिनेता शशि कपूर को स्टार बनाने में जिस फिल्म जब-जब फूल खिले का अहम हाथ था फिल्म काफी हद तक कश्मीरियत पर बेस्ड थी। यूं तो शशि कपूर ने कई फिल्मों की शूटिंग की थी, मगर डल झील में शिकारा चलाते हुए उन्हें बहुत मजा आया था। दरअसल शशि ने इसमें एक शिकारेवाले का रोल किया था। याद कीजिए इस फिल्म में उन पर फिल्माया गया एक अति लोकप्रिय गीत अप्पू खुदा को। इस गाने में उन्होंने अपने बडे़ भाई शम्मी कपूर को पूरी तरह से फॉलो किया था। इस दौरान कश्मीर की सुन्दरता ही नहीं वहां की जीवन शैली को बहुत करीब से देखा जा सकता है। समय-समय पर कश्मीर के इस अंदाज ने भी वहां पर्यटकों को लाने में बड़ा योगदान दिया है।
कश्मीर का असली हीरो- याहू स्टार शम्मी कपूर को कश्मीर से इतना गहरा लगाव था कि वह अपनी ज्यादातर फिल्मों की शूटिंग यहां करना पसंद करते थे। यहां की सुन्दर वादियों में उन पर इशारों-इशारों में…,दीवाना हआ बादल..,ओ तुमसे अच्छा कौन है …जैसे एक दर्जन से ज्यादा हिट गाने फिल्माए गए थेे। कश्मीर की कली, जानवर, जंगली, तुमसे अच्छा कौन है आदि कई फिल्मों की ज्यादातर शूटिंग यहां की गई थी। लेकिन कश्मीर की कली की शूटिंग के दौरान वह याह की जीवन शैली से बहुत प्रभावित हुए थे, क्योंकि यह फिल्म काफी हद तक वहां के रहन-सहन पर केंद्रित थी। इसके बाद से ही शम्मी कपूर ने यहा के कई स्थानीय लोगों को अपना बहुत अच्छा दोस्त बना लिया था। यहां तक कि यहां के कई शिकारावालों को वह उनके नाम से जानते थे। उनके दान का हाथ भी बहुत बड़ा था। यही वजह थी उन दिनों कश्मीर में उनकी फिल्म की शूटिंग होने पर लोग रास्ते में खडे़ होकर छोटे-छोटे फूलों के गुलदस्तों से उनका स्वागत करते थे।
यश को कश्मीर से मोहब्बत थी-रोमांस के बादशाह फिल्मकार यश चोपड़ा ने कभी अपनी एक बातचीत के दौरान कहा था कि उन्हें कश्मीर से गहरी मोहब्बत है। इसलिए दाग, कभी-कभी सिलसिला, विजय, नूरी आदि कई फिल्मों की शूटिंग यहां की। जब हालत बिगड़ने लगे थे, तब भी उन्होंने सिलसिला के दो गानों और कुछ अहम दृश्यों का फिल्मांकन यहां किया था लेकिन उनकी फिल्म कभी-कभी में तो कश्मीर को काफी फुटेज मिला था। असल में अमिताभ को यहीं सेटल दिखाया गया था। लेकिन बावजूद इसके कश्मीर के उच्च वर्ग की जीवन शैली इसमें नजर आती है। सच तो यह है कि पुराने दौर के ज्यादातरा फिल्मकार ही कश्मीर में शूटिंग करना पसंद करते थे। पर जैसा कि संजीदा अभिनेता अनुपम खेर कहते हैं, ‘हालत अच्छे हो जाएं तो आज भी हमारे निर्माता ओवरसीज में गानों कें फिल्माकन के बजाय कश्मीर में शूटिंग करना पसंद करेंगे। कामना यही है कि ऐसा जल्द हो।  – असीम चक्रवर्ती

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