….और मेहनत रंग लायी

एक छोटे से गांव में एक किसान बिरजू रहता था। उसके परिवार में बस एक मुर्गा और मुर्गी को छोड़कर और कोई नहीं था। बिरजू अपने मुर्गा -मुर्गी से बेहद प्यार करता था उन्हें पलभर के लिए भी अपनी आंखों से ओझल नहीं होने देता था। वह खेती पर भी उन्हें अपने साथ ले जाता था। वह उन्हें प्यार से बंटी और बबली कहता था।
एक दिन उसने देखा कि खेतों में बोयें जाने वाले बीज खत्म हो गये हैं। उसने गांव -भर में सबसे थोड़े से बीज मांगे ,लेकिन किसी ने उसे बीज नहीं दिया। हारकर बिरजू ने शहर जाकर बीज लाने का निश्चय किया ,पर मुर्गा-मुर्गी का क्या करें ?. मजबूर होकर उसने बहुत सारा दाना–चुग्गा का ,उन दोनों के लिए जुगाड़ कर,घर पर रख दिया और बीज लेने शहर की ओर चल दिया।
कुछ देर तक बिरजू के बिना बंटी-बबली उदास होकर चुपचाप बैठे रहे, यहां तक कि वे खाना-पीना भी भूल गये लेकिन जब उन्होंने देखा काफी शाम हो जाने के बाद भी बिरजू वापस नहीं आया तो उन्हें चिंता होने लगी। बंटी मुर्गे को बहुत जोरों से भूख लगी थी, सो वह दाना चुगने लगा। अचानक वह जोर से कुकड़ूं -कूं चिल्लाया तो बबली मुर्गी घबरा गयी। उसने मुर्गे से पूछा –‘क्या हुआ, इतनी जोर से क्यों चीखे ?’
बंटी ने कुकड़ूं -कूं की आवाज में बबली से कहा –‘मेरे गले में दाना अटक गया है, जल्दी से पानी लाओ। ‘  बबली मुर्गी ने चारों तरफ देखा, उसे कहीं भी पानी दिखायी नहीं दिया। शायद बिरजू हड़बड़ी में उनके लिए पानी रखना भूल गया था। अब तो बबली और भी घबरा गयी। वह भागी-भागी नदी पर आयी। उसने नदी से कहा –‘नदी रानी, नदी रानी, मेरे मुर्गे के गले में दाना अटक गया है। क्या तुम मुझे थोड़ा पानी दे सकती हो ?’
नदी ने कहा –‘बहन, मैं तुम्हें पानी तभी दे सकती हूँ, जब तुम गांव के चौपाल के पेड़ की एक पत्ती लेकर आओगी। ‘
बबली भागी-भागी पेड़ के पास पहुंची और कहने लगी —‘पेड़ राजा, मुझे अपने पेड़ की एक पत्ती दे दो। ‘
पेड़ बोला –‘नहीं मुर्गी रानी, मैं तुम्हें ऐसे ही पत्ता नहीं दे सकता। जब तक तुम जमींदार की बेटी से मेरे लिए एक धागा मांगकर नहीं लाओगी, तब तक मैं पत्ती नहीं दूंगा। ‘
बबली हांफते-हांफते जमींदार की बेटी के पास गयी और उससे धागा मांगा। जमींदार की बेटी मुंह बनाकर कहने लगी –‘मेरी कंघी टूट गयी है ,जब तुम मेरे लिए कंघी लाओग, तब धागा दूंगी। ‘
मजबूर और बेबस बबली दौड़ी-दौड़ी कंघी वाले के पास गयी और उससे कंघी मांगने लगी।
कंघीवाले ने कंघी दे दी। उसने कंघी वाले को धन्यवाद दिया और भागी-भागी जमींदार की बेटी के पास गयी। जमींदार की बेटी ने उसे धागा दे दिया। धागा लेकर वह पेड़ के पास आयी,पेड़ ने उसे पत्ता दे दिया। पत्ता लेकर उसने नदी को दिया, तब जाकर अंत में नदी ने उसे पानी दिया।
पानी लेकर दौड़ती -दौड़ती वह बंटी के पास आयी और बोली -‘कुकड़ूं -कूं मुर्गे राजा देखो, मैं तुम्हारे लिए पानी लाई हूँ। तुम जल्दी से इसे पी लो। ‘
मुर्गे ने झट से पानी पीया, जिससे दाना गले के नीचे उतर गया। खुश होकर बंटी ने जोर से बांग लगाई ‘कुकड़ूं कूं -कुकड़ू कूं।’ और बिरजू भी तब तक घर आ गया था।
उसे अपने पानी नहीं रखकर जाने का बहुत अफ़सोस हुआ तथा साथ में अपनी बबली की समझदारी और मेहनत पर गर्व भी हुआ। दूसरे दिन खेत में उनलोगों के साथ जाकर बीज बो दिये।

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