…और इन्द्र का व्यूह सफल हो गया

ब्रह्मदत्त जिस समय काशी राज्य पर शासन कर रहे थे, उस समय उनके सामंत राजा चिरायु के यहां नागार्जुन नाम से बोधिसत्व मुख्यमंत्री का भार संभालते थे। नागार्जुन दयालु और दानी के रूप में लोकप्रिय थे। साथ ही रसायन शास्त्र और औषध विज्ञान के पारंगत विद्वान थे। उन्होंने एक रसायन-प्रयोग के द्वारा एक रहस्य-योग का अविष्कार किया और उसके जरिये राजा तथा अपने को भी बुढ़ापे और मरण से दूर रखा।
एक बार अचानक नागार्जुन का सबसे प्यारा पुत्र सोमदेव स्वर्गवासी हुआ, तो नागार्जुन को अपार दुःख हुआ। वे सहज ही  दयालु थे, इसलिए सोचने लगे, ‘आइंदा इस संसार में किसी की मृत्यु न हो ! कोई भी मानव दुःख का शिकार न बने, इस वास्ते कोई न कोई उपाय करना होगा।’
आखिर नागार्जुन ने निश्चय किया कि -‘रसायनों का प्रयोग अधिक खर्चीला है। इसलिए सर्व साधारण जनता के लिए भी खरीदने लायक जड़ी-बूटियां द्वारा अमृत तैयार करना होगा। तभी सभी लोग दुःख-दर्द से दूर होकर सुखी  रह सकते हैं।
अपने इस निर्णय के अनुसार कई तरह की औषधियों के संयोग से नागार्जुन अमृत तैयार करने में लग गये। अपने सारे शास्त्र-विज्ञान का उपयोग करके उन्होंने अनेक अनुसंधान किये। बहुत हद तक सारी प्रक्रियाएं पूरी हो गयीं। उनका अनुसंधान अब अंतिम चरण में पहुंचा। अब केवल अमृत -कल्प नामक जड़ी-बूटी को मिलाने से उनका प्रयोग संपूर्ण होने वाला था।
इस बीच यह समाचार इंद्र के कानों तक पहुंचा। उसी वक्त देवराज इन्द्र ने अश्विनी देवताओं को बुलाकर आदेश दिया –‘तुमलोग तुरंत पृथ्वीलोक में चले जाओ और नागार्जुन के अमृत योग को पूर्ण होने से रोक दो। तुमलोग बिना संकोच उन पर साम, दाम, भेद और द्ण्डोपायों का प्रयोग करो। बाकी काम मैं देख लूंगा।’
अश्विनी देवता वेष बदलकर भूलोक पहुंचे। नागार्जुन से मिलकर कुछ तथ्यपरक प्रश्न पूछे। तदनंतर बोले –‘मंत्रिवर ! राज्यों के उलट-फेर करने की युक्तियाँ जाननेवाले आप महानुभाव से कोई बात छिपी नहीं है लेकिन इस वक्त आप ब्रह्मा के संकल्प को रोकने का साहस कर रहे हैं। मानव  जाति की ‘धर्म गति बनी मृत्यु को आप ‘अमृत सिद्धि के द्वारा अवरुद्ध कर देंगे तो सृष्टि का शासन डगमगा      जाएगा न ? अगर मानव नहीं मरता है तो, उनके वास्ते कितने लोक चाहिए ? अलावा इसके जो कार्य देवताओं के द्वारा संपन्न होना है, उसे मानव मात्र बने आप संपन्न करने का प्रयत्न करें तो क्या देवता और मानवों के बीच कोई अंतर रह जाएगा ? आपका पुत्र भूलोक को भले ही त्याग चुका हो, पर वह स्वर्ग में सुखी है। ‘
इन बातों से नागार्जुन का मन संतुष्ट नहीं हुआ। वे इस विचार में डूब गये कि -वे  जो कार्य कर रहे हैं, वह उचित है या नहीं ?…’
इसी बीच, राजा चिरायु के पुत्र जयसेन का युवराज के रूप में अभिषेक करने की तैयारियां पूरी हो गयीं। एक शुभ मुहूर्त में सारा दरबार सभासदों से खचाखच भर गया। उधर वृद्ध ब्राह्मण का रूप धरकर पृथ्वी पर पहुंचकर इन्द्र जयसेन के पास गये और गुप्त रूप से यों बोले–‘बेटा, क्या तुम यह बात नहीं जानते कि तुम्हारे पिता बुढ़ापे और मरण से परे हैं ? इसलिए तुम्हें सदा के लिए युवराज बनकर ही रहना पड़ेगा, लेकिन तुम्हें कभी राज्य प्राप्त न होगा।’ यह सुनकर जयसेन चिंता में डूब गया। तब वृद्ध ब्राह्मण ने समझाया –‘बेटा ! इस बात को लेकर तुम चिंता न करो। तुम्हारी मनोकामना की पूर्ति के लिए एक सरल उपाय है। नागार्जुन का एक नियम है कि भोजन के पूर्व जो कोई कुछ मांगे, उसे देने की परिपाटी है। कल तुम वक्त पर पहुंचकर, बिना झिझके के यह मांगो कि मुझे आपका सिर चाहिए। फिर देखा जाएगा कि क्या होता है।’
राज्य के लोभ में फंसे जयसेन ने वृद्ध के कहे अनुसार नागार्जुन के पास पहुंचकर उनका सिर माँगा। उन्होंने बिना किसी संकोच के अपनी तलवार जयसेन के हाथ में देकर कहा –‘बेटा ! डरो मत। मेरा सिर काट कर ले लो।’
पर रसायन के प्रभाव से उनका सिर वज्र तुल्य हो गया था, इस कारण जयसेन द्वारा कई बार काटने पर भी नागार्जुन का सिर नहीं कटा।
यह समाचार जब राजा के पास पहुंचा तो वहां पर दौड़े आये, अपने पुत्र के इस कार्य पर दुखी हो उसे रोकना चाहा। तब नागार्जुन बोले -‘महाराज ! युवराज ने जो कामना व्यक्त की, उसके आगे-पीछे की बातें मैं अच्छी तरह जानता  हूँ। जयसेन तो सिर्फ निमित्त मात्र है। इसलिए मैंने इसको नहीं रोका। पिछले जन्म में मैंने 99 दफे इनकार किये बिना अपना सिर काट कर दिया है। यह 100 वीं दफा है। इस बार पीछे हटने के अपयश से मुझे बचाने  की जिम्मेदारी आपकी है।’ इन शब्दों के साथ भक्तिपूर्वक आखिरी बार नागार्जुन ने राजा के साथ आलिंगन किया।
इसके बाद अपनी जड़ी-बूटियों वाली थैली में से एक जड़ी-बूटी निकाली, उसका रस निचोड़ दिया और उसे तलवार पर मलकर जयसेन से बोले–‘बेटा, अब मेरा सिर काट डालो।’
जयसेन ने ज्यों ही तलवार चलाई, त्यों ही गाजर-मूली की तरह नागार्जुन का सिर कट कर नीचे गिर पड़ा। उस दृश्य को देख सहन न कर सकने के कारण राजा भी अपने प्राण त्याग करने को तैयार हो गये।
इस पर फर्श पर गिरे नागार्जुन के सिर से यह सुनाई पड़ा —‘राजन ! आप कृपया चिंता न करें ! मैं अपने सभी जन्मों में आपके साथ रहूंगा।’ इस घटना के बाद  राजा पूर्ण रूप से विरागी बन गये। तत्काल ही वे अपने पुत्र का राज्याभिषेक करके तपस्या  करने हिमालय  पर  चले गये।  इस प्रकार जयसेन को राज्य प्राप्त हुआ और इन्द्र का व्यूह भी सफल हुआ।
n संजय अग्रवाल

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