इलेक्ट्राॅनिक कचरे की देन -पारा प्रदूषण

विद्युतचालित उपकरणों, विशेषकर इलेक्ट्रानिक उपकरणों ने  दुनिया का स्वरूप बदल दिया है। इनके कारण लोगों की जीवन शैली और कल-कारखाने की कार्यशैली बदलने के साथ ही बढ़ी है दुनियां की जगमगाहट। पर  इस जगमगाहट के पीछे एक अंधकार भी है जो अत्यंत खतरनाक है। एक अवधि तक उपयोग  के पश्चात ये उपकरण खराब या अनुपयोगी हो जाते हैं। उसके बाद इन्हें कचरे  के साथ फेंक दिया जाता है। अनेक देशों में व्यवस्था के कारण या मजबूरी के कारण कुछ हद तक  इन्हें अलग किया जाता है या रीसाइकिल करके उससे नए उत्पाद तैयार किए जाते  हैं। बचा कचरा अन्य जैविक कूड़ा के साथ पड़े रहता है। इनमें मौजूद भारी  धातुएं व जहरीले रसायन रिस-रिस कर बाहर आते हैं और भूमि व जल के साथ वायु  को भी प्रदूषित करते हैं।
खतरनाक इलेक्ट्रानिक कचरा : विभिन्न प्रकार के विद्युत व  इलेक्ट्रानिक उपकरणों में प्रयुक्त होने वाला पारा यानी मरकरी सबसे खतरनाक  तत्व है। मिसाल के तौर पर, लैपटॉप, कंप्यूटर, टेलीफोन, डीवीडी प्लेयर,  फैक्स मशीन, फोटो कॉपियर और एलसीडी युक्त उपकरणों में पारे का उपयोग किया  जाता है।
वैसे तो इनमें मात्र 2 से 10 मिलीग्राम तक ही पारे का उपयोग  होता है पर यदि इसे जोड़ा जाए तो विश्व मेें पारे की कुल खपत का 22 प्रतिशत  इन उपकरणों में प्रयुक्त होता है। प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला पारा व  उसके यौगिक जहां, विभिन्न रासायनिक उद्योगों में उत्प्रेरक व अन्य रूपों में  प्रयुक्त होते हैं वहीं विद्युत व इलेक्ट्रानिक उपकरणों में भी ये बहुतायत  से प्रयोग किए जाते हैं।
तीन रूप : मुख्यत: यह तीन रूपों में प्रयोग होता है,  धातु रूप में, अकार्बनिक यौगिकों के रूप में जैसे मरक्यूरस क्लोराइड,  मरक्यूरिक क्लोराइड और कार्बनिक यौगिकों के रूप में। ये सभी यौगिक शरीर पर  दुष्प्रभाव डालते हैं।
पारे के यौगिक : पारा वायु के अन्य अवयवों के साथ  मिलकर पारे के यौगिक बनाता है जो वातावरण के लिए बहुत खतरनाक होते हैं। इस  तरह भूमि पर फैलने वाला पारा वायु में भी मिल जाता है और भिन्न-भिन्न  माध्यमों से होता हुआ, जल स्रोतों में भी मिल जाता है। जल में रहने वाले  जीव पारे को ग्रहण कर विषैले हो जाते हैं। जब हम इन जीवों का सेवन करते हैं  तो यह विष हमारे शरीर में आ जाता है।
पारे का चक्र : जल से वायु में, वायु से जल में, स्थल  से वायु में, स्थल से जल में पारे का यह चक्र इसी तरह चलता रहता है।
हानिकारक है पारा : पारा एक विचित्र रासायनिक तत्व है।  यह सामान्य तापमान और दाब पर तरल रूप में रहता है लेकिन 0.3 वायुमंडल दाब व  25 डिग्री सेल्सियस तापमान पर ही भाप में परिवर्तित हो जाता है। यह  वाष्पशील होता है। यह गैस रूप में रंगहीन व गंधहीन होता है जिससे इसका पता  कठिनाई से चल पाता है। तापमान अधिक होने पर यह भाप रूप मेंं बदल जाता है।
यदि पारे की भाप सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करती है तो भाप  का 80 प्रतिशत शरीर की ऊपरी परत को पार कर जाता है और यह रक्त में मिल  जाता है। यह मस्तिष्क को भी प्रभावित करता है। पारे की भाप बच्चों के लिए  और अधिक खतरनाक होती है। यह उनके मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के लिए भी  हानिकारक होता है।
उपयोग संबंधी मानक : विश्व स्वास्थ्य संगठन के  दिशानिर्देशों के अनुसार सामान्य वायु में पारे की मात्रा 0.001 मिलीग्राम  प्रति घनमीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए। जिन कल-कारखानों में पारे का उपयोग  होता है, वहां पर भी वायु में पारे की मात्रा 0.025 मिलीग्राम प्रति घनमीटर  से अधिक नहीं होनी चाहिए क्योंकि यहां के कर्मचारी 8 घंटे प्रतिदिन व 40  घंटे प्रति सप्ताह इसे ग्रहण करते रहते हैं। अल्पकालिक प्रयोगों के दौरान  इसकी अधिकतम मात्रा 0.1 मिलीग्राम प्रति घनमीटर निर्धारित की गई है।
बचने के उपाय : इसके दुष्प्रभाव से बचने के कुछ उपाय भी सुझाए गए हैं।
० पारे युक्त पदार्थों का उपयोग करते समय कर्मियों को बचाव  जैसे मास्क, दस्तानों, गॉगल्स, सुरक्षात्मक कपडे़(एप्रन) आदि का प्रयोग करना  चाहिए।
० वायु प्रवाह तंत्र को सुरक्षित तथा प्रभावी बनाना चाहिए।  पारेयुक्त वायु को सीधे बाहर छोड़ने के स्थान पर फिल्टर के माध्यम से छोड़ा  जाना चाहिए।
० अवैध रूप से चल रहे पारायुक्त उपकरणों की मरम्मत और  रिसाइक्लिंग उद्योग को वैधानिक दायरे में लाना चाहिए तथा शिक्षा और नियमों  के माध्यम से उन्हें इस बात के लिए बाध्य किया जाना चाहिए कि वे सुरक्षित  तरीकों को ही अपनाएं।
(स्वा.) नरेंद्र देवांगन

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