दुनिया भर के वैज्ञानिक क्यों कर रहे हैं कोरोना वायरस का संवर्धन, पढ़ें

नई दिल्ली : कोरोना वायरस से दुनिया भर में अब तक 56 लाख से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं और 3.62 लाख से अधिक लोगों अपनी जान गंवा चुके हैं। भारत में कोरोना वायरस संक्रमण का आँकड़ा 1.58 लाख को पार कर चुका है और 4500 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। इसके बाद भी इस वायरस का प्रसार बढ़ता जा रहा है और मौतों का सिलसिला जारी है। इतने बड़े पैमाने पर कोविड-19 के प्रकोप के बावजूद वैज्ञानिक कोरोना वायरस का लैब में कल्चर करके उसकी संख्या बढ़ाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं।

क्यों किया जा रहा है कोविड-19 का कल्चर
हैदराबाद स्थित प्रयोगशाला आणविक जीवविज्ञान केन्द्र (सीसीएमबी), जो वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की एक प्रमुख प्रयोगशाला है, यहां वैज्ञानिकों द्वारा मरीजों के नमूने से कोविड-19 के लिए जिम्मेदार कोरोना वायरस (सार्स – कोवी-2) के स्थिर संवर्धन कर रहे हैं। दरअसल कल्चर एक प्रयोगशाला तकनीक है, जिसमें वायरस के नमूनों को अलग-अलग सेल लाइनों में परखा जाता है। वायरल कल्चर के लिए जीवित कोशिकाओं की आवश्यकता पड़ती है। वैज्ञानिक जब वायरस कल्चर करते हैं, तो यह स्थिर होना चाहिए, जिसका अर्थ है कि वायरस संवर्धन निरंतर होते रहना चाहिए। इसीलिए इसे स्थिर संवर्धन कहा गया है।

कोरोना वायरस एसीई-2 नामक रिसेप्टर प्रोटीन के साथ मिलकर मानव के श्वसन मार्ग में एपीथीलियल कोशिकाओं को संक्रमित करता है। श्वसन मार्ग में एपीथीलियल कोशिकाएं प्रचुरता से एसीई-2 रिसेप्टर प्रोटीन बनाती हैं, जिससे इस वायरस से संक्रमित मरीजों में श्वसन रोगों का खतरा बढ़ जाता है। कोरोना वायरस को संवर्धित कर रहे वैज्ञानिकों को कभी न खत्म होने वाली सेल लाइनों की जरूरत पड़ती है। इसीलिए, वैज्ञानिक विरो सेल का प्रयोग करते हैं- जो अफ्रीकी बंदर के गुर्दे की एपीथीलियल कोशिका लाइनों से प्राप्त होते हैं और जो एसीई-2 प्रोटीन को व्यक्त करते हैं। इसके साथ ही ये कोशिका विभाजन भी करते हैं, जिससे वे लंबे समय तक वृद्धि कर सकते हैं।

सीसीएमबी के वैज्ञानिकों के अनुसार कोरोना वायरस संवर्धन के कुछ संभावित उपयोग इस प्रकार हो सकते हैं –

टीके का विकास
टीके का उपयोग संबंधित रोगाणुओं से संक्रमण से सुरक्षा के लिए किया जा सकता है। आमतौर पर, रोगजनक सूक्ष्मजीवों के लिए विशिष्ट प्रोटीन टीके के रूप में यह उपयुक्त माना जाता है। एंटीजेनिक गुणों वाले ऐसे प्रोटीन परपोषी जीवों में एंटीबॉडी प्रतिक्रिया बढ़ाते हैं। एंटीजन की प्रकृति के आधार पर एंटीबॉडी प्रतिक्रिया दीर्घकालिक या अल्पकालिक हो सकती है। ऐतिहासिक रूप से अटेन्यूएटेड या मारे गए वायरस को कई मामलों में टीके के रूप में उपयोग किया जाता है। हालाँकि, निष्क्रिय वायरस से संक्रमण नहीं होता, बल्कि उनके संरचनात्मक प्रोटीन कोशिकाओं में एंटीबॉडी उत्पादन में मदद करते हैं। टीके के रूप में निष्क्रिय कोरोना वायरस की क्षमता की जाँच की जा रही है।

एंटीबॉडी या एंटी-डॉट्स
निष्क्रिय वायरस मनुष्यों के अतिरिक्त अन्य स्तनधारी परपोषियों में एंटीबॉडी प्रतिक्रिया को बढ़ा सकते हैं। वर्तमान में इस तरह के विभिन्न परपोषियों की एंटीबॉडी प्रतिक्रिया क्षमता का परीक्षण किया जा रहा है। वे चूहे जैसे जीवों से लेकर घोड़े और ऊँट जैसे बड़े स्तनधारियों तक हो सकते हैं। इन गैर-मानव परपोषियों में उत्पन्न ऐसे एंटीबॉडी को मनुष्यों में इन्जेक्ट करने के लिए संसाधित किया जा सकता है। इस तरह के एंटीबॉडी मनुष्यों में इंजेक्ट होने पर एंटी-वायरल प्रतिक्रिया को बढ़ा सकते हैं और साथ ही उनमें संक्रमण को सीमित करने की क्षमता भी होती है। ये एंटीबॉडी टीके नहीं हैं, लेकिन वायरस के खिलाफ एंटी-डॉट्स कहे जा सकते हैं।

एंटीबॉडी का परीक्षण
उच्च गुणवत्ता के रोग-प्रतिकारक एंटीबॉडी वे होते हैं, जिनमें कोशिकाओं में संक्रमण रोकने की क्षमता होती है। इस प्रकार के रोग-प्रतिकारक एंटीबॉडी अन्य स्तनधारियों में भी उत्पन्न किए जा सकते हैं। वायरस के साथ उनको इन्क्यूबेट करके संक्रमण रोकने एवं संक्रामक वायरस निष्क्रिय करने की उनकी क्षमता का अध्ययन किया जाता है। प्रभावी एंटीबॉडी सफलतापूर्वक संक्रमण रोक सकते हैं। ऐसे प्रभावी एंटीबॉडी की पहचान के लिए वायरस संवर्धन महत्वपूर्ण हो सकता है।

दवाओं की स्क्रीनिंग
एंटी-वायरल दवा के परीक्षण का प्रथम चरण वायरस की प्रतिकृति तथा उसकी वृद्धि को सीमित करने की संभावित दवा की क्षमता पर आधारित होता है। संभावित दवा की उपस्थिति या अनुपस्थिति में कोशिकाओं को सार्स – कोवी -2 से संक्रमित किया जाता है। इसके बाद प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। उत्कृष्ट दवा का प्रभाव कल्चर में मौजूद वायरस की वायरल प्रतिकृति पर पड़ता है। एक सही दवा की पहचान करने का तरीका फिर से उपयोग करना है, जिनका प्रयोग पहले से ही इश्तेमाल किया जा रहा है। कोरोना वायरस के मामले में भी ऐसी संभावित दवाओं का क्लिनिकल परीक्षण किया जा रहा है। नयी परिस्थितियों में पुरानी दवाओं का उपयोग ड्रग रिपर्पजिंग कहलाता है। अगर ये दवाएं प्रभावी पायी जाती हैं, तो जल्दी ही इनका परीक्षण मनुष्यों में कोविड-19 के इलाज के लिए किया जा सकता है।

कीटाणुनाशकों का परीक्षण
संक्रमण को फैलने से रोकने लिए सतह साफ करने के लिए कीटाणुनाशकों की आवश्यकता पड़ रही है। ऐसे कीटाणुनाशक व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) किट और कपड़े सहित विभिन्न सतहों पर मौजूद वायरस को मारकर संक्रमण से बचाने में मदद कर सकते हैं। वायरस कल्चर या अध्ययन कीटाणुनाशकों के प्रभाव का परीक्षण कर सकता है। यहाँ कीटाणुनाशक की क्षमता का परीक्षण किया जाता है, जो विषाणुओं को मार सके।

उपकरणों का परीक्षण
यूवी रेज वायरस को मारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। पैकेजिंग सामग्री सहित विभिन्न सामग्रियों से वायरस को खत्म करने के लिए घरेलू और औद्योगिक क्षेत्रों में यूवी रेज से लैस उपकरणों की माँग है। वायरस कल्चर का यूवी विकिरणों से संपर्क कराकर वायरस को नष्ट करने की इसकी क्षमता का आकलन करके इन उपकरणों की जाँच की जा सकती है। इसके लिए भी वायरस कल्चर महत्वपूर्ण है।
कोरोना वायरस के कल्चर की के बारे में कहा जा सकता है कि ‘जहर को जहर जी मारता है’। यही कारण है कि कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए वैज्ञानिक घातक वायरस को हथियार बनाना चाहते हैं।

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