इस्पात कंपनियों की नीलामी से बढ़ सकती है अनुचित प्रतिस्पर्धा

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भूषण स्टील, भूषण स्टील एण्ड पावर और मोनेट इस्पात सहित परेशान स्टील कंपनियों केे लिए दिवालिएपन की कार्रवाई, अनुचित प्रतिस्पर्धा के मुद्दे को बढ़ावा दे सकती है, अगर मौजूदा बोलीदाता अपने प्रयासों में कामयाब हो जाते हैं। हालांकि समेकन स्टील उद्योग के लिए फायदेमंद होगा, फिर भी इस बात की संभावना है कि बोली प्रक्रिया भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग  का ध्यान आकर्षित करेगी।

दिवालिएपन की कार्रवाई का सामना कर रही तीनों कंपनियां तकरीबन 50 मिलियन टन सलाना उत्पादन क्षमता के साथ देश के स्टील उत्पादन में 15 फीसदी योगदान देती हैं। तीनों स्टील कंपनियों के लिए बोलीदाता भारत के सबसे बड़े स्टील निर्माता हैं- टाटा स्टील लिमिटेड (फ्लैट स्टील क्षमता 8.5 मिलियन टन सालाना), जेएसडब्ल्यू स्टील लिमिटेड (फ्लैट स्टील क्षमता 12 मिलियन टन सालाना)। हालांकि बोलियों की शुरूआत अभी नहीं हुई है। उद्योग जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि बोलीदाता उद्योग जगत में अपनी विशेषज्ञता के साथ इस दौड़ में सबसे आगे हैं। स्टील जगत के इन विशेषज्ञों को आईबीसी कोड में बदलाव का फायदा मिल रहा है।

एकमात्र बोलीदाता होने के नाते, मौजूदा स्थिति को देखते हुए भारत के कुल फ्लैट स्टील उत्पादन में से 50 फीसदी पर स्टील जगत के इन दिग्गजों का नियन्त्रण हो जाएगा जिससे कार्टलाइज़ेशन की आशंका बढ़ जाएगी। कुछ कोरपोरेट सदनों द्वारा स्टील उद्योग के अधिग्रहण के परिणामस्वरूप कार्टलाइज़ेशन की संभावना है जो सार्वजनिक हित के विरुद्ध है। नियमों के अनुसार बोली को अंतिम अनुमोदन देने से पहले भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग से मंजूरी ली जानी चाहिए। अब तक ऐसा ज्ञात नहीं है कि शीर्ष पायदान के बोलीदाताओं ने इस तरह की मंजूरी के लिए आवेदन दिया हो।

हालांकि, बहुत से लोगों का मानना है कि कई बड़ी घरेलू स्टील फर्में दिवाएलिएपन के मामले में सीसीआई अनुमोदन से छूट की मांग कर रही है। ऐसे में दिवालिएपन के प्रावधान के तहत मर्जर और अधिग्रहण के सभी मामलों के लिए बोलीदाता को सीसीआई तथा समझौते को मंजूरी देने वाली लेनदेन समिति  से अनुमोदन लेना होगा।

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