बढ़ते औद्योगीकरण से खतरे में पर्यावरण

सन्मार्ग संवाददाता, नई दिल्ली : संयुक्त राष्ट्र ने स्थायी विकास को पहचाना है और स्थायी विकास के लिए कई लक्ष्य अपनाए हैं। भारत को भी कुछ स्थायी लक्ष्य अपनाने चाहिए। भारत को उत्पादन की सभी अवस्थाओं में संसाधन क्षमता को मुख्यधारा में लाना चाहिए। भारत का औद्योगिकरण तेजी से हो रहा है। जल संसाधन जोखिम में हैं। दूसरा जोखिम है हरित पर्यावरण। तापमान बढ़ रहा है। तापमान में 2 डिग्री की बढ़त चिंतित करने वाली है और यह पर्यावरण को प्रभावित कर रही है। ये बातें आईसीसी नेशनल एक्सपर्ट कमिटी के चेयरमैन एवं भारत सरकार के विद्युत विभाग के भूतपूर्व सचिव अनिल राजदान ने कॉर्पोरेट गवर्नेंस के विभिन्न पहलूओं के क्रियान्वयन और अच्छे अभिशासन तथा स्थायित्व के क्षेत्र में सफल होने की चुनौतियों के लिए आवश्यक प्रयासों को समझने के लिए इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स द्वारा आयोजित इंडिया कॉर्पोरेट गवर्नेंस एंड सस्टैनेबिलिटी विजन समिट के मौके पर कही।

उन्होंने कहा कि गरीब किसान उच्च गुणवत्ता की मृदा को सड़क निर्माण के लिए बेच रहे हैं, जो हानिकारक है क्योंकि यह मृदा कृषि के लिए अनिवार्य है। उन्होंने सरकार को सलाह दी कि जल का मापन होना चाहिए, ताकि व्यर्थ होने वाले जल की मात्रा पता चले। वहीं इस मौके पर अर्न्स्ट एंड यंग के असोसिएट पार्टनर सौनक साहा ने कहा कि राज्य और केंद्र सरकार द्वारा सभी क्षेत्रों में और खासकर ऊर्जा के क्षेत्र में विनियमन लाया जा रहा है। कंपनियों का रूझान बदल रहा है, 90 प्रतिशत कंपनियां निवेश का निर्णय लेते समय वित्तीय मापदंडों को देखती हैं। इससे पता चलता है कि कंपनियां स्थायित्व को लेकर अधिक सचेत हो रही हैं। उन्होंने कहा कि जीआरआई प्रशंसनीय काम कर रहा है। विश्व में 13000 कंपनियों ने जीआरआई अपनाया है। पिछले 10 वर्षों में कई भारतीय कंपनियों ने अधिक पूर्व सक्रिय पहलें की हैं। भारी उद्योग एवं सार्वजनिक उद्यम विभाग के भूतपूर्व सचिव डॉ. भास्कर चटर्जी ने कहा कि कुछ कंपनियां अनैतिकता करते हुए भी भारत में दशकों तक सफल रहीं, लेकिन कॉर्पोरेट कानूनों के उल्लंघन के कारण वह अब तकलीफ में हैं।

 

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