रिलायंस समूह यहां बसाएगी मेगा सिटी, 10 लाख से अधिक लोग रह सकेंगे यहां

नई दिल्ली : रिलायंस समूह मुंबई के करीब एक मेगा सिटी स्थापित करने करने की योजना पर काम कर रही है। इसके लिए उनकी कंपनी अगले दशक में 75 अरब डॉलर का निवेश करेगी। इस परियोजना को विशेष योजना प्राधिकरण (एसपीए) से मंजूरी मिल चुकी है। रिलायंस इंडस्ट्रीज इस मेगा सिटी का विकास करेगी और साथ ही इस शहर का प्रशासन भी संभालेगी। कंपनी इस परियोजना के लिए नवी मुंबई स्पेशल इकनॉमिक जोन में (एनएमएसईजेड) 4,300 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर चुकी है।

यह जमीन जवाहर लाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट और निर्माणाधीन हवाई अड्डों के करीब है। 7 मार्च को आरआईएल ने एक सहयोगी कंपनी के जरिए एनएमएसईजेड के साथ एक समझौता किया। 2,180 करोड़ रुपये के शुरुआती भुगतान के बाद कंपनी को इसे विकसित करने के अधिकार मिल गए हैं। कंपनी ने 7 मार्च को एक बयान में बताया कि उसने एक वैश्विक आर्थिक केंद्र विकसित करने के लिए महाराष्ट्र सरकार के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसमें अंतरराष्ट्रीय साझेदारी से एक विश्वस्तरीय एकीकृत डिजिटल एवं सेवा औद्योगिक क्षेत्र बनाया जाएगा।

कंपनी ने बयान में कहा कि यह परियोजना दिवंगत धीरूभाई अंबानी के सपने को पूरा करेगी, उन्होंने सबसे पहले 1980 के दशक में नवी मुंबई में एक विश्वस्तरीय शहर बनाने की पेशकश की थी। उनकी योजना दक्षिण मुंबई को सड़क मार्ग के जरिए नवी मुंबई से जोड़ने की थी, जो दक्षिण मुंबई का बेहतर संस्करण होगी और मुंबई मुख्य शहर से आबादी कम होगी। इस परियोजना के लिए 2005 में सिंगापुर का डिजाइन तैयार करने वाली कंपनी जुरोंग टाउन कॉरपोरेशन को इसके डिजाइन की जिम्मेदारी दी गई है।

अंबानी के इस टाउनशिप में दस लाख से अधिक लोग रह सकते हैं और हजारों कंपनियां काम कर सकती हैं। रिलायंस समूह की सबसे बड़ी परियोजना होगी, जिसमें एक परियोजना के अंदर कई परियोजनाएं होंगी। महाराष्ट्र सरकार पहले ही नवी मुंबई दक्षिण मुंबई से जोडऩे का काम कर रही है, इस प्रोजेक्ट पर लार्सन ऐंड टुब्रो तथा टाटा प्रोजेक्ट्स काम कर रही हैं। नवी मुंबई में नया हवाई अड्डा बनाने का काम जीवीके की अगुआई वाले कंसोर्टियम को दिया गया है।

इन दोनों परियोजनाओं से औद्योगिक शहर को अच्छी कनेक्टिविटी मिलेगी, जिसमें 15 फीसदी क्षेत्र आवासीय और बाकी औद्योगिक होगा। नया शहर दक्षिण मुंबई से बेहतर होगा,जहां जमीन की कीमतें 80,000 रुपये से 1.2 लाख करोड़ रुपये प्रति वर्ग फुट तक पहुंच चुकी हैं, जबकि बुनियादी ढांचा लचर है।

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