बजट : घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए स्टील उद्योग ने सरकार से की ये मांगे

नई दिल्ली : घरेलू विनिर्माण बढ़ाने के लिए देश की स्टेनलेस स्टील उद्योग से जुड़ी संस्था इंडियन स्टेनलेस स्टील डेवलपमेंट एसोसिएशन (इसडा) ने आगामी केंद्रीय बजट से पहले सरकार को कुछ उपाय बताएं हैं। वित्त मंत्रालय को सौंपी गई अपनी सिफारिश में इसडा ने फेरो-निकल और स्टेनलेस स्टील स्क्रैप जैसे कच्चे माल, जो देश में उपलब्ध नहीं हैं और जिनका आयात आवश्यक है, के आयात को शुल्क मुक्त करने की मांग की है। साथ ही एसोसिएशन ने स्टेनलेस स्टील फ्लैट उत्पादों के आयात पर 12.5% सीमाशुल्क लगाने की मांग की है ताकि इसे कार्बन स्टील के बराबर लाया जा सके।

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इसडा ने ग्रेफाइट इलेक्ट्रोड पर लगने वाले 7.5% आयात शुल्क को हटाने की भी मांग की है, क्योंकि यह स्टेनलेस स्टील विनिर्माण में एक प्रमुख कच्चा माल है। दूसरी ओर एसोसिएशन ने ग्रेफाइट इलेक्ट्रोड पर कम से कम 20% निर्यात शुल्क लगाने का सुझाव दिया है ताकि घरेलू विनिर्माताओं को प्राथमिकता मिले और उनके लिए इस कच्चे माल की उपलब्धता बढ़े। इन पहलों से घरेलू स्टेनलेस स्टील उत्पादन में बढ़ोतरी और भारतीय विनिर्माताओं को राहत मिलने की उम्मीद है जो फिलहाल इंडोनेशिया, चीन और फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) के तहत आने वाले देशों जैसे प्रमुख स्टेनलेस स्टील उत्पादकों की ओर से होने वाली अत्यधिक डंपिंग और देश में प्रमुख कच्चे माल की अनुपलब्धता जैसी दोहरी चुनौतियों से जूझ रहे हैं।

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घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा दिया जाए

इसडा के अध्यक्ष के के पाहुजा ने कहा कि ऐसे समय में जब सरकार दूसरे देशों और व्यापार खंडों के साथ व्यापार संबंधों का आकलन कर रही है, यह भी ज़रूरी है कि उच्च लागत को कम कर घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा दिया जाए। भारतीय स्टेनलेस स्टील उद्योग एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है जहाँ कच्चे माल की शुल्क-मुक्त उपलब्धता में सरकार की मदद से इसकी प्रतिस्पर्द्धा बरक़रार रखने में मदद मिलेगी। हम सरकार से अपील करते हैं कि वह कच्चे माल पर शुल्क को राजस्व के स्रोत के तौर पर न देखे, बल्कि विनिर्माण में वृद्धि से पैदा होने वाले रोज़गार की बड़ी तस्वीर को ध्यान में रखे जो ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को आगे ले जायेगा और 2024 तक भारतीय अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था बनाने में सहायक होगा।

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मौजूदा एफटीए पर समीक्षा करे सरकार 

सरकार ने रीजनल कम्प्रेहैन्सिव इकनोमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) संधि से बाहर निकलने का महत्वपूर्ण फैसला किया है। हालाँकि, एफटीए देशों से होने वाले अनियंत्रित आयात से घरेलू स्टेनलेस स्टील उद्योग को होने वाला नुकसान जारी है। सरकार को मौजूदा एफटीए की सक्रियता से समीक्षा करनी चाहिए ताकि भारतीय उत्पादकों के लिए कारोबार से सामान अवसर सुनिश्चित हों।  वैश्विक व्यापार में चुनौतियों के बावजूद भारत स्टेनलेस स्टील का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है। भारत में स्टेनलेस स्टील की मांग सभी तरह के क्षेत्रों में 8-9% के कंपाउंड ऐनुअल ग्रोथ रेट (सीएजीआर ) से बढ़ रही है।

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भारत में प्रति व्यक्ति स्टेनलेस स्टील की खपत 2.5 किलोग्राम

भारत में प्रति व्यक्ति स्टेनलेस स्टील की खपत 2.5 किलोग्राम है, जबकि वैश्विक औसत 6 किलोग्राम है। इसके अलावा भारतीय स्टेनलेस स्टील विनिर्माताओं द्वारा क्षमता का उपयोग 60-70% पर स्थिर है, क्योंकि बाज़ार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सस्ते आयात की गिरफ्त में है। साथ ही ऊँची लागत के कारण घरेलू कंपनियों की वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धात्मकता कम होती है। बावजूद इसके स्टेनलेस स्टील देश में सबसे अधिक तेज़ वृद्धि दर्ज करने वाला धातु है, क्योंकि यह भरोसेमंद, सतत और पर्यावरण अनुकूल समाधान के तौर पर एक बेहतर विकल्प है।

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