अस्पतालों में सुरक्षा उपकरणों की कमी तत्काल दूर हो : डॉ.वैश्य

नई दिल्ली: भारत में कोरोनावायरस के खिलाफ लड़ाई में चिकित्सक, नर्स एवं अन्य स्वास्थ्य कर्मी मजबूती के साथ डटे हुए है। स्वास्थ्यकर्मी अपनी जान को जोखिम में डालकर कोरोनावायरस के प्रकोप से निबटने में जिस मुस्तैदी के साथ लगे हुए हैं, उसके लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और देश की जनता ने उन्हें काफी सराहा, लेकिन कोरोनावायरस संक्रमण तेजी से फैलता जा रहा है, जिसके कारण डॉक्टर्स और अस्पतालों पर जिम्मेदारी बढती जा रही है।

चिकित्सकों का कहना है कि हमारे सामनेदोहरी चुनौतियां हैं। ये चिकित्सक कोविड-19 के मरीजों की बढ़ती संख्या के साथ-साथ सुरक्षा उपकरणों की कमी से भी जूझ रहे हैं और उनके खुद के लिए कोरोनावायरस के संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है और देश के विभिन्न भागों से डाक्टरों और नर्सों के कोरोनावायरस से सवंमित होने के मामले सामने आ रहे हैं। ऐसे में चिकित्सकों से सरकार से स्वास्थ्यकर्मियों के लिए सुरक्षा उपकरणों की कमी को तत्काल दूर करने की अपील की है। नई दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ सर्जन प्रो. राजू वैश्य ने कहा कि देश के अनेक अस्पतालों में स्वास्थ्यकर्मी फेस मास्क, गाॅउन और रेसपिरेटर जैसे सुरक्षा उपकरणों (पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्युपमेंट — पीपीई) की कमी का सामना कर रहे हैं। आज जिस तरह से कोरोनावायरस फैल रहा है, वैसे में यह जरूरी है कि सुरक्षा कर्मियों के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए जाएं ताकि वे न केवल खुद को बल्कि अपने सहकर्मियों, अन्य मरीजों तथा अपने परिवार के लोगों को इस वायरस से सुरक्षित रख सकें।  कोविड -19 के मरीजों का इलाज करने वाले कई डाक्टर एवं स्वास्थ्य कर्मी संक्रमित हुए और उनकी मौत हो गई है। कोरोना वायरस के मरीजों की बढ़ती संख्या के कारण अस्पतालों और स्वास्थ्यकर्मियों पर दवाब बढ़ रहा है और उनके लिए संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है। अगर स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित हुए तो उनके सहकर्मियों, नर्सों, उनके संपर्क में आने वाले दोस्तों एवं परिवार जनों को भी कोरेंटाइन करने की जरूरत होगी।

इसके कारण कोविड-19 का इलाज करने वाले चिकित्सकों एवं स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या में कमी आएगी। साथ ही अन्य स्वास्थ्यकर्मी हतोत्साहित होंगे। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्यकर्मियों की एक अन्य समस्या यह है कि उन्हें लंबे समय तक मरीजों के संपर्क में रहना पड़ रहा है और उन्हें लंबे समय तक उनके बीच काम करना पड़ रहा है। कोरोनावायरस के संक्रमण का खतरा उन्हें अधिक है। ऐसे में जरूरी है कि रोटेशन की प्रकिया कड़़ाई से लागू की जाए। हालांकि हर स्थितियों में मरीजों का इलाज करना चिकित्सक एवं स्वास्थ्यकर्मियों की नैतिक एवं पेशेगत जिम्मेदारी है,, क्योंकि वे स्वेच्छा से इस पेशे में आए है और उन्होंने चिकित्सा से जुड़े खतरों का सामना करना भी स्वीकार किया है। लेकिन इसके बावजूद उनकी सुरक्षा के मुद्दों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि उनकी सुरक्षा समाज की सुरक्षा से जुड़ी है। डॉ. वैश्य ने कहा कि देश में कई जगहों से कुछ असमाजिक तत्वों द्वारा चिकित्सकों के खिलाफ हिंसा की भी खबरें आ रही है जो कि अत्यंत दुर्भाग्यपूण है। अगर ऐसी घटनाओं को तत्काल नहीं रोका गया तो इससे देश का स्वास्थ्य तंत्र प्रभावित हो सकता है।

उन्होंने कहा कि सरकार, चिकित्सा संस्थानों के प्रशासकों तथा नीतिकारों के लिए यह समझना जरूरी है कि स्वास्थ्यकर्मी कोरोनावायरस के खिलाफ लड़ाई में आगे की पंक्ति के योद्धा हैं और संकट के समय उनकी सुरक्षा आवश्यक है। भारत सरकार ने अनेक स्वागत योग्य कदम उठाए हैं जैसे कि स्वास्थ्यकर्मियों के खिलाफ हिंसा करने वाले लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई किया जाना, स्वास्थ्यकर्मियों के लिए 50 लाख रूपए का बीमा प्रदान करने का फैसला लेना तथा उत्पादकों को बड़े पैमाने पर सुरक्षा उपकरणों का उत्पादन करने का निर्देश देना आदि। लेकिन यह जरूरी है कि जल्द से जल्द सुरक्षा उपकरणों की कमी को दूर किया जाए तथा चिकित्सकों एवं स्वास्थ्यकर्मियों को समुचित सहायता प्रदान की जाए ताकि वे अपनी ड्यूटी समुचित तरीके से निभा सकें।

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